महिलाओं की आजादी व उनके विकास का विरोधी था भीमराव अम्बेडकर



किसी भी समाज का चरित्र उसकी स्त्रियों के प्रति दृष्टि से पहचाना जाता है।
वह समाज कभी सभ्य नहीं कहलाया जा सकता, जहाँ स्त्री को मात्र गृहकार्य और बाल-पालन तक सीमित किया जाए।
ऐसे में जब कोई बुद्धिजीवी, संविधान-निर्माता, या समाज सुधारक यह कहता है कि —

“महिलाओं का काम बच्चों को संभालना, नाक पोछना है, राजनीति में आना शर्म की बात है,”
तो यह न केवल स्त्री के अस्तित्व का अपमान है, बल्कि उस व्यक्ति की वैचारिक गिरावट का भी प्रमाण है।


🔹 अंबेडकर और यह कथन: विचारों की विडंबना

डॉ. भीमराव अंबेडकर को आमतौर पर सामाजिक न्याय और समानता का प्रतीक माना जाता है।
परंतु यदि उन्होंने यह वाक्य वास्तव में लिखा है (जैसा कि संपूर्ण वाङ्मय खंड 40, पृष्ठ 467 में मिलता है),
तो यह उनके ही विचारों की आत्मविरोधी स्थिति को उजागर करता है।

क्योंकि एक ओर वे “समानता” की बात करते हैं,
और दूसरी ओर वही व्यक्ति स्त्री को राजनीति से दूर रखने जैसी संकीर्ण और अपमानजनक बात कहे —
तो यह एक प्रकार का द्विमुखापन (Hypocrisy) है।


🔹 स्त्री को “नाक पोछने” तक सीमित करना — एक असभ्य दृष्टिकोण

“नाक पोछना” जैसे शब्द का प्रयोग स्वयं में ही अपमानजनक और असभ्य है।
यह किसी भी सभ्य संवाद या साहित्य में महिलाओं के लिए इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए।
यह वाक्य न केवल स्त्री के श्रम का मज़ाक उड़ाता है, बल्कि उसे मानसिक रूप से दासता में बाँधने की कोशिश करता है।

किसी माँ का बच्चे की नाक पोछना, उसकी देखभाल करना — यह प्रेम का कार्य है, अपमान का नहीं।
पर जब वही कार्य किसी स्त्री की सामाजिक पहचान के रूप में थोप दिया जाता है,
तो वह संवेदनहीनता और पुरुष-सत्ता के अहंकार का प्रदर्शन बन जाता है।


🔹 राजनीति में स्त्री की भूमिका का अपमान

राजनीति में आने का अर्थ है — निर्णय-प्रक्रिया का हिस्सा बनना,
सत्ता-संरचना में अपनी आवाज़ जोड़ना,
और समाज की दिशा तय करना।

जब कोई यह कहे कि “महिलाओं का राजनीति में आना शर्म की बात है”,
तो वह यह संकेत देता है कि स्त्री बुद्धिहीन है, अयोग्य है,
और समाज-निर्माण में उसकी कोई भूमिका नहीं हो सकती।
यह सोच केवल अंबेडकर की नहीं, बल्कि सदियों पुरानी पितृसत्तात्मक मानसिकता की उपज है।

परंतु यह बात डॉ. अंबेडकर जैसे व्यक्ति के मुख से निकले —
यह और भी अधिक निंदनीय हो जाती है।
क्योंकि वे उस समय के सबसे शिक्षित, संवेदनशील और कानून-ज्ञानी व्यक्ति थे।
उनसे ऐसी संकीर्ण भाषा की अपेक्षा नहीं की जा सकती थी।


🔹 शब्द चयन में छिपी मानसिकता

शब्द व्यक्ति की मानसिकता का प्रतिबिंब होते हैं।
“नाक पोछना” जैसे शब्द स्त्री को हंसी का पात्र बनाते हैं।
यह दिखाता है कि लेखक उस समय की स्त्री को केवल बालक-संवरण और गृहस्थी की वस्तु के रूप में देख रहा था।

यह वैसा ही दृष्टिकोण है जैसा मनुस्मृति में मिलता है —
जहाँ स्त्री को स्वतंत्रता के योग्य नहीं माना गया।
यदि अंबेडकर ने वास्तव में ऐसा कहा,
तो उन्होंने उसी विचारधारा के प्रति झुकाव दिखाया,
जिसका वे स्वयं जीवनभर विरोध करने का दावा करते रहे।


🔹 स्त्री और राजनीति: समाज के विकास का आधार

इतिहास साक्षी है कि जहाँ-जहाँ स्त्रियों को राजनीति में भाग लेने का अवसर मिला,
वहाँ समाज में सुधार की गति तेज़ हुई।
इंदिरा गांधी, मार्गरेट थैचर, एंजेला मर्केल, जैसिंडा अर्डर्न जैसी नेताओं ने दिखाया कि
स्त्री न केवल राजनीति कर सकती है, बल्कि दूरदर्शिता और संवेदना के साथ शासन भी कर सकती है।

यदि अंबेडकर ने महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी का मज़ाक उड़ाया,
तो उन्होंने उस ऐतिहासिक सत्य को नकारा कि राजनीति पुरुषों का क्षेत्र नहीं, मानव का क्षेत्र है।


🔹 समाज सुधारक के रूप में असफल दृष्टि

अंबेडकर को अक्सर दलितों और पिछड़ों के उद्धारक के रूप में देखा जाता है।
परंतु किसी भी समाज सुधारक का मूल्यांकन इस बात से होता है कि वह समाज के सबसे कमजोर वर्गों के प्रति क्या दृष्टि रखता है।
और स्त्रियाँ — विशेषकर गरीब और दलित स्त्रियाँ — सबसे कमजोर वर्ग में आती हैं।

ऐसे में यदि वही समाज सुधारक स्त्री को घर तक सीमित रखने की बात करे,
तो यह उसके “सुधार” के दर्शन को खोखला बना देता है।
यह दिखाता है कि उनका सुधार सीमित था —
केवल वर्ग या जाति तक,
स्त्री-समानता तक नहीं।


🔹 वैचारिक असंगति और आत्मविरोध

डॉ. अंबेडकर के कई लेखों और भाषणों में महिलाओं की शिक्षा और अधिकार की बात मिलती है।
परंतु यही व्यक्ति यदि कहीं पर यह कहे कि “महिलाओं का राजनीति में आना शर्म की बात है,”
तो यह उनकी विचारधारा में आंतरिक विरोधाभास (Internal Contradiction) को दिखाता है।

यह विरोधाभास इस बात का संकेत है कि
उनका नारी-मोर्चा केवल सिद्धांतों तक सीमित था,
व्यवहार में वे अभी भी उस पारंपरिक पुरुष दृष्टिकोण से मुक्त नहीं हो पाए थे।


🔹 स्त्री-अपमान का सामाजिक असर

जब कोई प्रतिष्ठित व्यक्ति ऐसी भाषा बोलता है,
तो उसका प्रभाव समाज पर व्यापक होता है।
लाखों लोग उनके अनुयायी बनते हैं,
और फिर वही अपमानजनक सोच समाज में फैलती जाती है।

आज भी जब कोई कहता है कि “राजनीति औरतों का काम नहीं है,”
तो उसकी जड़ें ऐसे ही विचारों में हैं।
इसलिए इस तरह के कथनों की कड़ी आलोचना और सार्वजनिक अस्वीकृति आवश्यक है,
ताकि आने वाली पीढ़ियाँ यह समझें कि —
“बुद्धिजीवियों के भी शब्द अगर अन्यायपूर्ण हों, तो उन्हें नकारना ज़रूरी है।”


🔹 इतिहास में ऐसे विचारों की निंदा

इतिहास में ऐसे कई उदाहरण हैं जहाँ किसी विचारक के किसी कथन की नैतिक निंदा की गई,
भले ही उसने बाकी जीवन में महान कार्य किए हों।
उदाहरण के लिए, महात्मा गांधी ने भी कभी-कभी जाति या स्त्री के बारे में विवादित बातें कही थीं।
परन्तु समय के साथ समाज ने उन्हें चुनिंदा रूप से अस्वीकार किया।

उसी तरह, यदि अंबेडकर ने यह कहा है,
तो हमें भी यह कहने में हिचक नहीं होनी चाहिए कि —
“यह विचार गलत, अन्यायपूर्ण और अपमानजनक है।”


🔹 विचार और व्यक्ति को अलग रखना आवश्यक

किसी व्यक्ति के महान कार्यों का अर्थ यह नहीं होता कि उसके हर विचार को स्वीकार किया जाए।
विचार को व्यक्ति से ऊपर रखना ही लोकतंत्र और तर्कशीलता का मूल है।
यदि हम अंबेडकर के इस कथन की आलोचना करते हैं,
तो इसका अर्थ यह नहीं कि हम उनके पूरे योगदान को नकारते हैं —
बल्कि यह कि हम तर्कशील समाज बनने की दिशा में बढ़ रहे हैं।

जो समाज अपने महान व्यक्तियों की गलतियों पर भी सवाल नहीं उठाता,
वह कभी आगे नहीं बढ़ता।


🔹 स्त्री की गरिमा — हर युग में सर्वोच्च मूल्य

स्त्री केवल परिवार की धुरी नहीं, बल्कि समाज की आत्मा है।
उसकी राजनीतिक भागीदारी समाज को संतुलन और संवेदना देती है।
उसे “नाक पोछने” जैसी घृणित भाषा में बाँधना
उसकी आत्मा का अपमान है।

इसलिए जो भी व्यक्ति — चाहे वह अंबेडकर ही क्यों न हों —
ऐसी भाषा बोलता है,
वह इतिहास की दृष्टि में पतनशील विचारक कहलाने योग्य है।


🔹 निष्कर्ष: किसी भी विचारक से बड़ा सत्य — मानव गरिमा

डॉ. अंबेडकर के उस कथन ने न केवल स्त्रियों का अपमान किया,
बल्कि उनकी वैचारिक विश्वसनीयता पर भी प्रश्नचिह्न लगाया।
महानता यह नहीं कि कोई व्यक्ति संविधान लिख दे,
महानता यह है कि वह हर इंसान — स्त्री या पुरुष — को सम्मान की दृष्टि से देखे।

यदि कोई बुद्धिजीवी यह कहे कि

“महिलाओं का राजनीति में आना शर्म की बात है,”
तो यह बयान स्वयं शर्म की बात बन जाता है।

इतिहास उसे सुधारक नहीं,
बल्कि विचारों का विरोधाभास कहकर याद रखेगा।


🔹 अंतिम टिप्पणी

अंबेडकर ने जो कुछ अच्छा किया, वह इतिहास का हिस्सा है।
परंतु उनका यह कथन —
स्त्रियों के प्रति उनकी सोच पर काला धब्बा है।
इस धब्बे को छिपाना नहीं,
उसकी आलोचना करना ही सत्य के प्रति ईमानदारी है।



Comments

  1. शब्दों का चयन बहुत ही घटिया है ..एक विचार धारा से प्रेरित होकर लेख लिखना कितना उचित ..कोई कोई कितना भी विद्वान हो उसकी कोई ना कोई कमजोरी जरूर होती है.. एक कोट को लेकर अंबेडकर की आलोचना करना अति निंदनीय.. हिंदू कोड बिल से लेकर.. रिजर्व बैंक में संविधान में.. महिलाओं को समानता का अधिकार दिया गया है।।जय हिंद..

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    1. एक विचार धारा से प्रेरित लेख यदि आपको गलत लग रहा है फिर तो अम्बेडकर, फूले पेरियार आदि के द्वारा एक विचार धारा के विरुद्ध लिखने व बोलने को भी आपको गलत कहना चाहिए। और रही बात हिंदु कोड बिल की तो ये भी अम्बेडकर के दोगलेपन को उजागर करता है।
      मेरा भी मानना यही है कि एक पक्षीय दृष्टिकोण सर्वथा अनुचित है, और इसे साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत या समाज में प्रचारित करना भी गलत है। किन्तु मेरी आलोचना से पहले समाज में उपरोक्त विष घोलकों के विचारों, पुस्तकों की आलोचना आपको अपने बंधु बंधवों व समाज के सहित उनकी आलोचना करनी चाहिए।

      राय रखने के लिए आपका धन्यवाद

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