किताबें व ग्रंथ जलाना महापाप है और जो किताबें जलाता है वह महापापी है

जागरण: किताबें व ग्रंथ जलाना महापाप है और जो किताबें जलाता है वह महापापी है। इस लेख में चर्चा है एक ऐसे ही महापापी की  । 


अम्बेडकर ने  अपने कार्यक्रम में सहस्त्रबुद्धे के हाथों मनु स्मृति 25 दिसंबर 1927 को जलवाई थी...
अम्बेडकर और अंबेडकर के मूर्ख भक्तों से पूछना यह है कि मनु स्मृति लागू कहां थी ???
800 साल मुगलों का राज रहा और 250 साल अंग्रेजों का राज रहा।
तो भीम भक्त ये बताएं मनु स्मृति लागू कहां थी....
अछूत तो हिंदू धर्म से ही अलग थे ब्राह्मण संस्कृति को मानते ही नहीं थे....
फिर अम्बेडकर ने मनु स्मृति क्यों जलवाई....
इसका सीधा सा लॉजिक यह है अंग्रेजों को अपना संविधान, कानून लागू करना था इसलिए भारतीय कानून को बदनाम करके ही वे अपना अपना कानून भारतीयों को गुलाम बनाने के लिए लागू करवा सकते थे..
इसलिए मनु स्मृति को अंग्रेजों ने अपने पिट्ठू अम्बेडकर से जलवाया था....
अम्बेडकर का चरित्र दोगला था...
जिस अम्बेडकर ने 25 दिसंबर 1927 को मनु स्मृति जलवाई वही अम्बेडकर मनुस्मृति पर आधारित हिंदू कोड बिल कानून मंत्री रहते हुए लाता है।
और सिख जैन और बौद्धों पर हिंदू कोड बिल थोपने की जबरदस्ती करता है। और तर्क देता है कि हिंदू धर्म के साथ मनु स्मृति का कानूनी ढांचा जुड़ा है....
आप सबूतों के साथ पढ़िए.....

डॉ अंबेडकर राइटिंग्स एंड स्पीचेज वॉल्यूम 14 भाग दो (खंड IV) पेज नंबर 887 और 888 ~

 जैसा कि मैं इसे समझता हूं, हिंदू धर्म की ख़ासियत यह है कि यह एक ऐसा धर्म है जिसके साथ एक कानूनी ढांचा भी जुड़ा हुआ है।  अब इस बात को ध्यान में रखना बहुत जरूरी है, क्योंकि अगर इसे ठीक से समझ लिया जाए तो यह समझना मुश्किल नहीं होगा कि सिखों को हिंदू धर्म के तहत क्यों लाया जाता है, बौद्धों को हिंदू धर्म के तहत क्यों लाया जाता है और जैनियों को क्यों।  को हिन्दू धर्म के अंतर्गत लाया जाता है।  जब बुद्ध वैदिक ब्राह्मणों से भिन्न थे, तो उनका मतभेद पंथ के मामलों तक ही सीमित था।  बुद्ध ने अपने अनुयायियों के लिए एक अलग कानूनी प्रणाली का प्रतिपादन नहीं किया;  उन्होंने कानूनी व्यवस्था को वैसे ही छोड़ दिया जैसा वह था।  हो सकता है कि उस समय जो क़ानूनी व्यवस्था थी वह एक अच्छी व्यवस्था थी;  कि इसमें कोई दोष या दोष नहीं था।  इसलिए, उन्होंने कुछ धार्मिक धारणाओं में किए गए परिवर्तनों के परिणामस्वरूप कानूनी प्रणाली में कोई बदलाव करने पर अपना ध्यान केंद्रित नहीं किया।
 इसी तरह, जब महावीर ने अपना धर्म स्थापित किया तो उन्होंने जैनियों के लिए कोई नई कानूनी व्यवस्था नहीं बनाई।  उन्होंने कानूनी व्यवस्था को जारी रखने की इजाजत दी और मुझे लगता है कि अगर मैं गलत हूं तो सरदार हुकम सिंह मुझे सही करेंगे, जब मैं कहता हूं कि दस गुरुओं में से किसी ने भी सिखों के लिए इस तरह की कोई कानून किताब नहीं बनाई।  मुसीबत यह है—आप इसे मुसीबत कह सकते हैं;  आप इसे सौभाग्य कह सकते हैं;  आप इसे दुर्भाग्य कह सकते हैं;  मैं शब्दों के बारे में विशेष नहीं हूं—सच तो यह है।  इस देश में भले ही धर्म बदल गए हों लेकिन कानून एक ही रहा है। इसीलिए सिख कानून का पालन करता है.
 जैन आते हैं और पूछते हैं, "आप हमारे साथ क्या करने जा रहे हैं? क्या आप हमें हिंदू बनाने जा रहे हैं?" सिख भी यही बात कहते हैं।  बौद्ध भी यही बात कहते हैं.  इस पर मेरा उत्तर यह है: मैं इसमें कुछ नहीं कर सकता।  आप एक ही कानून प्रणाली का पालन कर रहे हैं और अब किसी के लिए यह कहने में बहुत देर हो चुकी है कि वह इस कानूनी प्रणाली को पूरी तरह खारिज कर देगा और उसका इससे कोई लेना-देना नहीं होगा।  ऐसा नहीं किया जा सकता इसलिए, बौद्धों, जैनियों और सिखों पर हिंदू कानून और हिंदू कोड का लागू होना एक ऐतिहासिक विकास है जिसका अब आप और मैं कोई जवाब नहीं दे सकते।"
आपने पढ़ लिया तो समझ भी लो...
अम्बेडकर दोगले चरित्र का व्यक्ति था जो एक समय पर  मनु स्मृति को जलवा रहा है....
दूसरे समय पर उसकी वकालत करके जैन सिख और बौद्धों पर मनु स्मृति पर आधारित हिंदू कोड बिल थोप रहा है।
किताबें/ ग्रंथ जलाना महापाप है, किताबें पढ़ने के लिए होती हैं जलाने के लिए नहीं!

भीम भड़ुओं किताबें जलाना बंद करो.....


                 साभार... ! 
        दिनेश सिंह एल. एल. एम. 
                नई दिल्ली

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