Nibandh - Shabd di dhari talwar hote hai. शब्द द्विधारी तलवार होते है

Framing has lost the abiltiy to be a source of susistence for majority of Farmers in India. भारत में अधिकतर कृषकों के लिए कृषि जीवन -निर्वाह एक सक्षम स्रोत नहीं रही है।   
     
                                                             निबंध -१ भाग-२ 
                                                    शब्द द्विधारी  तलवार होते है 

८ नवम्बर २०१६ में प्रयुक्त ' नोटेबंदी ' शब्द का इस्तेमाल दैनिक समाचार -पत्र, रेडियो , टेलीविज़न में बखूबी प्रयुक्त हुआ , फिर यह जनभाषा का शब्द बन गया , लेकिन इसका देश में भौगोलिक स्तर पर इतना ज्यादा व्यापक प्रचार - प्रसार मिला की यह आमजन में प्रचलित हो गया , जिसका उपयोग  राजभाषा शब्दावली आयोग  ने अपने शब्दकोष में ' नोटेबंदी ' शब्द को शामिल किया और मान्यता दी  जो कि हिंदी व अंग्रेजी भाषा का सयुंक्त शब्द है।  

प्रतापनारायण मिश्र जी ने , जो कि हिंदी सहित्य के निबंधकार है ,  "बात" शीर्षक से संकलित अपने निबंध में लिखा है कि "बात की क्या बात है ? " , इन्होने अपने शीर्षक के माध्यम से समाज में प्रयुक्त शब्दों उनके अर्थो और उनके अर्थ के भिन्नताओं को, प्रयुक्ति  के आधार पर सामाजिक परिवेश से ओत -प्रोत करते हुुए बात की समझदारी , वाक्पटुता , कोलाहल , प्रेम-स्नेह , राग-अनुराग , द्वेष -ईर्ष्या के बारे में बतलाया है, इसमें यह भी स्पष्ट किया है कि कैसे बात में प्रयुक्त किये गये शब्द या बात "द्विधारी तलवार हो सकते है। " , इसके अतिरिक्त हम हिंदी के दो शीर्ष महाकाव्यों पर नजर डाले महाभारत या फिर रामचरितमानस के पंक्तिओ में यदा - कदा शब्दों की प्रकृति के बारे में कि  "शब्द द्विधारि तलवार होते है " कि  स्वीकारोक्ति मिल जाती है। 


शब्दों कि द्विधारिता से आशय शब्दों की प्रयुक्ति से है न कि हमेशा वैमनष्य , द्वेष , ईर्ष्या को निरूपित करते हैं , शब्द मेल- जोल का माध्यम भी है , रामचरितमानस में राम जब सीता जी खोज में वन-वन भटक रहे थे , तो हनुमान जी , श्रीरामचंद्र जी से वनराज सुग्रीव की मित्रता  , शब्दों की प्रयुक्ति के आधार पर ही करायी  थी ।  उन्होंने अपने शब्दों के द्वारा श्रीरामचंद्र जी का विश्वास जीता और विश्वास दिलाया कि किस प्रकार  माँ सीता की खोज में सहायता, वनराज सुग्रीव कर सकते है , इसी विश्वास को आत्मसात कर तथा हनुमान जी को अपना मित्र मानकर श्रीरामचन्द्र जी  वनराज सुग्रीव  से मित्रता की। 

शब्दों की प्रयुक्ति का विरोधाभाष का अर्थ समझकर तथा विश्वास जमाकर रावण ने गलत शब्द का इस्तेमाल कर माँ सीता जी का हरण किया , एक ओर शब्द विश्वास की दुहाई देकर आपसी सहृदयता में मित्रता - प्रेमस्नेह की स्वीकारोक्ति दिखती है तो दूसरी और  रावण द्वारा मुनिवेश धारण कर गलत शब्दों का इस्तेमाल के  द्वारा माँ सीता को विश्वास में लेकर , उनको अपना बंधक बनाना , शब्द की महिमा को अविश्सनीय , कायरतापूर्ण ,छल से भरी हुई कलंकित व्याख्या करती है।  

ठीक इसी प्रकार महाभारत में भी देखें तो शब्द को लेकर अनेक प्रसंग सारगर्भित दिखाई पड़ते हैं , महाभारत में पितामह भीष्म "शब्द " की प्रतिज्ञा लेकर जहाँ अपने शब्दों को ओजस्वी , अमर, दृढ़प्रतिज्ञ बनाते हुए , अपने दृढ़व्रत का पालन करते है और मृत्यु को प्राप्त करते है तो दूसरी ओर धुरविरोधी श्रीकृष्ण अपने भक्त की लाज बचाते हुए , उसकी यानि अपने भक्त की मर्यादा की रक्षा के लिए , अपने द्वारा अपने द्वारा तय "शाब्दिक प्रतिज्ञा " को भी तोड़ने से नहीं हिचकते , 
ठीक इसी प्रकार आचार्य द्रोणाचार्य को शब्दों द्वारा यह सुना जाना "अश्वस्थामा मरो नरो व कुंजरह  "  तथा प्रतिपक्षी पक्ष के सेनापति युधिष्ठर के द्वारा शब्द का उच्चारण किया जाना और बीच में श्रीकृष्ण के द्वारा संख की नादध्वनि युद्ध की समय उत्पन्न किया जाना , शब्द की चंचलिकता , विकारहीनता , बदला लेने लेने की भावना , कालंकिता को प्रकट करता है। 
शब्द की अपनी गरिमा है , शब्द का अपना सम्मान है , विश्वास है , पारदर्शिता है , प्रेम -स्नेह है , सदाचारिता है , परोपकारिता है ,जैसे शाब्दिक गुण समाज को एक आदर्श दिशा देता है। मनुष्य आदिकाल से शब्द की महिमा को समझता आया है और हमेशा सकारात्मक  सोच के द्वारा , विश्वास के द्वारा इसे प्रस्तुत कर रहा है।  समयचक्र जिस हिसाब से चल रहा है उसके गणित या शब्दीय रूप का निर्धारण  ही एक मानक  पर तय किया गया है अगर इसमें थोड़ी भी ढील हो जाय तो मानव का मानव से विश्वास उठ,जायेगा और जो  हम विश्वग्राम की बात कर रहे हैं इस संकल्पना को  अवश्य ही चोट पहुँच सकता है। 

किसी भी देश के संघ के संघवाद का निर्धारण , संविधान का निर्धारण शब्द की महिमा के ही आधार पर किया जाता है , अगर शब्द सुन्दर न हो , शब्दों में बिलगाव हो , शब्द राष्ट्र की संस्कृति को एक झलक में न प्रस्तुत करता हो तो देश का विकास बाधित हो सकता है और  देश को मानवपूंजी संसाधन का लाभ भी समुचित तरीके से नहीं मिल पायेगा। 

अंत में प्रतापनारायण मिश्र जी का कथन सर्वोच्च निर्कर्ष पर ले जाता है "बातहुँ  हाथी  पाईये , बातहुँ  पाहुहों  लात   "





















































































































































Comments

Popular Posts