Declared "Prayagraj Manifesto" by Museum Assosiation India. भारतीय संग्रहालय संघ द्वारा जारी हुआ "प्रयागराज घोषणा-पत्र"

Declared "Prayagraj Manifesto" by Museum Assosiation India



                                        (भारतीय संग्रहालय संघ के  हीरक जयंती समारोह की बैठक )

 प्रयागराज: भारतीय संग्रहालय संघ के  हीरक जयंती समारोह का दो दिवसीय अधिवेशन 16 मार्च दिन शनिवार को समाप्त हुआ। इस अधिवेशन का विषय था "राष्ट्रवाद और संग्रहालय",  इलाहाबाद संग्रहालय में जुटे देशभर के संग्रहालयविदों  और पुरातत्वविदों  ने भारतीय राष्ट्रवाद के विविध पक्षों पर प्रकाश डाला। राष्ट्रवाद पर अपने विचार प्रस्तुत करते हुए भारतीय संग्रहालय संघ के सेक्रेटरी डॉ आनंद वर्धन ने कहा कि इस प्रयाग की धरती में क्रांति की 52 बयार बहा करती थी। इस प्रयाग की धरती ने देश की आजादी के लिए तो क्रांतिकारी दिए हैं लेकिन इसके साथ ही साथ साहित्यिक क्रांतिकारियों का योगदान  की उपलब्धता ने भी  इस प्रयाग की धरा को निखारने  में कोई कमी नहीं की । उन्होंने निराला की इन पंक्तियों को दोहराया-

                                   पश्चिम की उक्ति नहीं है,
                                   गीता है, गीता है।
                                                       
                                                              स्मरण करो बार-बार ,
                                                              सिंह के मांद में आया है सियार।।



(राष्ट्रवाद पर अपने विचार प्रस्तुत करते हुए भारतीय संग्रहालय संघ के सेक्रेटरी डॉ आनंद वर्धन )

       उन्होंने राष्ट्रवाद पर अपने विचार प्रस्तुत करते हुए यह बताया कि यह संग्रहालय उस पार्क में स्थित है, जिसकी भूमि महान क्रन्तिकारी चंद्रशेखर आजाद के रक्त से सिंचित है और हमें उस आजादी के संघर्ष पूर्ण दिनों के याद को हमें ताजा महसूस कराती है, जिसे हम बचपन के दिनों में किताबों में पढ़कर महसूस करते है,  और उन्होंने आगे बताया कि चंद्रशेखर आजाद की स्मृति में ही इस इलाहाबाद संग्रहालय में 10 करोड़ की लागत से आजाद गैलरी का निर्माण किया जा रहा है। उन्होंने एक बार फिर हिंदी जगत के श्रेष्ठ कवि रश्मिरथी के रचयिता  दिनकर जी की कविता विपथ गामिनी की चंद पंक्तियों का मर्मस्पर्शी उल्लेख किया ---

                       महसूस कराती है मुझे,
                       विपथ गामिनी से ना पूछ,
                      किस रोज किधर ,
                       मै जाऊंगी।

                                 कब जाग मैं ,
                                 इस क्रुद्ध मिट्टी से,
                                अंबर में आग लगाऊंगी।

                                                      मेरे माथे को मोर मुकुट ,
                                                      वशुकाल सर्पनी के सर्फरन,


                                                                       मुझे चीर कुमारी  के माथे पर,
                                                                       नित्य नवीन रुधिर चंदन।


                                                                                          अंजा करती हूं महाकाल,
                                                                                          मै आंखों में लेकर ,
                                                                                          दृग अंजन।

                                          संघार लहर की चीर पहन,
                                           नाचा करती,
                                          छूम छनन छनन
                                          छूम छनन छनन।

इस अधिवेशन में इलाहाबाद संग्रहालय के कार्यकारी अधिकारी डॉ राजेश मिश्रा ने संग्रहालय और म्यूजियम की अवधारणा को स्पष्ट करते हुए,  उत्तम कोटि के संग्रहालय के संदर्भ में विचार व्यक्त किया तथा संग्रहालय में दिनोंदिन घटती दर्शकों की संख्या पर अफसोस जताया। उन्होंने बताया कि संग्रहालयों मे उत्खनन से प्राप्त, विभिन्न वस्तुओं को अधिक मात्रा में तो रख दिया जाता है परंतु उससे संबंधित वस्तु की ऐतिहासिकता को नहीं बताया जाता।

 संबंधित वस्तु की ऐतिहासिकता में बस इतना लिखा होता है कि यह चार हजार ईसा पूर्व की है या 5000 ईसा पूर्व की है। उन्होंने इसके लिए पुरातत्व क्रियाविधियों को भी जिम्मेदार ठहराया और कहा कि उत्खनन से प्राप्त वस्तुओं को संग्रहालयों में तो भेज दिया जाता है, लेकिन उससे संबंधित रिपोर्ट नहीं भेजी जाती, जिसके कारण  उससे संबंधित वस्तु का ऐतिहासिक महत्व सामने नहीं आ पाता।

संग्रहालय विधि द्वारा यह भी  बताया गया कि ऐतिहासिक व पुरातात्विक वस्तुओं को जब तक उसकी ऐतिहासिक कहानी, उसके ऐतिहासिक महत्व के साथ नहीं जोड़ा जाएगा तब तक,  नई पीढ़ी उसे सहज व सरल ढंग से स्वीकार नहीं करेगी।

उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि इतिहास को कूड़े के ढेर पर नहीं लिखा जाता है और नहीं इससे संबन्धित चीजों को कूड़े के ढेर पर रखा जाता है ।  संग्रहालय विशेषज्ञों और पुरातत्वविदों  को संग्रहालय में रखी गई, वस्तुओं को, उसकी ऐतिहासिक विरासत  के साथ जोड़ना होगा।

यदि आपको संग्रहालयों में , आने वाले आगंतुकों की संख्या में वृद्धि करना है तो इसके लिए आपको,  अपने कला-इतिहासकारों  और पुरातत्वविदों के साथ सामंजस्य स्थापित करना होगा।  तभी हम लोगों  को आगामी  भविष्य के उत्तमकोटि  के संग्रहालय की, अवधारणा को साकार करने में  मदद मिलेगी, जो हमारे  आने वाले भावी पीढ़ी के नवयुवकों का मार्गदर्शन करेगी।

डॉ राजेश मिश्रा ने आगे बताया कि प्रयाग के महत्व को गुप्तकालीन राजाओं ने भी पहचाना था।  इसीलिए समुद्रगुप्त ने अपने अभिलेख में प्रयाग के महत्व को ज्ञापित करते हुए, उसे "प्रयाग प्रशस्ति" का नाम दिया।

 आज इस अधिवेशन के समापन सत्र में, निष्कर्ष के रूप में, एक और प्रशस्ति लिखी गई जो कि   "प्रयागराज घोषणा पत्र" है।  यह पत्र  भारतीय संग्रहालय संघ के अध्यक्ष डॉ पीके शर्मा द्वारा इस "प्रयागराज घोषणा पत्र " को जारी किया गया।

इससे पहले सर्वोच्च न्यायालय संग्रहालय के सह निदेशक राजेश प्रसाद और बीएचयू की प्रोफेसर उषा तिवारी तथा अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के डॉक्टर सलीम ने भी अपना वक्तव्य तथा मंतव्य प्रस्तुत किया ।

अंततः  डॉ आनंद वर्धन ने साररूप में बताया कि  भारतीय संग्रहालय संघ का यह अधिवेशन पूर्णतया सफल रहा।






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