ज्ञान का सबसे बड़ा शत्रु अज्ञानता नहीं बल्कि भ्रम है
प्रयागराज : आदि काल से लेकर, आज तक सभ्यताओं में नित नए-नए रूप बदले हैं जब जब सभ्यताओं ने अपने विकास के चरमोत्कर्ष को छुआ है , तब तब उनकी परिणति संस्कृति में हुई है और संस्कृतियां भी नित नई करवटें लेती रहती है। समय का चक्र निरंतर चलता रहा है, पर यदि नहीं रुका तो वह मानव जीवन का विकास क्रम और उसके द्वारा ज्ञान प्राप्त करने तथा सीखने की अनवरत यात्रा। परिवर्तन और विकास, प्रकृति के साश्वत सत्य है, के सिद्धांत के अनुरूप भी मानव आदि युग से शुरू कर , आज मशीनों के युग में प्रवेश कर चुका है। निस्संदेह यह ज्ञान का मानव के व्यक्तित्व के सर्वांगीण विकास में महत्वपूर्ण योगदान रहा है-
ज्ञान तो वह चित्रकार है, जो विद्या की तली लेकर,
भावों के नूतन रंगों से, मानव का रूप सजाती है।
इस तरह मानव विकास के अपने इस सतत क्रम में निरंतर ज्ञान के महत्व को समझता गया और ज्ञान- विज्ञान के नए-नए क्षेत्रों का शोध और अनुसंधान ओं के माध्यम से विकास करता गया। आदि काल में हुई ज्ञान की प्रगति निरंतर वैदिक काल व मध्यकाल में विदेशों से सांस्कृतिक संपर्क होते हुए भी वर्तमान में आधुनिक नवजागरण तक पहुंच गया। वास्तव में अज्ञानता, ज्ञान का सबसे बड़ा शत्रु नहीं है बल्कि अज्ञानता ज्ञान का पूरक है। अज्ञानता वह क्षेत्र है जहां से ज्ञान प्रस्फुटित होता है, स्पष्ट है कि ज्ञान की कोई निश्चित सीमा नहीं है अर्थात ज्ञान असीमित है। ज्ञान उस अनंत तक फैले हुए आकाश की तरह है जिसका ना तो आदि है और ना ही अंत। इसी तरह सुकरात ने, इस मर्म को सदियों पहले समझते हुए कहा था- मैं ज्ञानी इस अर्थ में हूं क्योंकि मैं यह यह जानता हूं कि मैं कुछ नहीं जानता। इसका सीधा सा अभिप्राय है कि हम ज्ञान के विकास के साथ-साथ जैसे-जैसे बौद्धिक चेतना के सोपान चढ़ते हैं , हमें निरंतर अपने ज्ञान की लघुता और अल्पज्ञ ता का बोध होता जाता है। शायद इसीलिए गांधी जी ने कहा था कि हमें अपनी खिड़की -दरवाजे को आने वाली हवाओं के लिए खोले रखना चाहिए। यह अकारण ही नहीं था कि ऋग्वेद के ऋषि चारों दिशाओं से ज्ञान को आमंत्रित कर रहे थे-
आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतः
वास्तव में ज्ञान अज्ञानता की एक प्रभावशाली खोज है। जैसे-जैसे हम ज्ञान के इस अथाह तथा असीमित सागर में डुबकी लगाते हैं तथा इससे प्राप्त ज्ञान रूपी अनुभव के मोती हमें इस बात का एहसास कराते हैं कि अभी बहुत कम ज्ञान अर्जन किया है और अभी तो बहुत कुछ बाकी है। ज्ञान की कोई निश्चित परिभाषा नहीं है क्योंकि ज्ञान स्वयं में अनंत है और इसलिए पूर्ण ज्ञान प्राप्त करना लगभग असंभव है तभी तो ज्ञान को कुछ इस तरह एक छोटे से इस लोक के माध्यम से परिभाषित किया गया है।
आत्म ज्ञानं परम ज्ञानं
अर्थात स्वयं की प्रवृत्ति तथा क्षमताओं का पूर्ण ज्ञान रखना या स्वयं को पहचानना ही सबसे बड़ा ज्ञान है। इसी संदर्भ में डॉक्टर ब्रह्म प्रकाश जी ने, डॉ एपीजे अब्दुल कलाम जी को सलाह दिया था कि- यह मत देखो कि दूसरों की तुलना में तुम्हारे पास कितना ज्ञान है बल्कि इसके बजाय अपने ज्ञान तथा योग्यताओं को बढ़ाने की कोशिश करो। जीवन के हर क्षेत्र में हम हर रोज, इसी तरह के तथ्यों से दो चार होते रहते हैं।
धार्मिक दार्शनिक व आध्यात्मिक क्षेत्र में देखें तो ज्ञान भिन्न रूप में परिभाषित होता है इसी तरह भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को वास्तविक ज्ञान का ज्ञान देते हुए, ज्ञान को इस श्लोक के माध्यम से परिभाषित करते हैं-
अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम्।
आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः।
इन्द्रियार्थेषु वैराग्यमनहङ्कार एव च।
जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम्।।13.9।।
असक्ितरनभिष्वङ्गः पुत्रदारगृहादिषु।
नित्यं च समचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु।।13.10।।
मयि चानन्ययोगेन भक्ितरव्यभिचारिणी।
विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि।।13.11।।
अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम्।
एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोन्यथा।।13.12।।
अर्थात विनम्रता, दंभ हीनता, अहिंसा , सहिष्णुता , सरलता , प्रमाणिक गुरुओं के पास जाना , पवित्रता , स्थिरता, आत्म संयम , इंद्रिय तृप्ति के विषयों का परित्याग, अहंकार का अभाव ,जन्म- मृत्यु, वृद्धावस्था तथा रोगों के दोषों की अनुभूति, वैराग्य, संतान, स्त्री, घर तथा अन्य वस्तुओं की ममता से मुक्ति, अच्छी तथा बुरी घटनाओं के प्रति समभाव, मेरे प्रति निरंतर अनन्य भक्ति, एकांत स्थान में रहने की इच्छा, जनसमूह से अलगाव , आत्मसाक्षात्कार की महत्ता को स्वीकार करना तथा परम सत्य की दार्शनिक खोज , इन सबको मैं वासुदेव देवकी नंदन कृष्ण -ज्ञान घोषित करता हूं और इनके अतिरिक्त जो भी है वह सब कुछ अज्ञान है, छलावा है।
भारतीय षड्दर्शन व जैन बौद्ध दर्शन से नव्य वेदांत तक नित -नवीन ज्ञान सामने आता रहा है और ईश्वर जीव- जगत के रहस्य पर से पूरी तरह से पर्दा उठाना अभी भी बाकी है। पश्चात दर्शन में भी सुकरात, प्लेटो, अरस्तू से लेकर, कांट, हीगल, कार्लमार्क्स तक के दर्शनों की , अनसुलझी पहेलियां, अभी भी मानव के लिए अबूझ ही है ।
यदि इस क्षेत्र में कोई अस्पष्ट निष्कर्ष प्राप्त हुए होते तो विश्व भर में इतनी परस्पर, विभिन्न धार्मिक तथा दार्शनिक मान्यताएं अस्तित्व में ना होती। लिहाजा मानव ज्ञान के लिए पर्याप्त अध्ययन करने के बाद , वह यह अनुभव करता है कि अभी हम ज्ञान की कुछ बूंदें ही चख पाए हैं और अभी पूरा सागर बाकी है। संत कबीर जी ने भी अपने इस अनुभव को कुछ इस तरह से व्यक्त किया था-
पोथी पढ़ पढ़ जग मुआ,
पंडित भया न कोई।
इसी तरह पिछली सदी के युगपुरुष राष्ट्रपिता महात्मा गांधी, ने अपनी 'आत्मकथा सत्य के साथ मेरे प्रयोग' में अनेक स्थानों पर अपनी अल्पज्ञता, भूलों, और त्रुटियों की ओर संकेत किया है।अक्सर यह देखा गया है कि जिन भी महापुरुषों ने प्रज्ञा के उच्च स्तर को छुआ है उन्होंने अपने अज्ञान को उतनी ही ईमानदारी से स्वीकार किया है। किसी ने सच ही कहा है कि-
बड़े बड़ाई ना करें, बड़े न बोले बोल।
रहिमन हीरा कब कहे, लाख टका मेरो मोल।।
विश्व भर के साहित्य को पड़ने पर हम पाते हैं कि दुनिया में कितनी विविधता है और हम अभी इसके बारे में कितना कम जानते हैं।इसके अतिरिक्त औपचारिक अध्ययन के दायरे से बाहर, जो मुक्त भ्रमण के माध्यम से ज्ञानार्जन है वह भी जीवन को समझने का एक महत्वपूर्ण माध्यम है। निदा फ़ाज़ली लिखते हैं-
धूप में निकलो, घटाओं में नहा कर देखो।
जिंदगी क्या है, किताबों को हटा कर देखो।।
इस तरह हम जीवन के प्रत्येक क्षेत्र और स्तर पर अनुभव करते हैं कि ज्ञान हमें इस बात का बोध कराता है कि हम कितने अज्ञानी हैं।
व्यावहारिक तथा प्रयोगिक ज्ञान प्रत्येक जीव के जीवन में आदि काल से ही महत्वपूर्ण रहा है जो कि वर्तमान में उतना ही महत्वपूर्ण और प्रसांगिक है। प्रागैतिहासिक काल में नए आविष्कारों के लिए मानव के पास कोई अध्ययन सामग्री नहीं होती थी, वह अपने व्यवहार ओं में नए-नए प्रयोगों से ही नए- नए अविष्कार करते गए। इसी तरह 1896 में जब राइट बंधु चमगादड़ से प्रेरित होकर हवाई जहाज का निर्माण कर रहे थे तो उनको देखकर जॉन ट्राविज एक कविता लिखते हैं-
बांस और सुथरी से, मोम से हथौड़े से,
कुंडो से पेंचो से, जोड़कर जुगाड़ कर,
चमगादड़ से प्रेरित, दो भाई दीवाने
झोंक रहे कोयला, फूंक रहे धौअंकानी
बना रहे हैं देखो तो, लकड़ी की एक परी।
यदि ज्ञान को व्यवहार में तथा आचरण में ना लाया जाए तो उस ज्ञान का कोई अर्थ नहीं होता अर्थात अर्थ हीन होता है तथा इस प्रकार का ज्ञान निश्चित रूप से अज्ञान के ही तुल्य है क्योंकि मनभर ज्ञान से कण भर आचरण श्रेष्ठ होता है। ऑस्कर वाइल्ड कहते हैं कि- प्रयोगिक ज्ञान में सीधे तौर पर अपनी गलतियों तथा उसके साथ प्राप्त निष्कर्षों को ही हम अनुभव का नाम देते हैं। इसी संदर्भ में आचार्य चाणक्य कहते हैं कि- दूसरों की गलतियों से सीखो, अपने ऊपर प्रयोग करके सीखने पर आयु कम पड़ जाएगी।
अर्धज्ञान- हम समाज में अपने आसपास अक्सर कुछ ऐसे लोगों को देखते हैं जो थोड़ा बहुत अध कचरा ज्ञान जुटाकर सेखी बघारते हैं तथा समाज में अपने पांडित्य का प्रदर्शन करते घूमते हैं। ऐसे व्यक्तियों के लिए यह मुहावरा बिल्कुल तर्कसंगत और उचित प्रतीत होता है
थोथा चना, बाजे घना।
लेकिन जो सचमुच ज्ञानी प्रबुद्ध और सुशिक्षित लोग हैं वह ऐसा नहीं करते क्योंकि-
संपूर्ण कुम्भो न करोति शब्दं अर्धघटो घोषमुपैति नूनं।
विद्वान कुलीनो न करोति गर्वं गुणैर्विहीनो बहु जल्पयन्ति
अर्थात :- एक आधा भरा घड़ा हमेशा जोर से आवाज बनाता है, जबकि पानी से भरा एक घड़ा, किसी भी ध्वनि पैदा नहीं करता है। जैसे विद्वान व्यक्ति कभी अपनी उपलब्धियों पर बड़ाई नहीं करता और गुणहीन व्यक्ति हमेशा अपनी उपलब्धियों पर गर्व प्रदर्शित करता है |
जिस तरह भरा हुआ घड़ा, आवाज नहीं करता उसी तरह ज्ञानी व्यक्ति भी यह जानता है कि ज्ञान का विस्तार असीम है और ज्ञान व शिक्षा के विकास के अनुपात में उसे अपनी अज्ञानता का भी स्पष्ट बोध हो जाता है। ज्ञानी लोग व्यर्थ ही अपने पांडित्य का प्रदर्शन नहीं करते और ना ही अपने ज्ञान पर इतराते हैं क्योंकि वे स्वयं को अज्ञानी तथा अल्पज्ञ मानते हैं। ऐसा सहज इसलिए नहीं होता कि वे अपनी विनम्रता का प्रदर्शन करना चाहते हैं बल्कि वह सच में इस तथ्य का अनुभव कर पाते हैं कि ज्ञान अपने अज्ञानता की एक प्रगतिशील खोज है।
भ्रम की उत्पत्ति अर्धज्ञान से होती है। जब हम भ्रमित होते हैं तो सत्य का सही आकलन नहीं कर पाते और ना ना ही ऐसा करना चाहते हैं क्योंकि हम भ्रमित होते हैं। भ्रमित होने पर हम अपने ज्ञान को ही सत्य और श्रेष्ठ समझते हैं तथा अपने तर्कों से उसे सत्य व श्रेष्ठ सिद्ध करने का भरपूर प्रयास भी करते हैं। भ्रम अपने आप में एक भ्रामक शब्द है जिसके कारण हम किसी भी कार्य को करने की स्थिति में नहीं होते क्योंकि हम विस्मय और भ्रमित होते है।
अज्ञान ज्ञान का कभी विरोध नहीं करता जबकि भ्रम अपनी पूरी क्षमता के साथ ज्ञान का विरोध करता है। ज्ञान की चर्चा होने पर अज्ञान रहता है जबकि भ्रम ऐसा नहीं करता। अज्ञानी को सदैव अपनी अज्ञानता का बोध रहता है जबकि भ्रमित व्यक्ति को स्वयं ही नहीं पता रहता कि वह भ्रमित है। अज्ञानी व्यक्ति किसी भी नए कार्य को करने से पहले किसी योग्य व्यक्ति से अपने मार्गदर्शन की अपेक्षा रखता है जबकि भ्रमित व्यक्ति ऐसा नहीं करता।
इसलिए अज्ञानी व्यक्ति अपनी अज्ञानता के बाद भी गलत करने से बच जाता है जबकि भ्रमित व्यक्ति खुद को सही मानते हुए वह गलत कार्य कर जाता है और गलत हो जाने के बाद ही उसे अपने भ्रम का एहसास होता है। कोई भी अज्ञानी व्यक्ति ज्ञान को दूषित नहीं कर सकता क्योंकि ज्ञान की चर्चा होने पर अज्ञान मौन रहता है जबकि भ्रम ऐसा कर सकता है। यदि भ्रम अपने चरम पर पहुंच जाए तो वह संबंधित प्राणी के विनाश का कारण भी बन सकता है इसी संदर्भ में कहा गया है-
माया दीपक नर पतंग, भ्रमि भ्रमि इवैं पडंत।
अतः निष्कर्षत यह कहना बिल्कुल भी अनुचित प्रतीत नहीं होता कि ज्ञान का सबसे बड़ा शत्रु अज्ञानता नहीं बल्कि भ्रम है।















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