कांग्रेसका उत्कर्ष और पतन

प्रयागराज: कांग्रेस का गठन क्यों किया गया यदि इस पर विचार किया जाए तो स्पष्ट होता है कि कांग्रेस के गठन का विचार भारत के प्रथम मुक्तिसंग्राम 1857 से प्रेरित था। यह तो सबको विदित है कि भारत के प्रथम मुक्तिसंग्राम 1857 ने अंग्रेजी  हुकूमत को अंदर तक झकझोर कर रख दिया था। इस क्रांति का दमन करने में अंग्रेजों के पसीने छूट गए थे । इस क्रांति के पश्चात ब्रिटिश हुकूमत में सदैव यह भय व्याप्त था कि ना जाने कब किधर से भारतीयों द्वारा भारत की मुक्ति के लिए संग्राम छोड़ दिया जाए यदि इस प्रकार की एक - दो प्रचंड क्रांतियां और हो गई तो भारत निश्चित रूप से अंग्रेजी हुकूमत के हाथों से निकल जाएगा।

कांग्रेस अंग्रेजी हुकूमत के इसी भय को समाप्त करने के लिए वायसराय लॉर्ड डफरिन के मानस की उपज थी। जिसका उद्देश्य अंग्रेजी हुकूमत के लिए एक सेफ्टी वाल्व की तरह काम करना था, ताकि 1857 की क्रांति भारत में दोबारा ना हो सके। लॉर्ड डफरिन के मानस की उपज को साकार रूप देते हुए एलेन ऑक्टेवियन ह्यूम ने 28 दिसंबर 1885 को मुंबई में कांग्रेस का गठन किया जिसके प्रथम अधिवेशन के प्रथम अध्यक्ष ब्योमेश चंद्र बनर्जी बने थे।

 कांग्रेस के गठन के पीछे अंग्रेजी हुकूमत का जो भी उद्देश्य रहा हो, लेकिन भारतीयों के लिए यह एक ऐसा मंच था जहां पर भारतीयों को एक साथ एकत्रित होकर विचार-विमर्श करने का अवसर उपलब्ध हो सका। वर्षों से अंग्रेजी हुकूमत के शोषण व अत्याचार के कारण भारतीयों की स्थिति दयनीय हो चुकी थी। उनके पास खाने को भोजन पहनने को कपड़ा नहीं था इस तरह से भूखे, नंगे, दरिद्र, विपन्न भारतीयों में इतना साहस व सामर्थ नहीं था कि हर कोई अंग्रेजों से अपने अधिकार व सुविधाओं के लिए मांग कर सके। भारतीयों में अंग्रेजों का भय इस कदर व्याप्त था कि यदि एक अंग्रेज सिपाही भी गांव में आ जाए तो पूरे के पूरे गांव में सन्नाटा छा जाता था, ऐसे भारतीयों के लिए कांग्रेसी एक मंच का काम करने लगी थी जहां भारतीय लोग सत्तू खाकर कई दिन और हफ्ते बिता दिया करते थे तो कई भूखे पेट या आधे पेट ही अक्सर सो जाया करते थे ऐसे भारतीय भी अब कांग्रेस के मंच पर अपनी समस्याओं और मांगों को ब्रिटिश शासन के समक्ष प्रस्तुत प्रस्तुत करने लगा था। क्या सवर्ण, क्या दलित व पद दलित, क्या हिंदू और क्या मुसलमान, उत्तर भारत हो या दक्षिण, पूरब या पश्चिम, हिंदी भाषी हो या अन्य पूरे भारत के लोग कांग्रेस के मंच पर एकत्रित होने लगे थे। जिसे देख कर यह कहना बिल्कुल भी अनुचित प्रतीत नहीं होता है कि कांग्रेस पूरे भारत के प्रतिनिधित्व की अवस्था में पहुंच गई थी।

भारतीयों द्वारा कांग्रेस के मंच से ही भारतीयों की समस्याओं के समाधान के लिए व अन्य मांगों के लिए बड़ी ही उदारता और विनम्रता के साथ ब्रिटिश शासन से अपील किया जाता था और अंग्रेजी हुकूमत द्वारा भारतीयों को उनकी समस्या के आंशिक समाधान का लॉलीपॉप पकड़ा दिया जाता था।

कांग्रेस के मंच पर हिंदू और मुसलमान को एक साथ एकत्रित हुआ देखकर अंग्रेजी हुकूमत में एक बार फिर से भय का संचार हुआ और अपने इस भय को समाप्त करने के लिए उन्होंने फूट डालो और राज करो की नीति अपनाई। हिंदू और मुसलमान को आपस में लड़ाने की नीति, कहीं पर मुसलमानों को विशेष सुविधा देकर हिंदुओं की उपेक्षा की तो कहीं पर हिंदुओं को विशेष सुविधा देकर मुसलमानों की उपेक्षा की।

यह भेदभाव जब अपनी प्रबलता पर पहुंचा तो अंग्रेजों ने बंग-भंग का सहारा लिया और 1905 में बंगाल का विभाजन कर दिया। हिंदू और मुसलमान के मतभेदों के परिणाम स्वरुप ही 1906 में मुस्लिम लीग अस्तित्व में आई। मुस्लिम लीग और कांग्रेस में मतभेद और मत अंतर स्वाभाविक था। ब्रिटिश द्वारा बंग-भंग किए जाने के कारण कांग्रेस ने भी अब कड़े रुख अख्तियार करने शुरू कर दिया और अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ बड़े पैमाने पर आंदोलन शुरू कर दिया। इसी बीच 1915 में महात्मा गांधी का भारतीय राजनीति में पदार्पण हुआ जिससे भारतीय आंदोलनों को विशेष संबल मिला।

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