बेलन घाटी सुर्खियों में ।

बेलन घाटी में शोधार्थियों का जमावड़ा।

                                     
प्रयागराज: इलाहाबाद विश्वविद्यालय के संघटक महाविद्यालय ईश्वर शरण पीजी कॉलेज के प्राचीन इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग द्वारा बृहस्पतिवार को परास्नातक और स्नातक के विद्यार्थियों को कोरांव तहसील के अंतर्गत बेलन घाटी स्थित आधा दर्जन से अधिक महत्वपूर्ण प्रागैतिहासिक पुरास्थलों का शैक्षणिक भ्रमण कराया गया।

गौतलब है कि भारतीय प्रागैतिहासिक काल में बेलन घाटी को अतिशय महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। यहाँ चार से पाँच दशक पूर्व इलाहाबाद विश्वविद्यालय के प्राचीन इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग के प्रोफेसर जी आर शर्मा व उनकी सहयोगी टीम द्वारा पुरातात्विक सर्वेक्षण, उत्खनन तथा भूतात्विक अन्वेषण कार्य कराया गया था।


   (प्रागैतिहासिक पूरास्थलों के सर्वेक्षण एवं उत्खनन की बारीकियों से विद्यार्थियों को अवगत कराते हुए डॉ. जमील अहमद)

शैक्षणिक भ्रमण का नेतृत्व कर रहे विभाग के असिस्टेंट प्रोफ़ेसर डॉ जमील अहमद ने विद्यार्थियों को बेलन घाटी का इतिहास व उसके महत्व को समझाया तथा प्रागैतिहासिक पुरास्थलों के सर्वेक्षण एवं उत्खनन की बारीकियों से अवगत कराते हुए समुचित प्रशिक्षण भी प्रदान किया। छात्र-छात्राओं के दल को सर्वप्रथम खजुरी से १२ किमी दक्षिण हनुमानगंज की १५० मी से अधिक ऊँची कोस्कन गाढ़ा की पहाडियों पर उच्च पूर्वपाषाण तथा मध्यपाषाण कालीन प्रागैतिहास शैलचित्रों का दर्शन कराया गया।

शिलाश्रयों की दीवारों व छतों पर पशुओं, वनस्पतियों के साथ-साथ मानवीय क्रियाकलापों का अंकन मौजूद है। इसके पश्चात् प्रसिद्ध पूरास्थल डैया का भ्रमण कराया गया, जहाँ के 18 मीटर ऊँचे अनुभाग से प्रस्तरयुगीन संस्कृति के निम्न पूर्वपाषाण काल से लेकर नवपाषाण काल तक के क्रमिक विकास का दिग्दर्शन होता है।

पुरातत्ववेत्ता डॉ सांकलिया ने यहाँ के क्रमिक विकास वाले अनुभाग को टेक्स्ट-बुक सेक्शन (Text-book Section) कहा था। डैया के पश्चात छात्रों को मध्यपाषाण कालीन पुरास्थल चोपनी मांडो पर उसके तीन सांस्कृतिक उपकालों के विषय में जानकारी प्रदान की गई। विद्यार्थियों ने यहां सर्वेक्षण से प्राप्त किये गये विभिन्न प्रकार के लघुपाषाण उपकरणों (Microliths) का पहचान कर उनको वर्गीकृत करने का कार्य किया।

तत्पश्चात दल ने नवपाषाण कालीन पुरास्थलों कोल्डिह्वा (Koldihwa) तथा महगढ़ा (Mahagara) के भी दर्शन किये। ज्ञातव्य है कि कोल्डिह्वा से ही चावल (धान) की खेती (धान की किस्म – ओरईज़ा सतिवा इंडिका /Oryza Sativa Indica) के प्राचीनतम प्रमाण (लगभग ७००० ई.पू.) मिले हैं।

इन दोनों पुरास्थलों कोल्डिह्वा तथा महगढ़ा को विश्व की प्राचीनतम गाँव होने का भी गौरव प्राप्त है। इसके अतिरिक्त विद्यार्थियों के दल को कोटिया, मोरहना पहाड़, बटाऊबीर आदि स्थलों का भी भ्रमण कराया गया. विद्यार्थियों ने सभी पुरास्थलों पर जीपीएस प्रणाली का प्रयोग किया।


   (बेलन घाटी से प्राप्त हड्डी की बनी हुई मातृदेवी की मूर्ति)

पुराविद डॉ जमील अहमद ने रेखांकित किया कि बेलन घाटी के लोहंदा नाले के तृतीय ग्रेवल के अपरदित जमाव (उच्च पूर्वपाषाण काल) से हड्डी की बनी हुई मातृदेवी (Mother In) की एक मूर्ति की प्राप्त हुई थी, जिसे पूरे विश्व में कला की प्रथम अभिव्यक्ति के रूप में माना जाता है। इस शैक्षणिक भ्रमण में विभाग की असिस्टेंट प्रोफ़ेसर डॉ रागिनी राय, कृष्णा सिंह तथा अतिथि प्रवक्ता डॉ अश्वनी राय ने भी बेलन घाटी के विषय में महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान की।

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