"मजरूह" सुलतानपुरी ( असरारुल हसन खां ) को किया गया याद
प्रयागराज: उर्दू के मशहूर शायर व हिंदी सिनेमा के मशहूर गीतकार असरारुल हसन खां "मजरूह" सुल्तानपुरी के शताब्दी समारोह के अवसर पर जोश एंड फ़िराक़ लिटरेरी सोसायटी और अंजुमन-ए-अदब के संयुक्त तत्वाधान में सर तेज बहादुर सप्रू हाल में एक गोष्ठी का आयोजन किया गया।
मजरूह सुलतानपुरी की कुछ प्रमुख शायरियां
मैं अकेला ही चला था जानिब-ए-मंज़िल मगर
लोग साथ आते गए और कारवाँ बनता गया।
बहाने और भी होते जो ज़िंदगी के लिए
हम एक बार तिरी आरज़ू भी खो देते ।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए बीएचयू में उर्दू के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रोफेसर याकूब़ यावर ने कहा कि मजरूह सुल्तानपुरी उन गीत कारों में शुमार हैं जिन्होंने हिंदुस्तानी सिनेमा में अपनी शर्तों पर काम किया।अब कारगह-ए-दहर में लगता है बहुत दिल
ऐ दोस्त कहीं ये भी तिरा ग़म तो नहीं है ।
ग़म-ए-हयात ने आवारा कर दिया वर्ना
थी आरज़ू कि तिरे दर पे सुब्ह ओ शाम करें ।
उनकी शायरी को समझने के लिए हमें उनकी गजलों का अध्ययन करना होगा। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि प्रोफेसर लाल बहादुर वर्मा ने कहा कि हमारे शायरों व अदीबों ने अक्सर हिंदुस्तानी सिनेमा को नजर अंदाज किया है। लेकिन हमें गर्व है कि मजरूह सुलतानपुरी व साहिर लुधियानवी जैसे लोगों ने हिंदी फिल्मों में अपनी धाक जमाई और हिंदी फिल्मों में उर्दू साहित्य को समावेशित किया। जिसके जरिए उनके वख़्की पसंद विचार भी आवाम तक पहुंचे।ज़बाँ हमारी न समझा यहाँ कोई 'मजरूह'
हम अजनबी की तरह अपने ही वतन में रहे।
जफ़ा के ज़िक्र पे तुम क्यूँ सँभल के बैठ गए
तुम्हारी बात नहीं बात है ज़माने की ।
प्रोग्राम के विशिष्ट अतिथि जामिया मिल्लिया विश्वविद्यालय में उर्दू विभाग के प्रोफेसर अहमद महफूज ने अपने वक्तव्य में कहा कि अदब में मिकदार नहीं मेयार लिखा जाता है। मजरूह ने आदबी शायरी कम की लेकिन वो मेयारी है।तुझे न माने कोई तुझ को इस से क्या मजरूह
चल अपनी राह भटकने दे नुक्ता-चीनों को।
मजरूह की गज़लें उनके समकालीन शायरों की गज़लों से किसी दर्जे पर कमतर नहीं है। इसके अलावा एडवोकेट वजाहत हुसैन खां, फ़ज्ले हसनैन, डॉक्टर सालेह ज़र्रीन डॉक्टर मोहम्मद इरफान वगैरह ने भी अपनी खयालात पेश किए।सुतून-ए-दार पे रखते चलो सरों के चराग़
जहाँ तलक ये सितम की सियाह रात चले ।
प्रोग्राम का संचालन प्रोफेसर अली अहमद फत्मी ने किया व शुक्रिया मददगार हुसैन रिजवी ने अदा किया। सौदागर में मुख्य रूप से कर्नल सैयद अबरार अहमद सैयद रिजवान अली यश मालवीय अंशु मालवीय प्रोफेसर अनीता को देश डॉक्टर हसीन जिलानी अख्तर डॉक्टर अफाक अहमद अहमद हुसैन और अहमद हसनैन उपस्थित थे।
ऐसे हंस हंस के न देखा करो सब की जानिब
लोग ऐसी ही अदाओं पे फ़िदा होते हैं ।
कोई हम-दम न रहा कोई सहारा न रहा
हम किसी के न रहे कोई हमारा न रहा ।
कहाँ बच कर चली ऐ फ़स्ल-ए-गुल मुझ आबला-पा से
मिरे क़दमों की गुल-कारी बयाबाँ से चमन तक है।












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