बाल गंगाधर तिलक
बाल गंगाधर तिलक के स्वराज्य संबंधी विचार
बाल गंगाधर तिलक के समस्त राजनीतिक चिंतन को एक शब्द में व्यक्त किया जा सकता है और वह है स्वराज,तिलक ने प्राचीन भारतीय दर्शन का गहरा अध्ययन किया था जिसका आधार था धर्मराज्य, इसका अभिप्राय एक तरह की राजनीतिक व्यवस्था से है जो धर्म पर आधारित है जिसका उद्देश्य धर्म की रक्षा व उसका पोषण करना है, स्वराज इस धर्म राज्य की आवश्यक स्थिति है। इस प्रकार स्वराज तिलक के लिए एक नैतिक आवश्यकता थी प्रत्येक भारतीय का धर्म अर्थात कर्तव्य है इसलिए उन्होंने जोर देते हुए कहा कि "स्वराज्य हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है और हम इसे लेकर रहेंगे।" तिलक के इस मूलमंत्र को अच्छी तरह से समझने के लिए हमें इसकी तुलना दादाभाई नौरोजी फिरोजशाह मेहता और गोखले जैसे उदारवादी नेताओं की सुराज्य संबंधी अवधारणा से करनी होगी। उदारवादी नेता स्वराज्य की मांग ब्रिटिश नागरिक होने के नाते ब्रिटिश उपनिवेश ओं के नमूनों पर करते थे उन्होंने अपनी प्रेरणा ब्रिटिश इतिहास तथा संस्थाओं से प्राप्त की थी जबकि तिलक की प्रेरणा का स्रोत प्राचीन भारतीय राजनीतिक दर्शन था, जिसमें स्वराज को व्यक्ति का धर्म बताया गया है। इस प्रकार उनकी स्वराज की धारणा भारतीय संस्कृति का परिणाम थी। तिलक के अनुसार स्वराज्य एक ईश्वरी गुण।विदेशी साम्राज्यवाद राष्ट्र की आत्मा को खत्म कर देता है इसलिए उन्होंने ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरुद्ध संघर्ष व स्वराज्य की घोषणा की। उपस्थित तिलक का राष्ट्रवादी दर्शन आत्मा की सर्वोच्चता के वेदांटिक आदर्श मैजिनी वर्ग, मिल तथा विल्सन की धारणा का समन्वय था इस समन्वय को तिलक ने स्वराज शब्द द्वारा व्यक्त किया।
1916 के पूर्व तक स्वराज्य से तिलक का आशय देश के लिए पूर्ण स्वाधीनता की ऐसी स्थिति के लिए था जिसमें ब्रिटिश सम्राट के लिए कोई स्थान नहीं था लेकिन 1916 में उन्होंने स्वराज्य की अपनी धारणा को तत्कालीन समय के अनुसार और व्यावहारिक बना लिया। होम रूल लीग आंदोलन के दौरान 31 मई 1916 को अहमदनगर में स्वराज्य पर अपने पहले भाषण में उन्होंने कहा कि भारत के आंतरिक मामलों का संचालन और प्रबंधन भारतीयों के हाथों में हो हम ब्रिटेन के राजा सम्राट को बनाए रखने में विश्वास करते हैं उनके यह विचार यथार्थवादी दृष्टिकोण का परिचय देते हैं। ज्ञातव्य है की तिलक ने अपनी पूर्व धारणा पूर्ण स्वाधीनता की आकांक्षा का परित्याग नहीं किया था वरन् केवल तत्कालिक परिस्थितियों को देखते हुए ब्रिटिश साम्राज्य के अंतर्गत स्वराज्य का व्यावहारिक सुझाव दिया था यह पूर्ण स्वाधीनता की दिशा में उनका पहला कदम था ।उनके द्वारा इस स्थिति को अपनाए जाने का कारण यह भी था कि स्वराज्य की मांग को राज्य द्रोह से अलग किया जा सके और देश की जनता को स्वराज के लिए संगठित किया जा सके। जनता को स्वराज्य का संदेश प्रसारित करने के लिए उनका जेल से बाहर रहना आवश्यक था, जिससे वे जनता को जागरूक संगठित और स्वतंत्रता के लिए प्रेरित कर सकें। उनका आदर्श भारत के लिए संपूर्ण अर्थों में पूर्ण स्वतंत्रता ही था।
तिलक स्वराज्य के साथ अपने देश के लिए ऐसी शासन व्यवस्था के पक्षधर थे जिसमें शासन के सभी अधिकारी जनता के प्रति सचेत रहें तथा कार्यपालिका के अधिकारी व प्राधिकारी स्वयं को जनता के प्रति उत्तरदाई समझें।तिलक का विश्वास था कि राज्य का अस्तित्व जनता के कल्याण के लिए होता है इस आधार पर स्वराज्य का अर्थ था कि अंतिम शासन जनता के हाथों में ही हो इस आधार पर भी उन्होंने कहा था कि भारतीय रियासतों में भारतीय शासक होने के बाद भी रियासत में स्वराज्य नहीं है। परवर्ती ने लिखा है तिलक की स्वराज्य संबंधी धारणा प्रमुख ताजा शासन चलाने वाले व्यक्तियों से नहीं वरन शासन के मूल प्रयोजनों से अधिक संबंधित है चाहे हम इस बात को स्वीकार करें कर ले कि जीवन के अंतिम वर्ष में तिलक स्वराज्य को लगभग उसी आशय में स्वीकार किए जिससे से उसे उदारवादी नेताओं ने ग्रहण किया था। लेकिन इस प्रसंग में तिलक व उदारवादियों में बहुत महत्वपूर्ण अंतर है, उदार वादियो ने विभिन्न राजनीतिक विचारों में देश के लिए स्वराज एक विचार था, लेकिन तिलक के लिए स्वराज मात्र विचार नहीं था यह उनके धर्म जीवन व उनका प्राण था। उदारवादी नेता स्वराज का उल्लेख करते थे लेकिन ना तो उन्होंने गुलामी के अपमान को तिलक जैसी गहराई के साथ अनुभव किया था और ना ही वे तिलक के समान स्वराज्य के लिए सर्वस्व रूप से समर्पित थे।
तिलक का समस्त राजनीतिक चिंतन स्वराज्य पर केंद्रित है उनके अनुसार स्वराज्य समस्त सामाजिक व्यवस्था का आधार और राष्ट्रीय प्रगति का मूल तत्व है। उनका मानना था कि स्वराज के अभाव में कोई औद्योगिक प्रगति नहीं हो सकती कोई राष्ट्रीय शिक्षा नहीं हो सकती और कोई सामाजिक सुधार नहीं हो सकता।उनका मानना था कि अगर एक बार राजनीतिक सत्ता जनता के हाथों में आ जाए तो यह अन्य उद्देश्यों को भी सुगमता पूर्वक प्राप्त कर सकती है।तिलक जब अर्ध चेतन अवस्था में मृत्यु शैया पर पड़े थी तब भी उनके अंतिम शब्द थे कि यदि स्वराज्य ना मिला तो भारत समृद्ध नहीं हो सकता स्वराज्य हमारे अस्तित्व के लिए अनिवार्य है। वे ब्रिटिश नौकरशाही के इस तर्क से पूर्ण तरह सहमत थे कि स्वयं भारतीय भारत के मामलों का प्रबंध नहीं संभाल सकते।
उन्होंने हिंदुओं और मुसलमानों में परस्पर अविश्वास विद्वेष उत्पन्न करने की ब्रिटिश नींद का कड़ा विरोध किया और इस बात पर बल दिया किस राज्य प्राप्त हो जाने पर इन दो समुदायों के बीच अविश्वास और विदेश की कोई आशंका नहीं रहेगी। तिलक ने कहा था कि मैं जिसे स्वराज्य की मांग कर रहा हूं वह केवल हिंदुओं मुसलमानों और किसी वर्ग विशेष के लिए नहीं होगा भारतीय जनता की समस्याओं को हल करने की एक औषधि है वास्तविक सत्ता। जब यह औषधि हमें प्राप्त हो जाएगी तब यदि हममें आपस में कोई मतभेद होंगे तो हम उन्हें स्वयं समझाने में समर्थ होंगे। हम अपने विवादों को स्वयं हल करने की शक्ति चाहते हैं।
तिलक के संदर्भ में विशेष बात यह है कि तिलक ने न केवल स्वराज का नारा दिया रो बरन तप त्याग समर्पण और निष्ठा के साथ जीवन के इस एकमात्र आदर्श की ओर बढ़े उनके कार्यों का स्वरूप चाहे जो भी रहा हूं लेकिन प्रत्येक कार्य का लक्ष्य देश के लिए स्वराज्य ही था। सी वाई चिंतामणि लिखते हैं कि स्वतंत्रता प्राप्ति उनके जीवन का अंतिम लक्ष्य था और अपने समकालीन राजनीतिज्ञों में उन्होंने इसके लिए सबसे अधिक कष्ट सहन किया था।मुंबई के गवर्नर ने भारत मंत्री को अपने एक पत्र में लिखा था तिलक मुक्त खड़ी यंत्र कार्यों में से एक है उसने भारत में ब्रिटिश शासन में सब कमजोरियों को बड़ी सावधानी के साथ अध्ययन किया है उसके गणेश उत्सव, शिवाजी उत्सव, अनुदान निधि और राष्ट्रीय स्कूल इन सब का एक ही उद्देश्य है कि ब्रिटिश शासन को उखाड़ फेंका जाए। तिलक का अंग्रेजों की न्याय प्रियता उदारवादीता में अविश्वास था। क्योंकि उनका मानना था कि साम्राज्यवादी शक्ति शासित देश के हित में कार्य नहीं करता, साम्राज्यवाद का लक्ष्य ही शासित देश का राजनीतिक सामाजिक सांस्कृतिक और आर्थिक शोषण करना होता है। इस आधार पर अंग्रेजों की न्याय प्रियता पर विश्वास करना नितांत अविवेक पूर्ण है।










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