किस्सा : इलाहाबादी छात्र का
किस्सा : इलाहाबादी छात्र का
कुछ दिन पहले की बात है। एक इलाहाबादी छात्र का ऑपरेशन होना था,लेकिन ऐन वक़्त पर पता चला की एनेस्थीसिया (बेहोश करने वाली दवाई) खत्म हो गयी है।अगल बगल के अस्पतालों में भी पता किया लेकिन कही नही मिला। अब चूंकि डॉक्टर बाहर से आये थे। साल भर में वो सिर्फ एक ही बार आते थे और ऑपरेशन आज ही करना जरूरी भी था,और मजबूरी भी। कोई हल न देख एक दूसरे इलाहाबादी ने डॉक्टर को समझाया और एक देशी सलाह दे दी। पहले तो डॉक्टर ने न नुकुर की लेकिन कोई और रास्ता न होने के कारण हां करनी ही पड़ी। दोपहर के 2:30 बजे ऑपरेशन का समय निर्धारित किया गया। उससे पहले लड़के को खाना खाने की इजाजत दे दी गयी थी। लड़का खाना पानी खाकर 1 बजे वापस अस्पताल लौट आया और वार्ड में जाकर बेड पर लेट गया। कुछ देर बाद नर्स ने आकर डॉक्टर को बताया कि लड़का बेहोश हो गया है, कोई जवाब नही दे रहा है। ऑपरेशन शुरू हुआ। खत्म भी हो गया। सफल भी हो गया, लेकिन डॉक्टर की चिंता तब बढ़ी जब लड़का होश में नही आया। डॉक्टर साब के हाथ पांव फूल गए वापस उसी आदमी को बुलाया और होश में लाने का कोई तरीका पूछा। आदमी मुस्कुराया और सीधे लड़के के बेड के पास चला गया,धीरे से उसके कान के पास कुछ बोला और अगले 10 सेकंड में लड़का आंख मलता हुआ उठ बैठा। अब डॉक्टर के आश्चर्य की कोई सीमा नही थी, आदमी को पास में बुलाया और...
- ये सब हुआ कैसे?
- अरे डाकसाब! इलाहाबादी लड़के है, ये सब। 10 साल से यही पड़े हैं।
- तो इसका बेहोशी से क्या लेना देना?
- आप इनको दोपहर में घी वाली दाल, चावल और चोखा खिला दो। कसम है लेटे हुए बजरंग बली की,प्रलय आ जाए तो भी ये दोपहर खत्म होने से पहले न उठे।
- तो फिर ये जागा क्यों नही बाद में?
- घड़ी देखिए न डाकसाब! अभी आधा घंटा बाकी है, दोपहर में।
- तो अब तुमने उसके कान में ऐसा क्या कहा जो वो दोपहर से पहले ही उठ गया?
- हमने बस इत्ता ही कहा था कि 'गुरु चाय बनत है,पीबो?'
नोट- डॉक्टर ने कुछ महीनों के लिए प्रैक्टिस छोड़ दी है आजकल वो इलाहाबादी बच्चों पर शोध कार्य कर रहे है।
कुछ दिन पहले की बात है। एक इलाहाबादी छात्र का ऑपरेशन होना था,लेकिन ऐन वक़्त पर पता चला की एनेस्थीसिया (बेहोश करने वाली दवाई) खत्म हो गयी है।अगल बगल के अस्पतालों में भी पता किया लेकिन कही नही मिला। अब चूंकि डॉक्टर बाहर से आये थे। साल भर में वो सिर्फ एक ही बार आते थे और ऑपरेशन आज ही करना जरूरी भी था,और मजबूरी भी। कोई हल न देख एक दूसरे इलाहाबादी ने डॉक्टर को समझाया और एक देशी सलाह दे दी। पहले तो डॉक्टर ने न नुकुर की लेकिन कोई और रास्ता न होने के कारण हां करनी ही पड़ी। दोपहर के 2:30 बजे ऑपरेशन का समय निर्धारित किया गया। उससे पहले लड़के को खाना खाने की इजाजत दे दी गयी थी। लड़का खाना पानी खाकर 1 बजे वापस अस्पताल लौट आया और वार्ड में जाकर बेड पर लेट गया। कुछ देर बाद नर्स ने आकर डॉक्टर को बताया कि लड़का बेहोश हो गया है, कोई जवाब नही दे रहा है। ऑपरेशन शुरू हुआ। खत्म भी हो गया। सफल भी हो गया, लेकिन डॉक्टर की चिंता तब बढ़ी जब लड़का होश में नही आया। डॉक्टर साब के हाथ पांव फूल गए वापस उसी आदमी को बुलाया और होश में लाने का कोई तरीका पूछा। आदमी मुस्कुराया और सीधे लड़के के बेड के पास चला गया,धीरे से उसके कान के पास कुछ बोला और अगले 10 सेकंड में लड़का आंख मलता हुआ उठ बैठा। अब डॉक्टर के आश्चर्य की कोई सीमा नही थी, आदमी को पास में बुलाया और...
- ये सब हुआ कैसे?
- अरे डाकसाब! इलाहाबादी लड़के है, ये सब। 10 साल से यही पड़े हैं।
- तो इसका बेहोशी से क्या लेना देना?
- आप इनको दोपहर में घी वाली दाल, चावल और चोखा खिला दो। कसम है लेटे हुए बजरंग बली की,प्रलय आ जाए तो भी ये दोपहर खत्म होने से पहले न उठे।
- तो फिर ये जागा क्यों नही बाद में?
- घड़ी देखिए न डाकसाब! अभी आधा घंटा बाकी है, दोपहर में।
- तो अब तुमने उसके कान में ऐसा क्या कहा जो वो दोपहर से पहले ही उठ गया?
- हमने बस इत्ता ही कहा था कि 'गुरु चाय बनत है,पीबो?'
नोट- डॉक्टर ने कुछ महीनों के लिए प्रैक्टिस छोड़ दी है आजकल वो इलाहाबादी बच्चों पर शोध कार्य कर रहे है।










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