नेहरू : एक राष्ट्र निर्माता

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भारतीय जनता की कई पीढ़ियों में लोकतंत्र की चेतना को डालने में महात्मा गांधी के बाद सर्वाधिक प्रमुख योगदान पंडित जवाहरलाल नेहरू का ही रहा है। पंडित नेहरू उच्च कोटि के विचारक तथा लोकतांत्रिक समाजवाद के प्रबल समर्थक एवं महान मानवतावादी विचारक थे।स्वाधीन भारत के प्रथम प्रधानमंत्री के रूप में आधुनिक भारत के स्वतंत्र विकास की दिशा की उन्हीं के नेतृत्व में निर्धारित हुआ।
नेहरू के चिंतन मेंलोकतंत्र के प्रति उनकी गहरी आस्था व्याप्त है वह लोकतंत्र को जीवन का एक प्रकार मानते थे नेहरू के अनुसार लोकतंत्र अनुशासन सहिष्णुता और एक दूसरे की सम्मान करने की भावना पर आधारित है नेहरू के अनुसार लोकतंत्र केवल राजनीतिक अथवा आर्थिक धारणा मात्र नहीं है बल्कि एक मानसिक स्थिति भी है लोकतंत्र में राजनीतिक तथा आर्थिक क्षेत्र में अवसरों की अधिकाधिक समानता अंतर्निहित है व्यक्ति द्वारा अपनी योग्यताओं तथा क्षमताओं का विकास तथा अन्य व्यक्तियों के प्रति सहिष्णुता का भाव लोकतंत्र का मूल आधार है राज्य द्वारा प्रत्येक नीति पर जनता का समर्थन प्राप्त करना लोकतंत्र की दूरी है लोकतंत्र के दो सिद्धांत समानता और स्वतंत्रता उन्हें बहुत प्रिय थे वह ऐसा लोकतंत्र चाहते थे जो सहिष्णुता एवं मानवता की भावना से परिपूर्ण हो जो समाज आर्थिक विषमताओं से घिरा है तथा सामाजिक एकता नहीं रखता वह लोकतंत्र समाज नहीं हो सकता वे प्रजातंत्र में संसद आत्मक पद्धति के समर्थक थे उनका कहना था कि हम संसदीय सरकार को इसलिए श्रेष्ठ मानते हैं कि यह समस्याओं को हल करने का एक शांतिपूर्ण उपाय है इस प्रकार की सरकार में वाद-विवाद विचार-विमर्श और निर्णय करने की और उस निर्णय को बदलने व स्वीकार करने की पद्धति अपनाई जाती है जबकि कुछ लोग उससे असहमत हो फिर भी संसदीय सरकार में अल्पसंख्यकों का बहुत महत्वपूर्ण योगदान होता है लोकतंत्र के पक्षपाती होते हुए भी वे प्रत्यक्ष कार्यवाही के समर्थक नहीं थे वे संवैधानिक साधनों के पक्ष में थे वह सैनिक अधिनायकवाद और एक दलीय सरकार एवं हिंसा बाद के घोर विरोधी थे
लोकतंत्र और समाजवाद दोनों एक दूसरे से भिन्न होते हैं परंतु नेहरू जी सच्चा लोकतंत्र आर्थिक विषमताओं का अभाव मानते थे वह लोकतंत्र और समाजवाद का समन्वय करना चाहते थे अतः उन्होंने अपना लक्ष्य भारत में लोकतंत्र ही समाजवाद की स्थापना रखा।
नेहरू जी आर्थिक स्वतंत्रता के बिना राजनीतिक स्वतंत्रता को एक विडंबना मानते थे उन्होंने समाजवाद की व्याख्या करते हुए कहा था कि समाजवाद का अर्थ धन का वितरण नहीं है और न केवल जन कल्याणकारी राज्य का निर्माण है समाजवादी अर्थव्यवस्था मात्र से लोक कल्याणकारी राज्य संभव नहीं हो सकता है आवश्यकता इस बात की है कि देश में उत्पादन बढ़ाया जाए धन की वृद्धि हो और फिर अर्जित धन का समुचित ढंग से वितरण किया जाए।भारत की खोज नामक पुस्तक में उन्होंने लिखा है कि प्रायः में इस विश्व की ओर देखता हूं तो मुझे अज्ञात यह नेताओं की साहस आत्मकथा का भान हो जाता है यह रहस्य सामाजिक और आर्थिक क्षेत्र में भी लाना चाहते थे।

 युवा नेहरू गांधी से पहली बार 1916 की लखनऊ कांग्रेस के मौके पर लखनऊ के अमीनाबाद की गंगा प्रसाद धर्मशाला में  मिला, तो बस गांधी का हो कर रह गया। गांधी से असहमत भी होता था, पर छोड़ने की कल्पना भी नहीं की। होश संभालने पर कैम्ब्रिज से पिता के साथ राजनीतिक खत किताबत तक में अति मुखर साम्राज्यवाद विरोधी दिखते जवाहर लाल मानते थे कि गांधी को छोड़कर हिन्दुस्तान में साम्राज्यवाद के विरुद्ध कोई लड़ाई संभव नहीं है। साफ है कि उनकी साम्राज्यवाद विरोधी चेतना में भले समाजवाद भी था, पर राष्ट्रवाद का पुट गहरा था। उस नेहरू के अवध के गांवों में किसानों के बीच धूल फांकने या थर्ड क्लास में सफर करने या हिन्दुस्तानी सेवादल के कैंप्स में बर्तन तक मांजने से नाराज होने वाले बाप का कोई असर बेटे पर नहीं पड़ा। उलटे बेटे के रंग में बाप जरूर रंगते चले गये, जेल जाने लगे और रईसी का परिसर आनन्द भवन खादीमय ही नहीं हुआ, सत्याग्रहियों की सराय और राष्ट्रीय आन्दोलन का सूत्र संचालन केन्द्र बन गया। वहां से एआईसीसी तक संचालित होने लगी।

 आज भारत की बहुतेरी खूबियों की खुशबू दुनिया में दूर तलक जाती है उनकी बुनियाद में नेहरू हैं। उन्होंने भारत एक खोज में इस सवाल का हल गांव के किसानों के मुंह से ही खोजने की कवायद की कि आखिर वह भारतमाता कौन हैं, जिनकी हम सब जोर जोर से जय बोलते हैं। सहज ढंग से भारतीय राष्ट्रवाद के मर्म को उन ग्रामीणों की चेतना के तार से ही तराशने और उकेरने का काम उन्होंने किया। संवाद शैली में राष्ट्रवाद के गूढ़ मर्म को आम लोगों के दिमाग में साकार करते हुये साफ किया कि केवल हिन्दुस्तान की ये धरती, नदियां और पहाड़ ही भारत माता नहीं है, जो हम सबका पालन करती है, बल्कि उनके साथ मिल कर इस धरती पर आबाद हर हिन्दुस्तानी ही भारतमाता है। दूरदृष्टा भारत शिल्पी नेहरू ने व्यापक विविधता की भारत की कमजोरी को ही उसकी ताकत बना दिया, जिसे देख दुनिया दांत तले उंगली दबाती रही है। आजादी के बाद भी अतीत की तरह 562 राजनीतिक टुकड़ों में मिले भारत को अपने प्रिय सहयोगी उप प्रधानमंत्री महानायक सरदार पटेल के साथ पूरे जतन से एकीकरण के सूत्र में पिरोने के काम का प्रधानमंत्री के रूप में नेतृत्व किया। आगे चल कर सामरिक आपरेशन से गोवा को आजाद कराया और उसमें जोड़ा।

   वर्तमान में स्वतंत्रता के राष्ट्रीय आन्दोलन के युग दयित्व से भसुर (परे) जैसे अछूत के रिश्ते की विचार परंपरा की नकारात्मक सोच से जुड़े कुछ लोग अपूर्व निर्माण के आजादी के सत्तर साल पर नाटकीय रोना रोते हुये साजिशी दुष्प्रचार चलाते हैं, लेकिन नेहरू को तो हजार वर्षों के सामंतवाद और साम्राज्यवाद के कठिन शोषण से चूसे आम की गुठली जैसा टूटा बिखरा सा हिन्दुस्तान मिला था। उस वक्त उत्पादन के हालत ऐसे थे कि घर से लाश तब उठती थी, जब तहसीलदार के यहां से परमिट कट कर दो गज कफन का कपड़ा नसीब होता था। सूई तक नहीं बनती थी, क्योंकि देश में छंटाक भर लोहे की पैदावार नहीं थी। उस भारत में लोकतंत्र का पौधा रोपना, पल्लवित करना और लोकतंत्र के रस्ते देश की तरक्की की राह बनाना आसान काम नहीं था। वह काम हुआ, बखूबी हुआ। वह पौधा वट-वृक्ष की तरह सिर उठा कर आज दुनिया के सामने खड़ा है, तो इसलिये कि नेहरू जैसा कुशल कप्तान मिला था। वैसा कप्तान न होता तो शायद विश्व में जमकर सराही जाने वाली भारत की खूबियां परवान न चढ़ पातीं और धार्मिक कट्टरता में लिपटा एक आत्मकेन्द्रित भारत आज होता। एक आधुनिक भारत को, वैज्ञानिक चेतना वाले भारत को, धार्मिक स्वतंत्रता सहित मौलिक नागरिक अधिकार संपन्न सर्वधर्मसमभाव वाले  भारत को, केवल लोकतंत्र ही नहीं वैश्विक महत्व की वैज्ञानिक एवं शैक्षणिक संस्थाओं से लैस होकर विकास की योजनाबद्ध राह पर आत्मविश्वास से आगे बढ़ते भारत को नेहरू ने उकेरा था। हजारों वर्ष से देश में राजशाही, जमींदारी, ताल्लुकेदारी, रैयतवारी के सामंतवाद के मकड़जाल की संस्थागत जड़ों को ध्वस्त करके, गांवों तक लोकतंत्र का संवैधानिक विस्तार करने वाले भारत को नेहरू ने लोकतांत्रिक संस्कृति की नई जमीन दी। विरासत में मिले पिछड़े भारत को दुनिया के बहुतायत देशों के गुटनिरपेक्ष खेमे की अगुवाई के साथ विश्व राजनीति के पटल पर नया स्वाभिमान दिया। बुनियादी बड़े-छोटे उद्योगों के अभिनव संजाल की रचना के साथ किसान, मजदूर, गरीब, गांव और पिछड़े व वंचित लोगों की लोककल्याणकारी चिन्ता समेट कर आगे बढ़ते भारत का यह नवनिर्माण कोई आसान काम नहीं था, पर वो काम हुआ और भरोसे के साथ बसों सका, क्योंकि उसकी तह में नेहरू थे।

  वह नेहरू मेरी निगाह में दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्रवादी नायक था। केवल इसलिये नहीं कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का संस्थापक महानायक प्रधान मंत्री था। इसलिये भी कि संस्कारवश अपने मन, चित्त, आत्मा से लोकतंत्रवादी था। राष्ट्रपति के द्वितीय कार्यकाल के उम्मीदवार के लिये कांग्रेस वर्किंग कमेटी में फैसला हर एक के समर्थन से डा. राधाकृष्णन के पक्ष जैसे हो ही चुका था। तब मौलाना आजाद ने कहा, "बड़ी देर से सुन रहा हूं, कोई जनाब राधाकृष्णन हैं। बड़े फलसफां हैं, तो भेज दीजिए किसी यूनिवर्सिटी में पढ़ायें जाकर। मेरी समझ में नहीं आता कि जब राजेन्द्र बाबू मौजूद हैं, तो उनसे ज्यादा किसका कंट्रीव्यूशन है कि हम किसी और नाम पर गौर फरमा रहे हैं"। नेहरूजी ने राधाकृष्णन के नाम के प्रस्ताव की प्रति खींची और फाड़ते हुये बोले, ठीक है राजेन्द्र बाबू ही उम्मीदवार होंगे। अकेले एक व्यक्ति के भी उचित विरोध को स्वीकार करने का काम संस्कार से लोकतांत्रिक व्यक्ति ही कर सकता है।

  दूसरा वाकया बीएचयू में प्रधानमंत्री नेहरू के भाषण के बाद कुलपति आचार्य नरेन्द्रदेव के 40 मिनट के अध्यक्षीय भाषण का था, जिसमें आचार्य जी ने नेहरू सरकार की अर्थनीति की तीखी आलोचना की। आज प्रधानमंत्री को इतना और ऐसा सुनाने का बौद्धिक जीवट तो दुर्लभ है ही, पर वो तो नेहरू थे जिसने गाल पर हथेली रख अक्षर अक्षर गौर से सुना, ताली भी बजाई। इसी तरह युवा सांसद अटल जी ने कभी संसद में नेहरू को बोला 'प्रधानमंत्रीजी आप दोहरा व्यक्तित्व जीते हैं, आप में चर्चिल भी हैं और चेम्बरलेन भी'। वहां चुप नेहरू शाम को एक पार्टी में उनको मिले तो पीठ ठोंक कर कहा 'आज बहुत अच्छा बोले'। आलोचना सुनने का और आलोचना के समादर का यह भाव किसी संस्कार से लोकतंत्रवादी में ही हो सकता है।

   तीसरा वाकया कि जब आलोचना करने वाला न मिले तो ?  एक दिन उनके ही अखबार नेशनल हेरल्ड में उन्हीं के खिलाफ आलोचनात्मक लेख छपा। अखबार प्रबन्धन में हड़कंप मचा और जांच हुई तो पता चला देर रात सम्पादकीय में अकेले ड्यूटी पर बचे व्यक्ति को वह लेख उन्होंने खुद भेज कर छद्म नाम से छपवाया था। इसी तरह 50 के दशक में उन्हें जब लगातार चौथी बार कांग्रेस अध्यक्ष चुनने की बात आई तो खुद अखबार में लेख लिख कर कहा कि इस तरह तो आप लोग किसी को भी तानाशाह बना दोगे। बात साफ है कि आलोचक न मिलें तो आत्मालोचना की शक्ति वाला व्यक्ति संस्कार से लोकतंत्रवादी होता है। बेशक नेहरू लोकतंत्र के संस्थापक और नायक ही नहीं, अंदर से एक सम्पूर्ण लोकतंत्रवादी महानायक थे।

1927 में पंडित नेहरू रूस गए और साम्यवादी विचारों से विशेषकर उनके आर्थिक विचारों से बहुत प्रभावित हुए तभी से उन्होंने आर्थिक उन्नति पर बल देना प्रारंभ किया उनका कहना था कि राजनीतिक स्वतंत्रता का कोई महत्व नहीं यदि जनता को आर्थिक स्वतंत्रता नहीं मिलती है उनका विचार सही था क्योंकि खाली पेट नंगे शरीर तथा दिन दिन रात के काम से चकनाचूर मानव स्वतंत्रता का क्या अर्थ समझ सकता है।
1954 में पंडित नेहरू ने शांतिपूर्ण सह अस्तित्व के पांच सिद्धांतों पंचशील सिद्धांत का प्रतिपादन किया यद्यपि यह सिद्धांत सम्राट अशोक के सिद्धांत के अनुरूप थे सोवियत संघ की क्रांति से पूर्व जर्जर आर्थिक स्थिति थी परंतु पंचवर्षीय योजनाओं ने रूस की कायापलट कर दी पंडित नेहरू का भी विश्वास था कि पंचवर्षीय योजनाएं हमारे देश का आर्थिक विकास करेंगे और तभी से भारत में पंचवर्षीय योजनाओं का क्रियान्वयन होने लगा।


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