तिलक का स्वराज

तिलक के समस्त राजनीतिक चिंतन को एक शब्द में व्यक्त किया जा सकता है और वह है स्वराज्य तिलक ने प्राचीन भारतीय दर्शन का गहरा अध्ययन किया था जिसका आधार था धर्मराज्य इसका अभिप्राय एक तरह की राजनीतिक व्यवस्था है जो धर्म पर आधारित है जिसका उद्देश्य धर्म की रक्षा व उसका पोषण स्वराज्य इस धर्मराज की आवश्यक स्थिति है इस प्रकार स्वराज्य तिलक के लिए एक नैतिक आवश्यकता थी प्रत्येक भारती का धर्म अर्थात कर्तव्य है इसलिए उन्होंने जोर देते हुए कहा था कि स्वराज्य हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है और हम इसे लेकर रहेंगे।
तिलक के अनुसार स्वराज्य एक ईश्वरी गुण है विदेशी साम्राज्यवाद राष्ट्र की आत्मा को खत्म कर देता है इसलिए उन्होंने ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरुद्ध संघर्ष व स्वराज्य की घोषणा की।1916 के पूर्व तक स्वराज्य से तिलक का आशय देश के लिए पूर्ण स्वाधीनता की ऐसी स्थिति के लिए था जिसमें ब्रिटिश सम्राट के लिए कोई स्थान नहीं था लेकिन 1916 में उन्होंने स्वराज्य की अपनी धारणा को तत्कालीन समय के अनुसार और व्यावहारिक बना लिया।होम रूल आंदोलन के अंतर्गत 31 मई 1916 को अहमदनगर में स्वराज्य पर अपने पहले भाषण में उन्होंने कहा था कि भारत के आंतरिक मामलों का संचालन और प्रबंधन भारतीयों के हाथों में सौंपा जाए हम ब्रिटेन के राजा को सम्राट बनाए रखने में विश्वास करते हैं उनके यह विचार यथार्थवादी दृष्टिकोण का परिचय देते हैं।
तिलक स्वराज के साथ अपने देश के लिए ऐसी शासन व्यवस्था के पक्षधर थे जिसमें शासन के सभी अधिकारी जनता के प्रति सचेत रहें तथा कार्यपालिका के अधिकारी व प्राधिकारी स्वयं को जनता के प्रति उत्तरदाई समझे।तिलक का विश्वास था कि राज्य का अस्तित्व जनता के कल्याण व सुख के लिए होता है इस आधार पर स्वराज्य का अर्थ था कि अंतिम शासन जनता के हाथों में ही हो इस आधार पर भी उन्होंने कहा था कि भारतीय रियासतों में भारतीय शासक होने के बाद भी रियासतों में स्वराज्य नहीं है।
वे ब्रिटिश नौकरशाही के इस तर्क से पूर्णतया सहमत थे कि स्वयं भारतीय भारत के मामलों का प्रबंध नहीं संभाल सकते।उन्होंने हिंदुओं और मुसलमानों में परस्पर अविश्वास और विद्वेष उत्पन्न करने की ब्रिटिश नीति का कड़ा विरोध किया और इस बात पर बल दिया कि स्वराज्य प्राप्त हो जाने पर इन दो समुदायों के बीच अविश्वास और विद्वेष की कोई आशंका नहीं रहेगी। तिलक ने कहा कि मैं जिस स्वराज्य की मांग कर रहा हूं वह केवल हिंदुओं मुसलमानों और किसी वर्ग विशेष के लिए नहीं होगा भारतीय जनता की समस्याओं को हल करने के लिए एक ही औषधि है और वह है वास्तविक सत्ता।जब यह औषधि हमें प्राप्त हो जाएगी तब यदि हम हमें आपस में कोई भी मतभेद होंगे तो हम उन्हें स्वयं समझाने में समर्थ होंगे हम अपने विवादों का स्वयं हल करने की शक्ति चाहते हैं।
तिलक के संदर्भ में विशेष बात यह है कि तिलक ने ना केवल स्वराज का नारा दिया वरुण तप त्याग समर्पण और निष्ठा के साथ जीवन के इस एकमात्र आदर्श की ओर बढ़े उनके कार्यों का स्वरूप चाहे जो भी रहा हो लेकिन प्रत्येक कार्य का लक्ष्य देश के लिए स्वराज्य ही था। C.Y. चिंतामणि लिखते हैं कि स्वतंत्रता प्राप्ति उनके जीवन का अंतिम लक्ष्य था और अपने समकालीन राजनीतिक जो में उन्होंने इसके लिए सबसे अधिक कष्ट सहन किए मुंबई के गवर्नर ने भारत मंत्री को अपने एक पत्र में लिखा था कि तिलक मुख्य खड़ी यंत्र कार्यों में से है उसने भारत में ब्रिटिश शासन में सब कमजोरियों का बड़ी सावधानी के साथ अध्ययन किया है उसने एक गणेश उत्सव शिवाजी उत्सव अनुदान निधि और राष्ट्रीय स्कूल जैसे कई कार्यक्रमों का संचालन प्रारंभ किया है और इन सब का एक ही उद्देश्य है ब्रिटिश शासन को उखाड़ फेंका जाए।
तिलक का अंग्रेजों की न्याय प्रियता व उदारवाद दा में अविश्वास था क्योंकि उनका मानना था कि साम्राज्यवादी शक्ति शासित देश के हित में कार्य नहीं करती साम्राज्यवाद का तो लक्ष्य ही शासित देशों के राजनीतिक सामाजिक और सांस्कृतिक तथा आर्थिक शोषण करना होता है इस आधार पर अंग्रेजों के न्याय प्रियता पर विश्वास करना नितांत अविवेक पूर्ण है।
तिलक ने स्वराज्य प्राप्ति के लिए कई प्रकार के साधनों को अपनाया जिसमें स्वराज बहिष्कार और राष्ट्रीय शिक्षा शामिल है-
स्वदेशी- स्वदेशी और बहिष्कार तिलक के द्वारा अपनाए गए सबसे महत्वपूर्ण साधन थे। तिलक ने केसरी में लिखा हमारा राष्ट्र एक वृक्ष की तरह है इसका मूल तना स्वराज्य है और स्वदेशी तथा बहिष्कार उसकी शाखाएं हैं।"










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