सावरकर: हिंदू राष्ट्रवाद/हिंदू पुनरुत्थान वादी राष्ट्रवाद की अवधारणा
वीर सावरकर
सावरकर के राष्ट्रवाद की आधारशिला संस्कृति और सभ्यता है। सावरकर का राष्ट्रवाद भू-सांस्कृतिक अवधारणा पर अवलंबित है। सावरकर के अनुसार, भारत में राष्ट्रवाद की संकल्पना आर्थिक संकल्पना नहीं है, भारत का राष्ट्रवाद, उसकी वसुंधरा पर अपना जीवन व्यतीत करने वाले मानवों की अस्तित्व के साथ सम्मिलित है। एक धरती पर निवास करने वाले एक ही प्रकार के जीवन शैली से प्रेरित एवं पुष्पित और पल्लवित होने वाले नागरिकों के मध्य जिस भाव बोध पर एकता प्रतिस्थापित होती है, उसका मूल स्रोत भारत की सभ्यता और संस्कृति है।
वीर सावरकर के अनुसार भारत की संस्कृति अपने वैचारिक स्वरूप में हिंदुत्व ही है। सावरकर के अनुसार हिंदुत्व धर्म धर्म की कट्टरता से परे एक सनातनी युगबोध है, यह एक जीवन शैली है जो अत्यंत प्राचीन है। ऐतिहासिक अन्वेषण की दृष्टि से सुदूर अतीत से भारत की स्वाभाविक एकता और अखंडता इसी हिंदू वादी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का प्रतिफल है। सावरकर का हिंदुत्व भी एक जीवन शैली है ना कि मात्र उपासना पद्धति।
सावरकर के हिंदू राष्ट्रवाद उत्थान के या पुनरुत्थान वादी के रूप को इस प्रकार व्याख्यायित किया जा सकता है- हिंदुत्व की अवधारणा, सावरकर के अनुसार हिंदी और हिंदू राष्ट्र की अभिव्यक्ति है ऐसा इसलिए कि वर्षों से अथवा सनातन परंपरा में देर का अंतराल से भारतीय उपमहाद्वीप में विश्वास करने वाले नागरिक एवं नागरिक समुदाय की जीवन-शैली रीत-रिवाज सभ्यता एवं संस्कृति एक है। इस भूखंड से इस पर अभी वास करने वाले नागरिकों का अतीव प्रेम है।भूखंड के नागरिक अपनी संस्कृति एवं सभ्यता के मानक मूल्यों के अनुसार सहअस्तित्व एवं साहचर्य में विश्वास भी व्यक्त करते हैं। अतः इस धरती के प्रति उनका विशिष्ट अनुराग है यह अनुराग भाव बोध इस धरती के रक्षार्थ प्राणों के उत्सर्ग तक की प्रेरणा देता है अतः अभिलाषा-आकांक्षा, सपने एक साथ संवेग होकर भावनात्मक इकाई का सृजन करते हैं। जो राष्ट्रवाद के उद्भव एवं विकास का कारक है।
अतः सावरकर का राष्ट्रवाद प्रकार अंतर से सांस्कृतिक राष्ट्रवाद हिंदू शब्द किसी जाति या धर्म का सूचक नहीं है अपितु हिंदू एक जीवन शैली है हिंदुत्व और हिंदू एक दूसरे के पर्याय हैं तथा सम्मिलित रूप से राष्ट्र को प्रीति ध्वनित करते हैं ।
हिंदू ही राष्ट्र: भारतीय उपमहाद्वीप में जिस सभ्यता संस्कृति जीवन शैली अस्तित्व बोध की श्रेष्ठ है उसे हिंदू कहा जाता है।ऐतिहासिक संवेग में यूनानीयों के आक्रमण के समय यूनियन इतिहासकारों ने अपने विवरण के क्रम में जब इतिहास का उल्लेख अन प्रस्तुत किया तो उसमें हिंदू शब्द का समानार्थी शब्द सिंधु था। सिंधु नदी के इस तट और उस तट के विस्तृत भू-भाग ऊपर विश्वास करने वाले नागरिकों को हिंदू कहा गया। फलतः श्रुति के रूप में हिंदू शब्द अस्तित्व में आया। कालांतर में हिंदू शब्द सनातन धर्म का पर्यायवाची बन गया तथा इसे एक विशेष धर्म के रूप में प्रतीकात्मक रूप से संबोधित किया जाने लगा।
वीर सावरकर का अभिमत है कि इस भूखंड पर अभी वास करने वाले समस्त नागरिक हिंदू हैं। जीवन शैली की एकरूपता सभ्यता और संस्कृति का सामान धर मोनू पालक इन नागरिकों को बंधुत्व भाव से एकीकृत एवं समय कृत करता है, फलतः हिंदुत्व ही एकता की शक्ति है। हिंदुत्व ही सर्वोदय सीखता है हिंदुत्व ही आचरण की मर्यादा है हिंदुत्व ही जीवन की प्रतिबद्धता है हिंदुत्व ही राष्ट्र का निर्माण है अतः हिंदुत्व और राष्ट्र एक दूसरे के पूरक है। हिंदुत्व और राष्ट्र का संबंध अन्योन्याश्रित है। हिंदू राष्ट्र परस्पर व्यापी है।
वीर सावरकर के अनुसार भारत की विमुक्ति भारत राष्ट्र की राष्ट्रीयता में है जिस की आधारशिला हिंदी अथवा हिंदुत्व है।राष्ट्र को गतिशील बनाने के लिए राष्ट्र को प्राण मान बनाने के लिए हिंदुत्व ही श्रेष्ठ आधार है। हिंदुत्व की परिकल्पना के बिना भारत के राष्ट्र के रूप में अवकलन नहीं किया जा सकता। हिंदू के बिना भारत वासियों के मध्य जागरूकता आवश्यक है। हिंदू राष्ट्र का नवनीत है।
रक्त संबंध: सावरकर के अनुसार भारतीय उपमहाद्वीप में अधिवास करने वाले नागरिक जन्मना एक रक्त के समूह हैं। कालांतर में इनमें उपासना पद्धति की भिन्नता पाई जाती है परंतु उनका रक्त एक है। सावरकर का अस्पष्ट अभिमत था कि वर्तमान में विद्यमान हिंदू इस्लाम धर्मावलंबी ईसाई जैन बौद्ध एवं पारसी रक्त की दृष्टि से समान धर्म में है अर्थात अनुवांशिकता एवं जीव वैज्ञानिकता की दृष्टि से भारत में अनुवाद करने वाले नागरिकों के पूर्वजों में एकता परिलक्षित होता है। अनुवांशिकता की दृष्टि से जिस भाव बोध एवं भाव संज्ञा का जागरण होता है वह जीवंत स्वरूप भारतीय राष्ट्रवाद है उपासना पद्धति की भिन्नता इसे खंडित नहीं करती है।
हम तो नीचे गिरे दूध
को भी पैर नहीं लगाते,
निर्जीव किताब भी पैर
से लग जाये तो प्रणाम
कर लेते हैं !
हम पेड़ पौधे,पशु पक्षियों से
लेकर जानवरों को भी पूजते हैं!
आप मुसलमान हो,
इसलिए हम हिन्दू हैं!
वर्ना हम तो विश्वमानव थे और हैं !
जयतु जयतु हिन्दूराष्ट्रं💐
वीर सावरकर के अनुसार भारत की संस्कृति अपने वैचारिक स्वरूप में हिंदुत्व ही है। सावरकर के अनुसार हिंदुत्व धर्म धर्म की कट्टरता से परे एक सनातनी युगबोध है, यह एक जीवन शैली है जो अत्यंत प्राचीन है। ऐतिहासिक अन्वेषण की दृष्टि से सुदूर अतीत से भारत की स्वाभाविक एकता और अखंडता इसी हिंदू वादी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का प्रतिफल है। सावरकर का हिंदुत्व भी एक जीवन शैली है ना कि मात्र उपासना पद्धति।
सावरकर के हिंदू राष्ट्रवाद उत्थान के या पुनरुत्थान वादी के रूप को इस प्रकार व्याख्यायित किया जा सकता है- हिंदुत्व की अवधारणा, सावरकर के अनुसार हिंदी और हिंदू राष्ट्र की अभिव्यक्ति है ऐसा इसलिए कि वर्षों से अथवा सनातन परंपरा में देर का अंतराल से भारतीय उपमहाद्वीप में विश्वास करने वाले नागरिक एवं नागरिक समुदाय की जीवन-शैली रीत-रिवाज सभ्यता एवं संस्कृति एक है। इस भूखंड से इस पर अभी वास करने वाले नागरिकों का अतीव प्रेम है।भूखंड के नागरिक अपनी संस्कृति एवं सभ्यता के मानक मूल्यों के अनुसार सहअस्तित्व एवं साहचर्य में विश्वास भी व्यक्त करते हैं। अतः इस धरती के प्रति उनका विशिष्ट अनुराग है यह अनुराग भाव बोध इस धरती के रक्षार्थ प्राणों के उत्सर्ग तक की प्रेरणा देता है अतः अभिलाषा-आकांक्षा, सपने एक साथ संवेग होकर भावनात्मक इकाई का सृजन करते हैं। जो राष्ट्रवाद के उद्भव एवं विकास का कारक है।
अतः सावरकर का राष्ट्रवाद प्रकार अंतर से सांस्कृतिक राष्ट्रवाद हिंदू शब्द किसी जाति या धर्म का सूचक नहीं है अपितु हिंदू एक जीवन शैली है हिंदुत्व और हिंदू एक दूसरे के पर्याय हैं तथा सम्मिलित रूप से राष्ट्र को प्रीति ध्वनित करते हैं ।
हिंदू ही राष्ट्र: भारतीय उपमहाद्वीप में जिस सभ्यता संस्कृति जीवन शैली अस्तित्व बोध की श्रेष्ठ है उसे हिंदू कहा जाता है।ऐतिहासिक संवेग में यूनानीयों के आक्रमण के समय यूनियन इतिहासकारों ने अपने विवरण के क्रम में जब इतिहास का उल्लेख अन प्रस्तुत किया तो उसमें हिंदू शब्द का समानार्थी शब्द सिंधु था। सिंधु नदी के इस तट और उस तट के विस्तृत भू-भाग ऊपर विश्वास करने वाले नागरिकों को हिंदू कहा गया। फलतः श्रुति के रूप में हिंदू शब्द अस्तित्व में आया। कालांतर में हिंदू शब्द सनातन धर्म का पर्यायवाची बन गया तथा इसे एक विशेष धर्म के रूप में प्रतीकात्मक रूप से संबोधित किया जाने लगा।
वीर सावरकर का अभिमत है कि इस भूखंड पर अभी वास करने वाले समस्त नागरिक हिंदू हैं। जीवन शैली की एकरूपता सभ्यता और संस्कृति का सामान धर मोनू पालक इन नागरिकों को बंधुत्व भाव से एकीकृत एवं समय कृत करता है, फलतः हिंदुत्व ही एकता की शक्ति है। हिंदुत्व ही सर्वोदय सीखता है हिंदुत्व ही आचरण की मर्यादा है हिंदुत्व ही जीवन की प्रतिबद्धता है हिंदुत्व ही राष्ट्र का निर्माण है अतः हिंदुत्व और राष्ट्र एक दूसरे के पूरक है। हिंदुत्व और राष्ट्र का संबंध अन्योन्याश्रित है। हिंदू राष्ट्र परस्पर व्यापी है।
वीर सावरकर के अनुसार भारत की विमुक्ति भारत राष्ट्र की राष्ट्रीयता में है जिस की आधारशिला हिंदी अथवा हिंदुत्व है।राष्ट्र को गतिशील बनाने के लिए राष्ट्र को प्राण मान बनाने के लिए हिंदुत्व ही श्रेष्ठ आधार है। हिंदुत्व की परिकल्पना के बिना भारत के राष्ट्र के रूप में अवकलन नहीं किया जा सकता। हिंदू के बिना भारत वासियों के मध्य जागरूकता आवश्यक है। हिंदू राष्ट्र का नवनीत है।
रक्त संबंध: सावरकर के अनुसार भारतीय उपमहाद्वीप में अधिवास करने वाले नागरिक जन्मना एक रक्त के समूह हैं। कालांतर में इनमें उपासना पद्धति की भिन्नता पाई जाती है परंतु उनका रक्त एक है। सावरकर का अस्पष्ट अभिमत था कि वर्तमान में विद्यमान हिंदू इस्लाम धर्मावलंबी ईसाई जैन बौद्ध एवं पारसी रक्त की दृष्टि से समान धर्म में है अर्थात अनुवांशिकता एवं जीव वैज्ञानिकता की दृष्टि से भारत में अनुवाद करने वाले नागरिकों के पूर्वजों में एकता परिलक्षित होता है। अनुवांशिकता की दृष्टि से जिस भाव बोध एवं भाव संज्ञा का जागरण होता है वह जीवंत स्वरूप भारतीय राष्ट्रवाद है उपासना पद्धति की भिन्नता इसे खंडित नहीं करती है।
हम तो नीचे गिरे दूध
को भी पैर नहीं लगाते,
निर्जीव किताब भी पैर
से लग जाये तो प्रणाम
कर लेते हैं !
हम पेड़ पौधे,पशु पक्षियों से
लेकर जानवरों को भी पूजते हैं!
आप मुसलमान हो,
इसलिए हम हिन्दू हैं!
वर्ना हम तो विश्वमानव थे और हैं !
जयतु जयतु हिन्दूराष्ट्रं💐












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