आधुनिक भारतीय राजनीतिक चिंतन के स्त्रोत


भारत विश्व के प्राचीनतम राष्ट्रों में से एक है और विश्व की विभिन्न सभ्यताओं में से भारत की सभ्यता अत्यंत प्राचीन और इस प्राचीन सभ्यता वाले प्राचीन राष्ट्र में नैसर्गिक रूप से राजत्व के सिद्धांत भी अत्यंत प्राचीन हैं। यह कहना गलत ना होगा कि भारत की राजव्यवस्था उस समय भली-भांति पुष्पित और पल्लवित हो रही थी जब विश्व के अधिकांश देश विशेषता वर्तमान में सर्वाधिक विकसित एवं संपन्न कहे जाने वाले देश अंधकार के गर्त में डूबे हुए थे यह कहना भी अनुचित नहीं होगा कि विश्व परिदृश्य में उनका अस्तित्व ही नहीं था । भारत की राजव्यवस्था एक संरेख में ऐतिहासिक अनुक्रम में प्राचीन से आधुनिक तक राजनीतिक चिंतन के अनेकों अनेक आयामों को स्पर्श करते हुए निरंतरता के साथ  विकासोन्मुखी है।अतः भारत के आधुनिक राजनीतिक चिंतन के स्वरूप के निर्धारण में अनेकों अनेक तत्वों का अवदान है-
धर्म: भारतीय अर्थ और संदर्भ मेंं धर्म धारणा का विषय है और धारणा निरपेक्ष रूप से व्यष्टि वादी होती है अर्थात यह नागरिक चेतना पर निर्भर करता है कि वह किस प्रकार की धारणा को अंगीकार करता है। भारत में धर्म की धारणा सन्मार्ग की ओर प्रेरित करने वाला है। इसके साथ ही भारतीय धर्म शास्त्रियों ने भी धर्म का उद्देश्य समष्टि वादी बताया है अर्थात भारत में धर्म का उद्देश्य लोक कल्याण है। इसी तथ्य को दृष्टि पथ में रखते हुए समाजवादी चिंतक डॉ राम मनोहर लोहिया ने भारत में धर्म और राजनीति केेे संबंध को अन्योन्याश्रिरित बताते हुए धर्म को दीर्घकालिक राजनीति और राजनीति को अल्पकालिक धर्म की संज्ञा सेेे अभिहित किया है। महात्मा गांधी धर्म विहीन राजनीति को मातृत्व विहीन मांं कहा है।
प्राचीन राजनीतिक चिंतन पूर्णरूपेण धर्म पर अवलंबित था। आधुनिक काल खंड में बाल गंगाधर तिलक ने स्वतंत्रता के अधिकार को धर्म से अभिप्रेरित करने का प्रयास किया है। अतः स्वाभाविक रूप से आधुनिक भारतीय राजनीतिक चिंतन का महत्वपूर्ण स्रोत भारत का धर्म एवं अध्यात्म है।
प्राच्य शिक्षा:  भारतीय शिक्षा का आधुनिक राजनीतिक चिंतन पर व्यापक प्रभाव पड़ा। प्राचीन भारतीय शिक्षा पद्धति धर्म से निःसृत है। वेद ब्राह्मण ग्रंथ हरियाणा डाक उपनिषद तथा महाकाल स्मृति परंपरा तथा अर्थशास्त्री परंपरााााा का व्यापक प्रभाव आधुनिक राजनीतिक चिंतन पर पड़ा है। भारतीय शिक्षा के सास्वत पक्ष को अथवा तत्व को आधुनिक भारतीय राजनीतिक चिंतन ने अंगीकार किया है। राम की मर्यादा कृष्ण का उत्कर्ष और विवेक शंकर का मानस गीता के उपदेश भारतीय राजनीतिक मूल्यों को विश्व राजनीति से समीकृत करतेे हु भारतीय राजनीतिक मूल्यों को विश्व स्तरीय बना देते हैं। आधुनिक भारतीय राजनीतिक चिंतन इस राज्य शिक्षा को अपनेे चिंतन में समाहित करता है।
 पश्चात शिक्षा 18 वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में एवं 19वीं शताब्दी के प्रारंभिक दशक में भारत के वैचारिक वृतांत पर पश्चात शिक्षा की दस्तक होती है। पश्चात शिक्षा कार्य कारण संबंधों पर आधारित एक तर्कसंगत शिक्षा प्रणाली है। पश्चात शिक्षा प्रणाली की वैज्ञानिकता ने राजनीतिक चिंतन एवं दृष्टिकोण में व्यापक परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त किया है। स्वतंत्रता समानता, बंधुत्व, साम्यवाद, समाजवाद, अराजकतावाद, पूंजीवाद एवं पूंजीवाद की अर्थव्यवस्था, लोक कल्याणकारी राज्य की परिकल्पना आदि पश्चात विचारों में आधुनिक भारतीय राजनीतिक चिंतन को गहरे रूप से अनुप्राणित किया है।
 पुनर्जागरण: 19वीं शताब्दी के प्रारंभििक दश में यूरोपीय देशोंं मेंं पुनर्जागरण प्रारंभ होता है। पुनर्जागरण एक नवीन विचार की थी जिसकाा अभिप्रा वैज्ञानिक तरीके से तर्कपूर्ण पद्धतिि से तत्व मीमांसा तथा युगा अनुकूल उसकी प्रासंगिकताा को आधारित करना था। पुनर्जागरण पुरातन केेेे अप्रासंगिक मूल्यों का दर्पण था। पुनर्जागरण का उद्देश्य्य शाश्वत मूल्यों कीी प्रतिस्थापना था। आधुनिक भारतीय राजनीतिक चिंतकों पुनर्जागरण ने गहरे रूप से अनुप्राणित किया है। आधुनिक भारतीय राजनीतिक चिंतन पुनर्जागरण की गत्यात्ममक ऊर्जा कोो अंगीका करता है तथा नए भारत के निर्माण के लिए पुनर्जागरण की आदेेेेयता आवश्यक एवं अनिवार्य मानता है। राजा राममोहन राय, रविंद्र नाथ टैगोर, महर्षि अरविंद, महात्मामा गांधी, और पंडित नेहरू जैसे प्रवृत्त्त राजनीतिक चिंतकों पर पुनर्जागरण का व्यापक प्रभाव दिखाई पड़ता है।
धर्म सुधार: मध्य युग में पोप की सत्ता एवं राज्य की सत्ता के अंतर संघर्ष ने धर्म सुधार आंदोलन का वैश्विक सूत्रपाात किया फलता आधुनिक राजनीतिक चिंतकोंं के द्वारा भारत की आंतरिक संरचना में धर्म जनित कर्मकांड रूढ़ियों एवं प्रथाओं के अमानुषिक, अमानवीय, असमानता से युक्त धर्म में योग सापेक्ष सुधार की अपेक्षा प्रस्तुत की। राजा राममोहन राय के द्वारा सतीी प्रथा का विरोध एकेश्वरवाद की परिकल्पना को परिवर्तन करने का प्रबल पक्षष पोष दयानंद सरस्वती  के द्वारा वेदों की ओर लौट चलो की अवधारणा धर्म सुधार आंदोलन से अभिप्रेरित है।
लोकतंत्र: यूरोप में आधुनिक काल खंड में 1688 की गौरवपूर्ण क्रांति से विश्वव को नव्य्य संविधान तथाा लोकतंत्र का वैधानिक स्वरूप एवं ढांचा प्राप्त हुआ। आधुनिक भारतीय राजनीतिक चिंतन कौन है शासन प्रणाली के रूप में लोकतंत्र्र्र को अंगीकार किया तथा उसकेेेेेेे अनुप्रयोग पर वैचारिक जनमत परिनिर्माण का अनुसमर्थन किया। लोकतंत्र समानता बंधुत्व तथाााा विधि के शासन पर आधारित प्रशासनिक प्रणाली है। आधुनिक भारतीय राजनीतिक चिंतकोंं का सपना भारतीय अर्थथ एवं संदर्भ में लोकतंत्र को प्राणवान एवं जीवंत बनाना है। फलता समस्त आधुनिक भारतीय राजनीतिक चिंतन लोकतंत्र की वैचारिक से आच्छादित है।
सर्वधर्म समभाव या धर्मनिरपेक्षता: आधुनिक भारतीय राजनीतिक चिंतकों ने अपने चिंतन क्रम में एक ऐसे भारत की कल्पना प्रस्तुत की है जिसमें सभीी धर्मों के के प्रति समान आदर तथाा किसी प्रकार के  मत एवं धर्म को अबाध रूप से अनुशीलन करनेे की स्वतंत्रता हो। आधुनिक भारतीय राजनीतिक चिंतन कीी धर्म दृष्टि, धार्मिक समन्वय एवं सद्भाव पर आधारित है। भारतीय आध्यात्मिक चेतनाा से अभी-अभी प्रेरित आधुनिक भारतीय राजनीतिक चिंतकों मैंं धर्म की सास्वत धारणा को स्वीकार करते हुए यह प्रतिस्थापित किया कि प्रत्येक धर्मम का मूल लक्ष्य जनकल्याण है अतः आधुनिक भारतीय राजनीतिक चिंतन का एक महत्वपूर्णण भा धर्ममनिरपेक्षता की अवधारणा है। परंतुुु इस क्रम में यह तथ्य विशेष रुप से उल्लेखनीय है कि भारतीय धर्मनिरपेक्षता पश्चात धर्मनिरपेक्षताा के सदृश्य नहींं है। पश्चात धर्मनिरपेक्षता धर्मम एवं राजनीति के पूर्णता पृथक्करण पर जबकिि भारतीय धर्मनिरपेक्षता सकारात्मक धर्मनिरपेक्षताा है जिसका अभिप्राय है सर्वधर्म समभाव अथवा सभी धर्मों का अवैध रूप से आचरण करने की स्वतंत्रता।
साम्यवाद: कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो तथा दास कैपिटल के प्रकाशन के उपरांत साम्यवाद या मार्क्सवाद  विश्व में जाना जाने लगा। साम्यवाद काा प्रसिद्ध वाक्य "दुनियाा के मजदूरों एक हो जाओ तुम्हारे पास खोनेेे के लिए केवल बेड़ियां है और पाने के लिए पूरा संसार है।" विश्व नागरिकों केे लिए चंचल आकर्षण का केंद्र बन गया। साम्यवाद क्षमता पर आधारित राजनीतिक अवधारणा है जिसकाा मूल मंतव्य उत्पादन एवं वितरण केे साधनों पर स्वामित्व को सार्वजनिक करना है। प्रत्येक व्यक्ति अपनी योग्यता और क्षमता के अनुसार कार्य करेगा तथा आवश्यकताा के अनुसार ग्रहण करेगा। साम्यवाद निजीी संपत्ति का निषेध करता है इसलिए आधुनिक भारतीय राजनीतिक चिंतन को को भारती सामाजिक विसंगतियों केेेे अवसान के लिए महत्वपूर्ण अस्त्र लगता है तथा आधुनिक भारतीय राजनीतिक चिंतक एक सीमा तक साम्यवादी भाव दृष्टि को स्वीकार करते हैं।
समाजवाद: जगदीप समाजवाद कोई परिभाषित राजनीतिक चिंतन नहीं है समाजवाद एक ऐसीी टोपी है जिसेे सभी धारण करना चाहते हैं परंतु साम्यवाद से भिन्नताा रखते हुए समाजवाद का उद्देश्य लोकतांत्रिक वैधानिक साधनोंं के माध्यम से नागरिक क्षमताा की अवधारणा है। आधुनिक भारतीय राजनीतिक चिंतकों ने अधिकाधिक रूप से समाजवाद को स्वीकार किया है। महात्मा गांधी, नेहरू, राम मनोहर लोहिया, आचार्यय नरेंद्र देव और यहां तक की आंशिक रूप से स्वामी विवेकानंद नेे भी समाजवाद का पक्ष पोषण किया है।
उदारवाद: आधुनिक भारतीय राजनीतिक चिंतक उदारवादी विचार धारा के प्रवाह के फलस्वरूप संविधानवाद सहिष्णुता धर्मनिरपेक्षता व्यक्तिगत महत्ता मतभेदों के प्रति संवेदना, आर्थिक औद्योगिक प्रगति आदि के फलस्वरूप भारत में व्यक्तिति के मौलिक अधिकारों की मांंग को बल दिया है और इस विचार को अधिक मान्यता मिली की धर्मम तथा राजनीति काा पृथक्करण होनाा चाहिए। आधुनिक भारतीय राजनीतिक चिंतकों में भी राजा राममोहन राय, महा गोविंद रानाडे, दादा भाई नौरोजी, सुरेंद्रनाथ बनर्जी, और गोपाल कृष्ण गोखले आदि महानुभावों ने इस उदारवाद मेंं गहरी आस्था प्रकट की है।

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