अंबेडकर

भीमराव रामजी अंबेडकर विद्या के धनी निष्ठा वादी राजनीतिज्ञ विद्वता और समाज सुधारक थे। उन्होंने दलित बहुत ध्यान दोलन को प्रेरित किया और दलितों के साथ हो रहे सामाजिक भेदभाव के विरुद्ध अभियान चलाया था।वे स्वतंत्र भारत के प्रथम विधि एवं न्याय मंत्री भारतीय संविधान के जनक एवं भारत गणराज्य के निर्माता थे 1990 में मरणोपरांत उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया गया। इनके शोध का विषय द प्रॉब्लम ऑफ रुपी था। डॉक्टर भीमराव अंबेडकर जीवन भर दलितों के लिए संघर्ष करते रहे और उनके इस संघर्ष ने उन्हें दलितों के मसीहा के रूप में प्रतिष्ठित किया।
अंबेडकर धर्म प्रचारक नहीं थे वे राजनीतिक तथा सामाजिक नेता थे लेकिन व्यक्ति के जीवन में धर्म के प्रभाव से भलीभांति परिचित थे अतः उन्होंने धर्म का दलित उद्धार के साधन के रूप में प्रयोग किया। उनके अनुसार धर्म व्यक्ति के लिए है ना कि व्यक्ति धर्म के लिए।धर्म व्यक्तियों के बीच भेदभाव नहीं करता और जो धर्म ऐसा करता है वह वास्तव में धर्म नहीं बल्कि मानवता का अपमान है।डॉ आंबेडकर देश में प्रचलित धार्मिक स्थिति से संतुष्ट नहीं थे जहां धर्म के नाम पर अछूतों के साथ भेदभाव किया जाता था।
कम्युनल अवार्ड की घोषणा गोल में सम्मेलन में हुए विचार-विमर्श का परिणाम था।इस समझौते के तहत अंबेडकर द्वारा उठाई गई राजनीतिक प्रतिनिधित्व की मांग को मानते हुए प्रश्न निर्वाचित का में दलित वर्ग को 2 वोट देने का अधिकार प्रदान किया गया इसके अंतर्गत 1 वोट से दलित अपना प्रतिनिधि चुन सकते थे वह दूसरे वोट से सामान्य वर्ग का प्रतिनिधि चुनने की आजादी थी। इस प्रकार दलित प्रतिनिधि केवल दलितों किए ही वोट से चुना जाना था। लेकिन वही दलित वर्ग अपनी दूसरी वोट का इस्तेमाल करते हुए सामान्य वर्ग के प्रतिनिधि को चुनने में अपनी भूमिका निभा सकता था।
अंबेडकर के अनुसार जाति एवं रक्त की कर्मकांड के सिद्धांत को ब्राह्मणवाद कहा जाता था।अंबेडकर देश में प्रचलित धार्मिक स्थिति से संतुष्ट नहीं थे जहां धर्म के नाम पर दलितों के साथ भेदभाव किया जाता था। वे मानव मात्र के प्रति समानता के संदेशवाहक थे। अंबेडकर दलितों के हितों के लिए ब्राह्मणवाद का विरोध करते हुए संघर्ष प्रारंभ किए।
कर्मकांड उपासना पद्धति नहीं बल्कि कर्मकांड हिंदू धर्म में महत्वपूर्ण ग्रंथों में पूजा की असामयिक पद्धतियां है बली यज्ञ आदि की प्रथा के परंपरा के अनुसार जीवन से मुक्ति के लिए दान बली दिया जाता है अंबेडकर इन सभी प्रकार की अंधविश्वासों के विरोधी थे।
अंबेडकर के पूर्व कई समाज सुधारक दयानंद सरस्वती विवेकानंद महात्मा गांधी आदि ने दलित उद्धार के लिए कई प्रयास किए किंतु अंबेडकर की तरह जाति प्रथा हुआ हिंदू समाज के विधान पर कुठाराघात किसी ने नहीं किया। अंबेडकर वर्ण व्यवस्था जाति व्यवस्था की आलोचना की और कहा कि इस व्यवस्था पर आधारित सामाजिक ढांचे की हिंदुत्व योजना ने जाति व्यवस्था और छुआछूत को जन्म दिया है।
भीमराव अंबेडकर दलितों के उद्धार के लिए संघर्ष प्रारंभ किया इसके लिए वे जीवन भर प्रयत्नशील रहे इस जाति व्यवस्था व अंतर जाति विवाद को समाप्त करने के लिए अंतरजातीय विवाह का समर्थन किया।
अंबेडकर छुआछूत को राष्ट्रीय राष्ट्रीय एकता में बाधक मानते थे अतः उन्होंने इसके समापन के लिए प्रयास किया जिसके परिणाम स्वरूप अनुच्छेद 17 में अस्पृश्यता का अंत कर दिया गया है। अनुच्छेद के अनुसार जो व्यक्ति अस्पृश्यता का प्रचार करेगा उसे दंड मिलेगा आता है इसके द्वारा मानव द्वारा मानव पर किए जाने वाले अत्याचार को समाप्त कर दिया गया है अंबेडकर के विचारों का केंद्र बिंदु दलित उद्धार हुआ अस्पृश्यता का अंत था।
डॉक्टर अंबेडकर देश में प्रचलित धार्मिक स्थिति से संतुष्ट नहीं थे जहां धर्म के नाम पर अछूतों के साथ भेदभाव किया जाता था उन्होंने इसकी आलोचना की।इस दृष्टि से ईसाई धर्म इस्लाम धर्म और सिख धर्म उन्हें अपूर्ण लगे इसलिए वे बौद्ध धर्म के प्रति आकर्षित हुए और आगे चलकर अपने समर्थकों के साथ 1956 में बौद्ध धर्म ग्रहण कर लिया।बौद्ध धर्म के प्रति आकर्षित होने के कई कारण थे जैसे बहुत धर्म नैतिकता पर आधारित है उसमें समानता है बौद्ध धर्म तर्क पर आधारित है। इस संबंध में यह उल्लेखनीय है कि हिंदू धर्म के प्रति विरोध भावना और बौद्ध धर्म ग्रहण करने के लिए भी भीमराव अंबेडकर का दृष्टिकोण धर्मनिरपेक्ष वादी ही बना रहा।
अंबेडकर ने अपने समय में मंदिर खूनी तथा तालाब आदि सार्वजनिक स्थानों पर प्रचलित दलित वर्गों के निषेध का विरोध किया ऐसा करना दलितों के साथ अन्याय करना है इसके लिए उन्होंने सत्याग्रह किया। सत्याग्रह का उद्देश्य समाज के लोगों में दलितों के प्रति व्यवहार परिवर्तन लाना है उनके इस दिशा में किए गए प्रयासों से सफलता भी मिली।
विशेष अवसर का सिद्धांत आरक्षण
डॉक्टर अंबेडकर ने दलितों की स्थिति सुधारने के लिए कानूनों में सुधार की आवश्यकता पर जोर दिया और स्पष्ट किया कि परंपरागत कानूनों में समय अनुकूल परिवर्तन आवश्यक है।संविधान में दलित वर्गों को न केवल समानता के अधिकार दिए गए हैं बल्कि कुछ विशेष प्रकार के संरक्षण आरक्षण भी प्रदान किए गए हैं। उन्होंने दलित वर्ग के विकास के लिए संविधान निर्मात्री सभा में कई प्रकार की सिफारिशें की जो इस प्रकार है-
- दलित छात्रों के वजीफा की संख्या बढ़ाई जाए
- छात्रावासों की व्यवस्था की जाए
- प्रशिक्षण के लिए वजीफे दिए जाएं
- विदेश में इंजीनियरिंग पढ़ने के लिए वजीफा दिया जाए।
शूद्रों को शोषित, शिक्षा से वंचित तथा तुच्छ बताने वाले, वर्ण व्यवस्था तथा जाति के विनाश के नाम पर सनातन हिंदू शिक्षा पद्धति, शास्त्रों तथा संस्कृतियों को बदनाम करने वाले, खुद को दलितोद्धारक कहने वाले तथाकथित विद्वानों को यह लेख अवश्य पढ़ना चाहिए , हिन्दू_समाज_में_शूद्रों_को_क्या_क्या_शिक्षा_दी_जाती_थीं?










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