गांधीवाद

गांधीवाद से अभिप्राय है गांधीजी के सिद्धांतों में विचारों और उनके मंतव्य का सामूहीकरण। गांधी जी द्वारा प्रतिपादित सिद्धांतों को गांधीवाद का नाम दिया जाता है।
गांधीजी और धर्म
गांधीजी ने धर्म को जीवन और समाज का आधारभूत तत्व स्वीकार किया जिसे निकाल देने से व्यक्ति और समाज दोनों ने से प्राण और सुनने हो जाते हैं। गांधी जी ने अपने धर्म की व्याख्या करते हुए कहा था-
धर्म हमारे हर काम में समाया हुआ होना चाहिए। यहां धर्म का अर्थ संप्रदाय वाद नहीं है या धर्म हिंदुत्व इस्लाम और ईसाइयत आदि से परे है।
मनुष्य धर्म के बिना नहीं जी सकता। कुछ लोग अपनी बुद्धि के घमंड में कह देते हैं कि उन्हें धर्म से कोई वास्ता नहीं है परंतु यह ऐसी ही बात है जैसे कोई मनुष्य यह कहे कि वह सांस तो लेता है परंतु उसके नाक नहीं है
गांधी धर्म मूलतः मानवतावादी है। उसका चरम लक्ष्य मानव सेवा है। गांधी धर्म के प्रमुख तत्व है सत्य और प्रेम अथवा अहिंसा। वह व्यक्ति के दैहिक मानसिक और आचरणात्मक बच्चों को धर्म से संयुक्त करते हैं। उनके निष्ठा धर्म अनुप्राणित व्यक्तित्व में है। गांधी जी का धर्म साहित्य का धर्म है सहिष्णुता का धर्म है।
धर्म और राजनीति
महात्मा गांधी ने राजनीतिक आध्यात्मिक करण किया उनका विश्वास था कि यदि राजनीतिक मानव समाज के लिए वरदान होना है तो उसे उच्चतम नैतिक और आध्यात्मिक सिद्धांतों पर आधारित होना चाहिए। उन्होंने राजनीति को उच्च नैतिकता और धार्मिक भावना से ओतप्रोत किया। विदर्भ और राजनीति को पृथक नहीं मानते हैं। गांधी जी के अनुसार जो यह कहते हैं कि धर्म का राजनीति के साथ कोई संबंध नहीं है वे यह नहीं जानते कि धर्म का क्या अर्थ है। धर्म से पृथक राजनीति नहीं हो सकती। धर्म से पृथक राजनीति मृत्यु जाल है क्योंकि यह आत्मा का हनन करती है।गांधीजी नैतिकता और अशुद्ध आचार विचार को ही सच्चा धर्म मानते थे और उन्होंने राजनीति में भी नैतिक मूल्यों को महत्व दिया।
गांधीजी की अहिंसा
अहिंसा का शाब्दिक अर्थ है हिंसा या हत्या ना करना।हिंसा का अर्थ किसी भी जीव को स्वार्थ बस क्रोध अवश्य दुख देने की इच्छा से कष्ट पहुंचाना या मारना है हिंसा के मूल में स्वार्थ क्रोध या विद्वेष की भावना होती है इसके विपरीत अहिंसा के अनुयाई को इन सभी भावनाओं पर विजय प्राप्त करते हुए प्राणी मात्र के प्रति प्रेम और मैत्री की भावना रखनी होती है जिसे गांधीजी अहिंसा कहते हैं। गांधीजी के अनुसार कुविचार मिथ्या भाषण देश किसी का बुरा चाहना भी हिंसा है। हिंसा के दो बच्चे हैं सकारात्मक और नकारात्मक। किसी प्राणी को काम तथा क्रोध विदेश से वशीभूत होकर हिंसा ना पहुंचाना इसका नकारात्मक रूप है किंतु इससे अहिंसा का पूरा स्वरूप समझ नहीं आता अहिंसा का यथार्थ स्वरूप तो हमें इसे भावात्मक पक्ष से पता चलता है।भावात्मक अथवा सकारात्मक सरूपवाली अहिंसा को सर्व भव प्रेम और करुणा की भावना कहा जाता है। इसके चार मूल तत्व है प्रेम धरी अन्याय का विरोध और वीरता।
गांधीजी ने अहिंसा की तीन अवस्थाएं बताया है- जागृत अहिंसा औचित्य पूर्ण अहिंसा कायरों की अहिंसा
जागृत हिंसा
इसे वीर पुरुषों की अहिंसा भी कहते हैं यह वह अहिंसा है जो किसी दुख पूर्ण आवश्यकता से पैदा ना होकर अंतरात्मा की स्वाभाविक पुकार से जन्म लेती है।इसको अपनाने वाले अहिंसा को बोझ समझकर स्वीकार नहीं करते वरन आंतरिक विचारों के उत्कृष्टता या नैतिकता के कारण स्वीकार करते हैं।सफल व्यक्ति से अपनाते हैं और वह शक्ति संपन्न होकर भी शक्ति का तनिक सा भी प्रयोग नहीं करते।
औचित्य पूर्ण अहिंसा
इस प्रकार की अहिंसा वह है जो जीवन के किसी क्षेत्र में विशेष आवश्यकता पड़ने पर और चिट्टियां अनुसार एक नीत के रूप में अपनाई जाती है।यह हिंसा निर्मल व्यक्तियों की अहिंसा है या असहाय व्यक्तियों का निष्क्रिय प्रतिरोध।इसमें नैतिक विश्वास के कारण नहीं वरन निर्बलता के कारण ही अहिंसा का प्रयोग किया जाता है। लेकिन आगे चलकर गांधी जी ने इस प्रकारअहिंसा को अस्वीकार करते हुए कहा था कि निर्मलो की अहिंसा जैसी कोई चीज नहीं है दुर्बलता और अहिंसा परस्पर विरोधी है।
कायरों की अहिंसा
कई बार डरपोक तथा कायर लोग भी अहिंसा का दंभ भरते हैं गांधी जी ऐसे लोगों की अहिंसा को अहिंसा ना मानकर निष्क्रिय हिंसा मानते हैं। उनका विश्वास था कि कायरता और अहिंसा पानी और आग की भांति एक साथ नहीं रह सकते।अहिंसा वीरों का धर्म है और अपनी कायरता को अहिंसा की ओट में छुपाना निंदनीय तथा गणित है। यदि कायरता और हिंसा में से किसी एक का चुनाव करना हो तो गांधीजी हिंसा को स्वीकार करते हैं।










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