मानवेंद्र नाथ राय के विचार
मानवेंद्र नाथ राय का रोमांटिक क्रांतिवाद-
अपने चिंतन के प्रारंभिक काल में एमएन राय एक रोमांटिक क्रांतिकारी कहे जा सकते हैं उन पर आनंदमठ और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का विशेष प्रभाव पड़ा तथा अन्य आतंकवादियों के समान वह भी यह विश्वास करने लगे कि आतंकवादी उपायों से अंग्रेजों को भारतीयों के हाथों में सत्ता सौंपने के लिए बाध्य किया जा सकता है।थोड़े से उत्कट साहसी क्रांतिकारी शस्त्रों के बल पर ऐसी परिस्थितियां पैदा कर सकते हैं जो ब्रिटिश सत्ता को उखाड़ फेंक कर सके। राय का विचार था कि इन बातों के लिए भगवत गीता अनुमति देती है।महाभारत में कृष्ण ने अर्जुन को सलाह दी कि अपने भाइयों और संबंधियों के विरोध हथियार उठाने में उसे कोई हिचक नहीं करनी चाहिए और नैतिकता के परंपरागत नियमों की तिलांजलि दे देनी चाहिए।राय ने इसी आदर्श को भारत के लिए अनुकरणीय माना और कहा कि स्वतंत्रता प्राप्ति के अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए क्रांतिकारी हिंसात्मक साधनों का अपनाना अनुचित नहीं है।
एमएन राय द्वारा मार्क्सवाद की आलोचना-
एमएन राय ने अपने जीवन में कई वर्ष एक कट्टर मार्क्सवादी के रूप में बिताए प्रारंभ में उन्होंने मार्क्सवाद के व्यक्तित्व की भूरी भूरी प्रशंसा की उनके अनुसार मार्क सामाजिक अन्याय का क्रूर आलोचक था वह मार्च को तत्व था एक मानव वादी और स्वतंत्रता का प्रेमी मानते थे। रायका मार्क्सवादी स्वरूप सदा एक सा नहीं रहा बल्कि समय के साथ उसमें परिवर्तन आते गए विरोधी वादिया परंपरावादी मार्क्स नहीं बने रह सके। राय ने सैद्धांतिक तथा व्यावहारिक दोनों ही दृष्टि उसे मार्क्सवाद की आलोचना की है जो इस प्रकार है-
- राय के अनुसार मार्क्स का भौतिकवाद वैज्ञानिक तथा कट्टरपंथी है राय ने मार्क्सवाद की इसलिए आलोचना की है कि मानव प्राणी की स्वायत्तता को अस्वीकार किया था मार्क स्नेह व्यक्ति के मूल्य तथा महत्व की ओर समुचित ध्यान नहीं दिया।
- राय ने मार्क्स के दंडात्मक दर्शन का पूरी तरह विरोध किया और इसे मानव प्रगति के मार्ग में बाधक माना राय के अनुसार गंद आत्मक प्रगति ने मार्क्सवाद में प्रत्यय वादी तत्व समाविष्ट कर दिए हैं वादे तथा प्रतिवाद के द्वारा आगे बढ़ना तार्किक विवाद का लक्षण है यह कहना हास्यास्पद होगा कि द्रव्य तथा उत्पादन की शक्तियों की गति भी धनात्मक होती है।
- राय के अनुसार इतिहास की मार्क्सवादी व्याख्या इसलिए दोषपूर्ण है कि वह सामाजिक प्रक्रिया में मानसिक प्रक्रिया को बहुत कम स्थान देती है। इतिहास की व्याख्या की और भौतिकवादी बस्तवाद के आधार पर नहीं की जा सकती।मार्क्स ने मानवता वैचारिक सुधार व तथा पुरोगामी आर्थिक सिद्धांतों को तिलांजलि दे इतिहास तथा सामाजिक आर्थिक मान्यताओं पर अपना सिद्धांत आधारित किया।राय के अनुसार इतिहास केवल आर्थिक आधार पर ही नहीं होता उसके पीछे सामाजिक और विचारात्मक दृष्टिकोण भी होते हैं।
- राय के अनुसार मार्च का यह कथन असत्य है कि मध्यम वर्ग का अंत हो जाएगा और समाज केवल दो वर्गो अर्थात पूंजीपतियों और निर्धन वर्गों में विभाजित हो जाएगा राय ने मार्क्स की विचारधारा के प्रतिकूल यह पाया कि मध्यमवर्ग का विश्व में पहले से अधिक महत्व बढ़ा है।
- राय को मार्क्स द्वारा प्रतिपादित वर्ग संघर्ष की धारणा भी त्रुटिपूर्ण प्रतीत होती है इतिहास में विभिन्न सामाजिक वर्ग रह रहे हैं इसमें संदेह नहीं किंतु सामाजिक विद्वेष तथा संघर्ष की शक्तियों के अतिरिक्त सामाजिक सहयोग के बंधन भी क्रियाशील रहे।
- राय मार्क्स द्वारा प्रतिपादित सर्वहारा वर्ग के अधिनायक तंत्र की भी आलोचना की है वे सर्वहारा क्रांति को अपूर्ण मानते हैं कुछ मुट्ठी भर व्यक्ति जो सर्वहारा का प्रतिनिधित्व करने का दम भरते हैं कोई क्रांति नहीं ला सकते आज के युग में विशाल राज की सेनाओं के सामने उनकी शक्तिनगर ने होगी।राय के अनुसार मध्यमवर्ग सर्वहारा वर्ग से भी ज्यादा पिछड़ा हुआ है मध्यम वर्ग को अधिक प्रगतिशील एवं चेतना सील बनाने की आवश्यकता है।राय मध्यम वर्ग को ही समाज का नेतृत्व सौंपने के पक्ष में थे मार्क्स के विपरीत राय मध्यम वर्ग को ही क्रांतिकारी कार्यों का सूत्रधार मानते हैं।
एमएन राय का नव मानवतावाद-
एमएन राय की 9 मानव वादी विचारधारा को समझने के लिए यह आवश्यक है कि पहले यह जान लिया जाए कि मानवतावाद क्या है? मानव आदि तत्व पाश्चात्य दर्शन के अनेक संप्रदायों तथा युगों में देखने को मिलते हैं प्रोटो गोरस मोर बुकनी और हार्ड में मानव वादी प्रवृत्तियां विद्यमान थी। इस विचारधारा के अनुसार मनुष्य ही सब कार्यों का केंद्र बिंदु है भारत में चरवाक और बौद्ध दर्शन में मानवतावाद के स्पष्ट लक्षण मिलते हैं। आधुनिक युग में मानवतावाद यथार्थवाद अस्तित्ववाद एवं मार्क्सवाद के रूप में प्रकट हुआ है फिर भी पूर्ववर्ती मानवतावाद व्यक्ति को किसी अति मानवीय और अति प्राकृतिक सत्ता के अधीन करने की इच्छा की धारणा से नहीं बच पाए थेइसी कारण एमएन राय ने मानववाद को 19वीं शताब्दी के फ्रांस और जर्मनी के मानवतावादी संप्रदायों से भिंड बताया है।नवीन मानववाद विज्ञान और समाजशास्त्र ओं कार्य विज्ञान तथा ज्ञान के अन्य शाखाओं में हुए अनुसंधान ऊपर आधारित है उसका दार्शनिक आधार भौतिकवाद है और पद्धति यांत्रिक।राय को प्राचीन मानववाद की धर्म प्रधानता स्वीकार नहीं थी उन्होंने इस विचार का खंडन किया कि मनुष्य ब्रह्म रहस्यमय अति प्राकृतिक सत्ता के अधीन है।नव मानववाद मनुष्य को इसलिए सर्वोच्च मानता है कि उसके अनुसार इतिहास मनुष्य के क्रियाकलापों का लेखा-जोखा है और समाज को इस बात का अधिकार नहीं कि वह एक विशाल शक्ति के रूप में अपने को व्यक्ति पर थोप दी।
नव मानववाद नैतिक तथा आध्यात्मिक स्वतंत्रता विवेक तथा आचार्य नीति के मूल शास्त्री महत्व को स्वीकार करता है।राय के अनुसार मनुष्य स्वयं अपने भाग्य का निर्माता है और उसमें इतनी क्षमता है कि वह संसार को आज के बजाय अधिक श्रेष्ठ और सुंदर बना दे।राय यह मानकर चलते हैं कि मनुष्य स्वभाव से विवेकपूर्ण और नैतिक है अतः एक उन्मुक्त और न्याय पूर्ण सामाजिक व्यवस्था के निर्माण में समर्थ है। राय अपने मानवतावादी दर्शन में हचिंसन बेंथम से प्रभावित थे। रायका मानवतावाद विवेक और अलौकिक आत्मा पर आधारित था।वे आध्यात्मिक आत्मानुभूति में विश्वास नहीं करते थे क्योंकि वह भौतिकवादी विचारक थे।
राय के नव मानववाद समाजवाद में पर्याप्त अंतर है।नव मानववाद में व्यक्ति को प्रमुखता दी गई है जबकि मार्क्सवाद में इसके विपरीत स्थिति है।जहां मार्क्सवाद एक अच्छे समाज की रचना को प्राथमिकता देता है वहां राय के अनुसार अच्छे व्यक्ति का निर्माण अधिक महत्व रखता है।वस्तुतः राय मार्क्सवाद के विपरीत साधन तथा शादी की नैतिकता के औचित्य पर बल देते हुए दोनों के समन्वय के पक्षपाती हैं।










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