मोहम्मद अली जिन्ना

मोहम्मद अली जिन्ना भारतीय राजनीति के एक प्रतिभाशाली चरित्र मुस्लिम राज्य मर्मज्ञ और ऐसे स्वाधीनता सेनानी के रूप में हैं जिन्होंने आगे चलकर भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में अलगाव के बीज बोने वह भारत के विभाजन एवं पाकिस्तान के निर्माण में ऐतिहासिक भूमिका निभाई।
मोहम्मद अली जिन्ना ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत दादाभाई नौरोजी के सचिव के रूप में प्रारंभ की तथा गोखले जैसे उदार वादियों के साथ रहकर उन्हें के पद चिन्हों पर चलना शुरू किया। इस तरह से उनका राजनीतिक जीवन मुस्लिम गोखले से होकर मुस्लिम महात्मा तक का सफर तय किया जिसके अंतर्गत उन्होंने अपनी विचारधारा को ऐसा मोड़ दिया जिसने राष्ट्रीय आंदोलन में दरार पैदा कर दिया ।
जिन्ना ने अपने प्रारंभिक राजनीतिक जीवन में धर्मनिरपेक्ष और उदारवादी विचारों का समर्थन किया वह भारत को एक ऐसा धर्मनिरपेक्ष राज्य बनाना चाहते थे जहां सभी समुदाय सवार दो पूर्ण तरीके से रह सके।अपने प्रारंभिक राजनीतिक जीवन में हिंदू-मुस्लिम एकता के समर्थक रहे और उन्होंने मुस्लिम लीग की संप्रदायिक विचार का विरोध किया।उन्होंने मुस्लिम लेख की संप्रदायिक निर्वाचक मंडल की मांग का विरोध किया और उन्होंने खिलाफत आंदोलन का भी विरोध किया क्योंकि वह धर्म पर आधारित था।जिन्ना अपने प्रारंभिक राजनीतिक जीवन में एक उदारवादी धर्मनिरपेक्ष वादी दृष्टिकोण पर बल देते हुए संप्रदायिकता का विरोध किया और कहा कि धर्म व्यक्ति का निजी मामला है इसलिए इसका राजनीति से कोई सरोकार नहीं होना चाहिए। अतः धर्म तथा राजनीति को पृथक रखते हुए राजनीतिक व्यवहार किए जाएं इस समय वह हिंदू मुस्लिम एकता के साथ-साथ भारत की स्वतंत्रता की मांग का पुरजोर समर्थन कर रहे थे जिसमें हिंदू मुस्लिम दोनों के हित नहीं थे। परंतु आगे चलकर व्यावहारिक राजनीति की आवश्यकता नहीं जिन्ना की विचारधारा को संप्रदायिकता की ओर मोड़ दिया।
1921 में गांधी के असहयोग आंदोलन और जन जागृति की शुरुआत अवसर पर जिन्ना ने यह अनुभव किया कि गांधीजी की अदम में नेतृत्व के सामने उनका अपना राजनीतिक भविष्य सर्वथा अनिश्चित हो गया है। इसके अलावा गांधीजी की नीति से उधार और नरम दल ई मान्यताओं को धक्का पहुंचा जिसमें मूलता जिन्ना की आस्था रही थी।इसके अलावा गांधीजी की रामराज्य की परिकल्पना से मुस्लिम मध्यवर्ग विचलित हो गया जिसका नेतृत्व जिन्ना कर रहे थे। इन परिस्थितियों की वजह से जिन्ना ने अपना अलग रास्ता अपना लिया जिसने उन्हें संप्रदायिकता के करीब लाकर खड़ा कर दिया। जो व्यक्ति पहले संप्रदायवाद का विरोध कर रहा था अब वही उसके समर्थन में खड़ा हो गया तथा उसकी प्राप्ति के लिए सतत रूप से सक्रिय हो गया।जिन्ना का राष्ट्रवाद
अपने राजनीतिक जीवन में झरना आने दो राष्ट्र के सिद्धांतों को स्वीकार किया पहले शुरू शुरू में उनके इस सिद्धांत का स्वरूप सांस्कृतिक था परंतु बाद में जिन्ना ने इसे एक राजनीतिक अस्त्र के रूप में अपनाकर भारत के मुसलमानों के लिए एक नए राज्य की मांग को बढ़ावा दिया। जिन्ना ने राष्ट्रवादी विचारधारा से नाता तोड़कर इस्लामिक विचारधारा के साथ नाता जोड़ लिया जिसका मूल उद्देश्य मुसलमानों की जड़ता और पिछड़ेपन को दूर करना था।इस्लामीकरण के आंदोलन में भारत के मुसलमानों के बीच भाषा क्षेत्र आर्थिक स्थिति का भेदभाव मिटाकर उन्हें साम्राज्यवाद के विरुद्ध एकजुट कर दिया था। इस आंदोलन की बागडोर मुस्लिम समुदाय के मध्य वर्ग और उच्च वर्ग में अपनी स्थिति सुदृढ़ करने के उद्देश्य से उनकी धार्मिक भावना का भरपूर फायदा उठाया।
वह हिंदू धर्म को अपने लिए एक खतरा मानते हुए हिंदुओं और मुसलमानों के बीच ऐतिहासिक और आध्यात्मिक अंतर पर बल दिया और यह प्रचार किया कि दोनों एक साथ नहीं रह सकते। जिन्ना ने दावा किया कि मुस्लिम समुदाय की समस्या का समाधान पृथक निर्वाचक मंडल नहीं बल्कि पृथक राष्ट्र है। संक्षेप में भारत के हिंदू और मुसलमान एक राष्ट्र नहीं बल्कि पृथक पृथक राष्ट्र है। यही जिन्ना के दो राष्ट्रों के सिद्धांत का सार तत्व है।
आगे चलकर जिन्ना ने स्पष्ट किया कि मुसलमान अपने धर्म को राजनीति से अलग नहीं कर सकते यही उनकी परंपरा है। उनकी मस्जिद केवल संस्था का अस्थान नहीं बल्कि उनका सभा भवन भी होता है।उन्होंने यह भी तर्क दिया कि हिंदू और मुस्लिम धर्म ऐसी सहित आएं हैं जो केवल मनुष्य और ईश्वर के संबंधों को नियमित नहीं करता बल्कि इससे बढ़कर मनुष्य और उनके सचिवों के संबंध को नियमित करती है।वे केवल उनके कानून और उनकी संस्कृति को निर्धारित नहीं करती बल्कि उनके सामाजिक जीवन के प्रत्येक पक्ष का निर्देशन भी करती हैं।
मुसलमानों की अपनी विशिष्ट सभ्यता संस्कृति भाषा साहित्य कला स्थापत्य नाम उपनाम कानून नैतिकता रीत रिवाज इतिहास परंपरा रुझान और आकांक्षाएं संक्षेप में वे एक पृथक राष्ट्र है। इस्लामी राज्य के विकास के लिए उसे हिंदू धर्म और राजनीति से पृथक करना जरूरी होगा।मुसलमान हिंदुओं के साथ एक ही राज्य की छत्रछाया में रहकर अपना विकास नहीं कर सकते।जिन्ना ने तर्क दिया कि यदि भारत के शहीद होने पर वहां पश्चिमी ढंग का लोकतंत्र स्थापित किया जाएगा तो इसका अर्थ होगा कि मुस्लिम और अन्य अल्पसंख्यकों के विरुद्ध हिंदू राष्ट्र की स्थापना।उन्होंने मान्यता रखी थी कि इंग्लैंड जैसे समझाती देश में जो लोकतांत्रिक प्रणाली प्रचलित है वह भारत जैसे विषम जाती देश में लागू नहीं की जा सकती।
जिन्ना ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को हिंदू संगठन की संज्ञा देकर कांग्रेश तानाशाही और हिंदू आधिपत्य जैसे नारे बुलंद किए। हालांकि स्वयं कांग्रेसमें बहुत सारे मुस्लिम नेता शामिल थे। जिन्ना ने मुस्लिम लीग को मुसलमानों की एकमात्र प्रतिनिधि पार्टी घोषित किया और मुसलमानों के लिए पृथक राज्य की मांग की जिसे अंततः मान लिया गया। जिसके परिणाम स्वरूप 1947 में भारत की स्वतंत्रता के साथ ही उसका विभाजन हो गया और पाकिस्तान ने नामक एक नया राज्य अस्तित्व में आया और जिन्ना उसके प्रथम वायसराय बने।










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