आदिवासी अस्मिता: तब और अब - एक विमर्श

प्रयागराज: आदिवासी समुदाय विकास की मुख्यधारा से क्यों नहीं जुड़ पा रहा है? क्या आदिवासी समुदाय आधुनिक विकास कार्यों को अपनी अपनी अस्मिता से जोड़ कर देखता है और क्या उसे अपनी अस्मिता पर खतरा मानते हैं? ऐसे ही अनकों समस्याओं के समाधान हेतु अनेक वक्ताओं ने एक विमर्श किया।  दिनांक 17 जनवरी 2020 को ईश्वर शरण डिग्री कॉलेज, इलाहाबाद विश्वविद्यालय के निर्मला देशपांडे सभागार में  विशेष व्याख्यान का आयोजन किया गया, जिसका विषय था  ‘आदिवासी अस्मिता: तब और अब’। मुख्य वक्ता के रूप में भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद के नेशनल फेलो प्रो. एस.एन. चैधरी जी थे।

 विषय परिवर्तन करते हुए ईश्वर शरण डिग्री कॉलेज के समाजशास्त्र विभाग के सहायक आचार्य डॉ0 विकास कुमार ने कहा कि जब किसी आदिवासी क्षेत्र के लिए विकास की आधुनिक और प्रगतिशील अवधारणा के अनुरूप बड़ी योजनाएं प्रारंभ की जाती है तो उन्हें आदिवासी समुदाय के प्रतिरोध का सामना करना पड़ता है इस अवरोध और तनाव के कारण ऐसा प्रतीत होता है कि मानो आदिवासी समुदाय विकास का विरोधी और बाधक है, लेकिन यह सच नहीं है ऐतिहासिक तथ्य  यह है कि किसी भी अन्य जन समुदाय की तरह आदिवासी समुदाय में परिवर्तन एवं जीवन की गुणवत्ता में वृद्धि का स्वागत करता है। प्रश्न उठता है कि जब विकास की आधुनिक प्रगतिशील अवधारणा के प्रति उनका मन डरा क्यों है और वे इसका प्रयोग क्यों करते हैं? डॉ कुमार ने कहाँ कि हमें आदिवासी अस्मिता का भरपूर ख्याल रखना होगा ।

मुख्य वक्ता प्रो. एस.एन चैधरी ने ‘आदिवासी अस्मिता: तब और अब’ विषय पर अपना व्याख्यान दिया। उन्होंने कहा कि विकास  से हमारा तात्पर्य आर्थिक- सामाजिक विकास से होता है और अब तक हमने इसके दो प्रमुख और विभिन्न प्रारूपों को देखा है जो क्रमश पूंजीवाद और समाजवाद है। पूंजीवाद प्रारूप में जहां तकनीकी प्रगति, औद्योगिकरण, सकल राष्ट्रीय उत्पाद में वृद्धि, प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि, आधुनिकीकरण आदि पर जोर दिया जाता है। वहीं समाजवादी प्रारूप में तकनीकी, आर्थिक नियंत्रण उत्पादन के साधनों का केंद्रीकरण तथा समस्त संसाधनों का राज द्वारा नियंत्रण लेकिन दुर्भाग्यवश संतोषजनक रूप में जनसाधारण की समस्याओं के समाधान एवं उनके जीवन स्तर को ऊपर उठाने में दोनों ही प्रारूप और असफल रहे हैं। आदिवासी अस्मिता भौतिक और अभौतिक दोनों साधनों से वर्तमान में संघर्ष कर रही है हमें आदिवासियों की संस्कृति, परंपरा  और उनके प्रारंभिक कलाओं को बचाने की जरूरत है। धन्यवाद ज्ञापन डॉ विवेक कुमार यादव ने किया और मंच संचालन डॉ अरविंद कुमार मिश्रा ने किया।इस अवसर पर  समाजशास्त्र विभाग के संयोजक डॉ आनंद सिंह, डॉ.इंदिरा श्रीवास्तव, डाॅ0 जमील अहमद एवं डाॅ0 विवेक कुमार राय सहित काफी संख्या में विद्यार्थी मौजूद रहे।

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