भक्ति की परिकाष्ठा और हनुमान की व्यापकता


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यत्र-यत्र रघुनाथ कीर्तनम, तत्र-तत्र कृत मस्तकाण्जलिम।
वाष्पवारि परिपूर्ण लोचनम, मारूतिं नमत राक्षसान्तकाम।।

जहाँ-जहाँ प्रभु की भक्ति, कथा या भजन-कीर्तन, वहाँ भगवन् भक्त हमेशा हाजिर रहते हैं, प्रभु माने जो भी भगवान् हो चाहे भगवान् राम हो, भगवान् कृष्णजी हो चाहे भगवान् भोलेनाथ हो चाहे भगवान् श्री हरि हो, हनुमानजी की रूचि है जहाँ-जहाँ भगवान् की कथा होती है, कीर्तन होता है वहाँ-वहाँ श्री हनुमानजी बैठकर सुनते हैं, हमारे पास सत (सत्य) नहीं है अतः पहचान नहीं पाते।

हमने सुना है कि एक बार श्रीमदबल्लभाचार्य महाराजजी चित्रकूट आए श्रीमद्भागवत सप्ताह परायण करने के लिए तो हनुमानजी का आह्वान किया और हनुमानजी को यजमान बनाया और वहाँ हनुमानजी प्रकट हो गये, हनुमानजी ने कहा मैं आपके श्रीमुख से एक बार श्रीरामकथा सुनना चाहता हूँ, बल्लभाचार्यजी ने बैठकर हनुमानजी को श्रीराम-कथा सुनाई, हनुमानजी ने कहा आपने इतनी सुन्दर कथा सुनाई।

मैं यजमान बना हूँ और जब तक यजमान कथावाचक को दक्षिणा न दे उसे कथा का पुण्य भी नहीं मिलता, बोलिए आपको क्या दक्षिणा दूँ? महाराज ने कहा एक ही दक्षिणा दे दीजिये, बोले क्या? मन्दाकिनी के तट पर बैठकर आप एक बार मेरे मुख से श्रीमद्भागवत कथा सुन लीजिए बस मेरी यही दक्षिणा है, फिर हनुमानजी ने श्रीमद्भागवत सुनी।

देखो कथा जरूर सुनो, कथा कही भी हो मैं हमेशा कथा सुनने के लिए तत्पर रहता हूँ, मैं आपको भी कथा सुनने का आग्रह करता हूँ चूंकि जो हम सुनते हैं वह हमारी सम्पदा बन जाती है, जो हम सुनते हैं वह हमारे भीतर बैठ जाता है और जब तक आप किसी के बारे में सुनोगे नहीं, तब तक आप उनके बारे में जानोगे नहीं तो आप उनसे मिलोगे कैसे? हम सब भगवान् से मिलना चाहते हैं लेकिन भगवान् को जाने, तब न मिले अपरिचित से कैसे मिले? भगवान् को यदि जानना है तो भगवान् की कथा सुने।

जानें बिनु न होई परतीती, बिनु परतीती होइ नहिं प्रीती।
प्रीति बिना नहिं भगति दृढाई, जिमि खगपति जल कै चिकनाई।।

पहले सुनो "श्रवणम कीर्तनम" श्रीमद्भागवत की नवधा भक्ति में श्रवण को पहला स्थान दिया है, वाल्मीकिजी ने भी कहा है कि भगवान् की कथा सुनना प्रभु मिलन का साधन है, जिनको भी भगवान् का साक्षात्कार हुआ है कथा के द्वारा ही हुआ है, गोस्वामीजी को प्रभु मिले हैं तो कथा से ही मिले हैं, हमको और आपको भी मिलेंगे तो कथा से ही मिलेंगे।

जिन्ह के श्रवण समुद्र समाना, कथा तुम्हारी सुभग सरि नाना।
हरहिं निरन्तर होहिं न पूरे, तिन्ह के हिय तुम्ह कहुँ गृह रूरे।।

विभीषण इसके उदाहरण हैं, विभीषणजी जब भगवान के पास गये तो भगवान ने पूछा कि मेरे पास आना तो इतना सरल नहीं है तुम यहाँ तक आ कैसे गए तो विभीषणजी बोले कि प्रभु आपकी मंगलमय मधुर कथा को सुनकर, कथा किसने सुनायीं?  बोले तब "हनुमंत कही सब रामकथा" जब हनुमंत आए थे न, तभी उन्होंने आपकी कथा सुनायीं, ठीक है कथा तो सुनायीं थी लेकिन कथा यहाँ तक कैसे ले आयी आपको।

विभीषणजी ने कहा, महाराज इतनी सुन्दर आपकी कथा सुनाई थी कि कथा सुनकर मेरे मन में भाव आ गया कि जिनकी कथा इतनी सुन्दर है वह स्वयं कितने सुन्दर होंगे, जरा चलकर एकबार प्रभु के दर्शन कर लें, कथा मुझे आपके चरणों तक ले आयी इसलिये गोस्वामीजी ने कहा है "जानें बिनु न होय परतीति, बिनु परतीति होय नहिं प्रीति" कथा का श्रवण करें और मैने कई बार आपको यह सिद्धांत आर्टिकल के द्वारा सोशल नेटवर्क के माध्यम से पढ़ाया है।

यह सिद्धान्त समझिए हमारे मुख से जो अन्दर जाता है वह हमारे मलद्वार से बाहर निकल जाता है और जो हमारे कानों और आँखों के द्वारा भीतर जाता है वह हमारे मुख के द्वारा बाहर निकलता है, कान में औषधि डाली तो मुख में आ जाती है, अगर कान के द्वारा क्रोध की बातें भीतर ले जाओगे तो मुख दिन भर गाली-गलौच करेगा, कान के द्वारा आप विषय भोगो की चर्चा भीतर ले जाओगे तो मुख दिनभर विषय भोगो की चर्चा करेगा।

और कान और आँखों के द्वारा आप भगवान् की मंगलमय कथा भीतर ले जाओगे तो मुख दिनभर भगवान् की भक्ति की भजन की, कथा की चर्चा करेगा, निर्णय हम करे कि कानो और आँखों से कथा ले जानी है या कचरा ले जाना है, अनुभव यह कह रहा है कि कथा कम जाती है, सामान्यत: कचरा ही जाता है, मुख दिनभर कचरे में ही लगा रहता है, तो जहाँ कचरा होता है वहाँ गन्दगी, मक्खी, मच्छर व सुअर जमा हो जाते हैं, वहाँ कोई खडा होना पसन्द नहीं करता है।

लोग नाक बंद करके वहाँ से दौडते है, कचरे घर के पास कोई खडा होना पसन्द नहीं करता, जीवन को कचराघर मत बनाइयें, भगवान् के सत्संग की कथा का भवन बनाइयें जहाँ नित्य नियमित कथा गायीं जायें  ऐसा हमारा मन-मन्दिर चाहिये, सत्संग-भवन हमारे भीतर चाहिये, दूसरा सिद्धान्त जो कुछ हम सुनते हैं वह हमारे मन में बैठ जाता है और जो हमारे मन में बैठा होता फिर माथे की आँखे हमेशा उन्हीं की खोज करती है।

इसलिये श्री हनुमानजी महाराज को अपना गुरु बनाईयें, अच्छा दोस्त बनाईयें, हनुमानजी हमेशा आपको आगे बढ़ने में मदद करेंगे, अगर गुरु सक्षम है तो शिष्य को भी सक्षम बनने में देर नहीं लगती, हनुमानजी बल, बुद्धि और विधा के सागर है, साथ ही हनुमानजी भक्तों के परम हितेशी है, अतः भाई-बहनों, श्री रामजी के भक्त श्री हनुमानजी आप सभी का भला करें।

   डा अखिलेश त्रिपाठी

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