महान शासकों के नाम पर इतिहास में केवल विदेशी शासकों और आक्रमण कर्ताओं को ही पढ़ाया जाता है जबकि भारत में कई विश्व विजय करने वाले महान चक्रवर्ती सम्राट हुए जानिए ऐसे ही एक महान चक्रवर्ती सम्राट के बारे में
इतिहास में आपने भी कई महान शासकों के बारे में पढ़ा होगा जैसे सिकंदर महान और अकबर महान इसी प्रकार इतिहास के नाम पर मुगलों और विदेशियों के इतिहास और उन्हीं के प्रकरणों को पढ़ाया जाता है। हम भारतीयों को हमारे भारतीय चक्रवर्ती सम्राटों की विजय गाथा से दूर रखा जाता है। जबकि भारतीय चक्रवर्ती राजाओं जिन्होंने विश्व विजय किया उनके इतिहास को नहीं पढ़ाया जाता या पढ़ाया भी जाता है तो बहुत ही छोटा सा और अप्रभावी इतिहास जबकि हमारे भारतीय इतिहास में ऐसे अनेकों अनेक महान चक्रवर्ती सम्राट हुए जिन्होंने भारतीय राज्य का अत्यधिक विस्तार किया था आइए जानते हैं ऐसे ही एक चक्रवर्ती सम्राट के बारे में -
यह है चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य परमार का विशाल साम्राज्य जो एशिया में फैला हुआ था। और #विक्रम_संवत_1 ही इसा पूर्व 56 हैं। अर्थात इसी वर्ष शकों को खदेड़ कर विक्रम संवत चलाया गया था। ईसा के जन्म के 56 वर्ष पूर्व चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य परमार ने विक्रम संवत चलाया था। अतः हमे चाहिए कि हम अपने हिंदू सम्राट द्वारा चलाए गए विक्रम संवत के अनुसार ही नववर्ष चैत्र के प्रथम दिन मनाएं। और इस जानकारी का और सभी हिंदू भाई और सभी भारतीय प्रसार करें और सभी को #विक्रम_संवत के प्रति जागरूक करें। महान हिंदू सम्राट विक्रमादित्य के बारे में लगभग आज सब भूल गये हैं, अतः सबको #विक्रमादित्य_परमार के इतिहास से परिचित कराए। यह भारत की आन बान और शान का प्रतीक महान और विशाल साम्राज्य देखकर अंग्रेजो के पीछवाड़े में आज भी जलन होती है, मुल्लो के इस्लाम के उदय से कई वर्षों पूर्व अरब में चक्रवर्ती विक्रम सेन का राज था और सनातन धर्म का पालन किया जाता था, और तो और विक्रमादित्य के अरब विजय का वर्णन अरबी कवि #जरहाम_कितनोई ने अपनी पुस्तक सायर-उल-ओकुल में किया हैं तथा अरब में पत्थर पर विक्रमादित्य के समय का आज्ञापत्र भी लिखा है। यह सब सुनकर मुल्लों के पिछवाड़े में भी जलन 🔥 होती है। इसलिए इस महान हिंदू सम्राट का हम सब भारतीयों को इतिहास कभी न भूलना चाहिए न भूलने देना चाहिए।
ईरान का राजा मित्रडोट्स प्रजा पर अत्याचार करने वाला शासक था, उसका वध चक्रवर्ती विक्रमादित्य ने किया इस बात का जिक्र स्वातंत्र्यवीर सावरकर जी ने भी अपने लेख में लिखा है। विक्रमादित्य का साम्राज्य पूर्व में चीन के साथ अरब ईराक और टर्की तक फैला हुआ था। महाकवि कालिदास भी उनके दरबार में एक नवरत्नों में शामिल विद्वान थे। कई हजार विद्वान भारत से विक्रमादित्य ने अरब यमन और अनेक विदेशी स्थानों में भारतीय विद्या और शिक्षा के प्रसार के लिए भेंजे थे। सायर-उल-ओकुल में भी जरहाम कितनोई ने लिखा है।इसी कारण भारतीय विघाए जैसे इंद्रजाल, समुद्र शास्त्र, मार्शल आर्ट (आयुर्वेद की मर्दन चिकित्सा ) आदि तथा एक्युप्रेशर जैसी चिकित्सा विदेशों में फैली।
विक्रमादित्य एक नाम नहीं उपाधि है जो विक्रम सेन परमार के नाम से दि जाने लगी। विक्रमादित्य की उपाधि पराक्रमीयों को ही मिलती थी। कई सम्राटों ने इसे प्राप्त भी किया और अपने नाम के आगे विक्रमादित्य लगाया।
अखण्ड भारत -
अखंड भारत के खंड











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