Fulfilment of New Women an India is a Myth. भारत में नए युग की नारी की परिपूर्णता एक मिथक है।
भारत में नए युग की नारी की परिपूर्णता एक मिथक है।
बात भारत की आधी आबादी की , नए युग की नारी की , यह कल्पना पश्चमि देशों से उभरी है और उन्ही के द्वारा चलाये गए आंदोलनों से प्रेरित है , चूँकि 17 वीं , 18 वीं सदी के दौरान पश्चिमी देशों की औरतों , महिलाओं का बराबर शोषण किया गया , उन्हें इस प्रकार मानसिक शोधन किया गया कि वे सदाशिला से अपरिपक़्व है , उनका कोई दिमाग नहीं है ,तथा वे निर्यण लेने में अक्षम होती है , इस सदी के दौरान जैसे ही पश्चमी सभ्यता का विकास हुआ, उन संस्कृतियों का स्थान कुछ रूढवादियो ने ले लिया , जिन्होंने महिलाओं के खानपान , रहन-सहन आने -जाने, जैसे कुटो के परिचालन के नियम बनाये। यहाँ तक उनके कपड़ों की अनोखी शिल्पी बनायी गयी , जिसमें उनके कमरो को भेहद पतला , तथा ह्रदय स्तन पर उभर तथा पैरों के नीचे तक ठका हुआ- चौड़ा बनाया, ताकि महिलायें उसे पहनकर परी जैसी सुंदर दिख सके , जो कि काल्पनिक कथाओं में मिलती है कि कोई परी नाम की चिड़ियां भी होता है।
इस प्रकार बने कपड़े ,ऊँचे सैंडिल में महिलाये खुद को असहज पाती है तथा उसके उपयोग से वे सीधे सरल कामों को करने में खुद को असमर्थ पाती थी और अवसाद ग्रस्त रहती थी, कि वे पुरुष रूपी मानव की गुलाम है और उसकी सुरक्षा तथा गुलामी में ही सुरक्षित जीवन व्यतीत करती थी। इस पर कुछ शिक्षित व श्रमिक महिलाये ने जो पिछड़े वर्ग से आती थी , उन्हें धीरे -धीरे इन सबको बदलने की करवाहट महसूस हुई।
बात भारत की आधी आबादी की , नए युग की नारी की , यह कल्पना पश्चमि देशों से उभरी है और उन्ही के द्वारा चलाये गए आंदोलनों से प्रेरित है , चूँकि 17 वीं , 18 वीं सदी के दौरान पश्चिमी देशों की औरतों , महिलाओं का बराबर शोषण किया गया , उन्हें इस प्रकार मानसिक शोधन किया गया कि वे सदाशिला से अपरिपक़्व है , उनका कोई दिमाग नहीं है ,तथा वे निर्यण लेने में अक्षम होती है , इस सदी के दौरान जैसे ही पश्चमी सभ्यता का विकास हुआ, उन संस्कृतियों का स्थान कुछ रूढवादियो ने ले लिया , जिन्होंने महिलाओं के खानपान , रहन-सहन आने -जाने, जैसे कुटो के परिचालन के नियम बनाये। यहाँ तक उनके कपड़ों की अनोखी शिल्पी बनायी गयी , जिसमें उनके कमरो को भेहद पतला , तथा ह्रदय स्तन पर उभर तथा पैरों के नीचे तक ठका हुआ- चौड़ा बनाया, ताकि महिलायें उसे पहनकर परी जैसी सुंदर दिख सके , जो कि काल्पनिक कथाओं में मिलती है कि कोई परी नाम की चिड़ियां भी होता है।
इस प्रकार बने कपड़े ,ऊँचे सैंडिल में महिलाये खुद को असहज पाती है तथा उसके उपयोग से वे सीधे सरल कामों को करने में खुद को असमर्थ पाती थी और अवसाद ग्रस्त रहती थी, कि वे पुरुष रूपी मानव की गुलाम है और उसकी सुरक्षा तथा गुलामी में ही सुरक्षित जीवन व्यतीत करती थी। इस पर कुछ शिक्षित व श्रमिक महिलाये ने जो पिछड़े वर्ग से आती थी , उन्हें धीरे -धीरे इन सबको बदलने की करवाहट महसूस हुई।
आज महिलाएं हर उस काम को कर पाने में सक्षम हैं जो एक पुरुष करता है। महिलाएं आज हर क्षेत्र में काम कर रही हैं जिसे कभी केवल पुरुषों का काम कहा जाता था।मर्दों को जन्म देने वाली महिलाएं जिन्हें दूसरी भाषा में जनाना कहा जाता है वह भी जनाना कार्यों से पर ही आज मर्दाना कामों को भी पूरी मर्दानगी के साथ संपन्न कर रही हूं तभी तो लक्ष्मी बाई के बारे में कहा जाता है कि खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी।
पश्चमी देशों की स्वतंत्रता कई युद्धों के बाद देशों को मिली। ऐसे में इन देशों में बड़ी संख्या में पुरुष लोगो की संख्या निरंतर कम होती जाती थी।










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