स्त्री का लोप सृष्टि का लोप है
यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः ।
यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः।।
स्त्री में पुरुष तत्व की प्रधानता उसे नेतृत्व कुशल, साहसी और प्रभावी बनाता है, पुरुष में स्त्री तत्व की प्रधानता उसे कलाकार, सृजनकर्ता बनाता है। ऐसा भी नहीं है कि स्त्री तत्व की प्रधानता वाले पुरुष हमेशा उस तत्व के प्रभाव में ही रहते हैं। ऐसा ही स्त्री के साथ भी होता है, लेकिन मूल स्वभाव में इन तत्वों की प्रधानता उभरकर आती है। जो भी महिलाएं ऐसे क्षेत्रों में कार्यशील है जिन्हें परंपरा से हमने पुरुष क्षेत्र माने हैं तो इसका यह मतलब हुआ कि उनके व्यक्तित्व में पुरुष तत्व प्रभावी है।
स्त्री ‘गुण’ है, कोई भौतिक इकाई नहीं है, ये सार है... सत्व है...। कोई स्त्री, इसलिए स्त्री नहीं है कि उसने स्त्री रूप में जन्म लिया है। उसे स्त्री बनाते हैं, स्त्रियोचित गुण... अब इसे चाहे जैसे लें... दुनिया के हर समाज में स्त्री, स्त्री है और पुरुष, पुरुष...समानता और विकास के सारे दावों और परिवेश के सारे तर्कों से इतर... स्त्री हर जगह एक ‘गुण’ है और पुरुष दूसरा ‘गुण’... इसका जन्म रूप से कोई लेना-देना नहीं है।
स्त्री जीवन का भाव पक्ष.... जीवन की कविता। जीवन का सारा सौंदर्य... प्रेम, सद्भावना, साहित्य, कला... सारी रूमानियत, सारी नज़ाकत... स्त्री...। पुरुष जीवन का भौतिक पक्ष... जीवन का गद्य। जीवन की सारी व्यवहारिकता... सारा खुरदुरापन... सारी जटिलताएं... पुरुष।
मनोविज्ञान बताता है कि हरेक में स्त्री और पुरुष दोनों होते हैं... और इन दोनों का अनुपात ही व्यक्तित्व का निर्धारण करता है। न भाव पक्ष के बिना जीवन है, न भौतिक पक्ष के बिना... दोनों के सामंजस्य से ही एक पूरा व्यक्ति बनता है, विकसित होता है, परिभाषित होता है। लेकिन दोनों के अलग-अलग अनुपात से हरेक व्यक्ति अलग-अलग होते हैं।
पुरुष तत्व की प्रधानता व्यक्ति को व्यवहारिक और व्यापारी बनाता है, जबकि स्त्री तत्व की प्रधानता व्यक्ति तो स्वप्नदृष्टा और कलाकार बनाता है। जिस भी व्यक्ति में स्त्री तत्व की अधिकता होती है उसका रुझान कला, साहित्य और संस्कृति की तरफ होता है। कलाकारों में स्त्री गुण प्रधान होते हैं... हर पुरुष में एक स्त्री सांस लेती है और हर स्त्री में एक पुरुष सांस लेता है।
वक्त-वक्त पर कभी स्त्री जाग जाती है, तो कभी पुरुष... जब स्त्री जागती है तो सृजन होता है, प्रेम होता है... पुरुष जागता है तो श्रम होता है, संघर्ष होता है, दुनियादारी होती है। और दोनों का अपना महत्व हुआ करता है।
व्यवस्था को बने रहने के लिए महत्वाकांक्षा की जरूरत होती है, चूँकि पुरुष ने जीवन का भौतिक पक्ष संभाला हुआ है, और बिना महत्वाकांक्षा के भौतिक पक्ष समृद्ध नहीं हो सकता है, इसलिए महत्वाकांक्षा मूलतः पुरुष गुण होता है। ये महिलाओं में भी पाया जाता है, लेकिन उसकी प्रकृति पौरुष होती है।
इसी तरह जीवन का भाव-पक्ष स्त्रियों ने संभाला हुआ है और बिना समर्पण के प्रेम शब्द की कोई तस्वीर नहीं उभरती है, इसलिए समर्पण स्त्री गुण हैं। ऐसा नहीं है कि ये पुरुषों में नहीं होता है, पुरुषों में भी होता है, लेकिन इसकी प्रकृति स्त्री है।
अर्धसत्य अर्थ स्वप्नत तुम अर्ध निराशा आशा,
अर्ध अजीत जित, अर्ध तृप्ति तुम, अर्ध अतृप्त पिपाशा
आधी काया आग तुम्हारी, आधी काया पानी
अर्धांगिनी नारी! तुम जीवन की आधी परिभाषा।
अर्धसत्य अर्थ स्वप्नत तुम अर्ध निराशा आशा,
अर्ध अजीत जित, अर्ध तृप्ति तुम, अर्ध अतृप्त पिपाशा
आधी काया आग तुम्हारी, आधी काया पानी
अर्धांगिनी नारी! तुम जीवन की आधी परिभाषा।
इसीलिए जब पुरुष सृजन करता है तो वह स्त्री तत्व से संचालित होता है और जब स्त्री नेतृत्व करती है तब वह पुरुष तत्व से संचालित होती है। सृष्टि को अपने अस्तित्व के लिए स्त्री की आवश्यकता है और व्यवस्था को अपने अस्तित्व के लिए पुरुष की।
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व्यवस्था स्त्री को पुरुष बनाना चाहती है। ताकि उसका अस्तित्व बना रहे।
नारी तुम प्रेम हो, आस्था हो, विश्वास हो,
टूटी हुई उम्मीदों की एकमात्र आश हो,
हर जान का तुम ही तो आधार हो,
नफरत की दुनिया में तुम ही तो प्यार हो,
उठो अपने अस्तित्व को संभालो,
केवल एक दिन के लिए नहीं हर दिन के लिए तुम खास हो।
टूटी हुई उम्मीदों की एकमात्र आश हो,
हर जान का तुम ही तो आधार हो,
नफरत की दुनिया में तुम ही तो प्यार हो,
उठो अपने अस्तित्व को संभालो,
केवल एक दिन के लिए नहीं हर दिन के लिए तुम खास हो।












Very nice
ReplyDeleteThank you so much
DeleteTruth
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