यथार्थवादी दृष्टिकोण

आदर्शवादी सिद्धांत की प्रतिक्रिया का परिणाम था यथार्थवादी सिद्धांत। 18वीं और 19वीं शताब्दी में यथार्थवादी सिद्धांत की चर्चा हुई और मैकियावेली का समूचा दर्शन यथार्थवादी चिंतन की आधारशिला प्रस्तुत करता है तथापि अंतरराष्ट्रीय राजनीति के क्षेत्र में इसका प्रयोग द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात्य हुआ। हिटलर और मुसोलिनी के अभ्युदय, उनकी आक्रामक और विस्तार वादी अभिवृत्ति, उनके द्वारा शक्ति और युद्ध की आवश्यकता पर जोर देने आदि ऐसे करते हैं जिन्होंने अंतरराष्ट्रीय राजनीति के विद्वानों को मानव स्वभाव एवं विश्व राजनीति यथार्थता को समझने के लिए लालायित किया।

यथार्थवादी दृष्टिकोण का आधार है मैंकियवेली का यह कथन की "मनुष्य, शस्त्र, धन एवं रोटी युद्ध की शक्ति हैं परंतु इन चारों में प्रथम दो अत्यंत आवश्यक है क्योंकि मनुष्य एवं शस्त्र, धन एवं रोटी प्राप्त कर सकते हैं परंतु रोटी तथा धन, मनुष्य एवं शस्त्र प्राप्त नहीं कर सकते।" वस्तुतः यथार्थवादी दृष्टिकोण शस्त्र और युद्ध को मानव स्वभाव की विशेषताएं मानता है। यह कहना अधिक उचित होगा कि यथार्थवाद विचारों का वह समूह है जो सुरक्षा और शक्ति के घटकों के ध्वनितार्थों को अपनी चिंतन सामग्री मानता है। इन विचारों का जन्म व्यक्तित्व इस विश्वास से होता है कि दूसरे लोग सदा उसे नष्ट करने की कोशिश करते हैं और इसलिए उसे अपनी रक्षा के लिए हर समय दूसरों को नष्ट करने के लिए तैयार रहना चाहिए। यथार्थवादी दृष्टिकोण की मूल मान्यता यह है कि राष्ट्रों के बीच विरोध एवं संघर्ष किसी ना किसी रूप में सदैव बना रहता है। यथार्थवादी इस विरोधी एवं संघर्ष को अंतरराष्ट्रीय संबंधों में एक सास्वत नियम के रूप में देखते हैं ना ही अंतरराष्ट्रीय राजनीति की आकाश्मिक घटना के रूप में।

यथार्थवाद के अनुसार, वाद तथ्यों के उचित मूल्यांकन के उपरान्त उनमें तर्कसंगत अर्थों को खोजने की प्रक्रिया है। किसी भी राज्य की परराष्ट्र नीति का पूर्वाभ्यास उस राज्य की राजनीतिक गतिविधियों, कार्यकलापों तथा घटनाक्रम के विश्लेषण से संभव है, परंतु केवल तथ्यों का विश्लेषण प्रर्याप्त नहीं है। यथार्थवाद के अनुसार, राष्ट्र की शक्ति का विकास ही है उसके हितों को पूर्ण करने का एकमात्र माध्यम है। प्रत्येक राज्य और राजनेता सत्ता और शक्ति के विकास से ही अपने हित की पूर्ति के लिए प्रयत्नशील रहते हैं। शक्ति और हित के आधार पर ही राज्यों के वास्तविक अभिनेताओं के कार्यों को समझा जा सकता है। यथार्थवादी दृष्टिकोण इस बात पर बल देता है क्यों विदेश में संबंधी निर्णय राष्ट्रहित के आधार पर लिए जाने चाहिए न कि नैतिक सिद्धांत और भावनात्मक मान्यताओं के आधार पर।

यथार्थवादी दृष्टिकोण के विकास में कई विद्वानों का योगदान रहा है जिनमें जार्ज कैनन, राइनाल्ड नेबूर, जार्ज श्वरजनबरगर, डॉ हेनरी किसींजर तथा हांस मार्गेंथाउ प्रमुख हैं। आज हांस मार्गेंथाउ को यथार्थवादी दृष्टिकोण का प्रमुख वक्ता माना जाता है। हांस मार्गेंथाउ के अनुसार अंतरराष्ट्रीय राजनीति की मुख्य कुंजी राष्ट्रहित है जिसे केवल सत्य के परिप्रेक्ष्य में देखा जा सकता है। मार्गेंथाउ शब्दों में अंतरराष्ट्रीय राजपुरोहित प्रत्येक राज्यों की भांति सत्य संघर्ष है। अंतरराष्ट्रीय राजनीति का अंतिम लक्ष्य चाहे कुछ भी हो शक्ति सदैव तत्कालिक उद्देश्य रखती हैं। 

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