महिला आंदोलन ( Women's Movement )
संसार के अधिकांश समाज पुरुष प्रधान होने के कारण समय-समय पर महिलाओं ने अपने शोषण उत्पीड़न और संत्रास के खिलाफ आवाज उठाई है। समानाधिकार आर्थिक स्वतंत्रता और धार्मिक व सांस्कृतिक स्वतंत्रता, तलाक के अधिकार मताधिकार की स्वतंत्रता, पर्दे का विरोध शिक्षा के अधिकार आदि मांगों को लेकर कई आंदोलन चलाएं हैं।इस सदी के सातवें दशक में प्रारंभ हुआ विमन लीव का आंदोलन विश्व प्रसिद्ध महिला आंदोलनों माना जाता है। महिला आंदोलन सदैव ही केवल महिलाओं द्वारा ही किए जाएं यह आवश्यक नहीं होता क्योंकि भारत में ऐसे अनेक आंदोलन हुए जो बोलता है स्त्रियों के अधिकार से संबंधित थे परंतु उन आंदोलनों के जनक पुरुष से ही रहे हैं।
इसे भी देखें - अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस (international women's Day)
19वीं शताब्दी के प्रारंभ से ही कुछ चिंतनशील व्यक्तियों जैसे राजा राममोहन राय ईश्वर चंद्र विद्यासागर दयानंद सरस्वती केशव चंद्र सेन एनी बेसेंट महर्षी करवे आदि ने भारतीय समाज में स्त्रियों की दयनीय स्थिति पर विचार करना प्रारंभ कर दिया था।कई महापुरुषों ने समाज सुधार के आंदोलन का संचालन कर स्त्रियों की स्थिति को ऊंचा उठाने का प्रयत्न किया। राजा राममोहन राय ने 1929 में ब्रह्म समाज की स्थापना की और उनके ही प्रेत से 1929 में सती प्रथा निरोधक अधिनियम बना। राजा राममोहन ने ही बाल विवाह को समाप्त किया तथा विधवा पुनर्विवाह को प्रचलित कराने के पक्ष में जनमत तैयार किया। स्वामी दयानंद सरस्वती ने स्त्री शिक्षा को प्रोत्साहित करने तथा बाल विवाह और पर्दा प्रथा को समाप्त करने के लिए प्रयास किए।ईश्वर चंद्र विद्यासागर ने बहु पत्नी विवाह एवं विधवा पुनर्विवाह निषेध का विरोध किया और उनके ही प्रयत्नों से 1856 में विधवा पुनर्विवाह अधिनियम बना। महर्षी करवे ने भी विधवा पुनर्विवाह एवं स्त्री शिक्षा के लिए प्रयास किए।केशव चंद्र सेन के प्रयासों से 1872 में विशेष विवाह अधिनियम बना जिसने विधवा पुनर्विवाह एवं अंतर जाति विवाह को मान्यता प्रदान की।इस शताब्दी में कई महिलाओं एवं स्त्री संगठनों ने स्त्रियों को अधिकार दिलाने एवं उनमें जागृति लाने के प्रयत्न किए। रमाबाई रानाडे मैडम कामा तारो दत्त मार्गरेट नोबल तथा एनी बेसेंट आदि महिलाओं तथा अखिल भारतीय महिला सम्मेलन भारतीय महिला समिति विश्वविद्यालय महिला संघ अखिल भारतीय स्त्री शिक्षा संस्था कस्तूरबा गांधी स्मारक ट्रस्ट आदि स्त्री संगठनों ने भी स्त्रियों की निर्योग्यता ओं को कम करने एवं उनकी स्थिति को सुधारने के प्रयत्न किए।महात्मा गांधी स्त्री पुरुषों की समानता के समर्थक थे उन्होंने स्त्रियों को राष्ट्रीय आंदोलन में भाग लेने के लिए प्रेरित किया।
इन आंदोलनों के कारण समय-समय पर अनेक ऐसे अधिनियम पारित किए गए जिन्होंने स्त्रियों की दशा को सुधारने में योगदान दिया।1955 के हिंदू विवाह अधिनियम में स्त्री पुरुष को विवाह के संबंध में समान अधिकार दिए गए।बाल विवाह समाप्त कर दिए गए और स्त्रियों को पृथक्करण तथा विवाह विच्छेद एवं में विधवाओं को पुनर्विवाह की स्वीकृति दी गई।1956 के हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम स्त्रियों एवं कन्याओं का अनैतिक व्यापार निरोधक अधिनियम दहेज निरोधक अधिनियम 1961 आदमियों को सुधारने की दृष्टि से महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
महिलाओं को संगठित करने के प्रयास तथा उसे संगठन के माध्यम से अधिकारों की लड़ाई का साहस दिखा सकने का प्रारंभ अहिल्याबाई लक्ष्मीबाई आदि से शुरू होता है।स्वतंत्रता से पूर्व भारत में पहला आंदोलन कर्नाटक की पंडिता रमाबाई ने 18 सो 70 में शुरू किया था और महिलाओं की धार्मिक शुद्धता एवं अन्य अस्पृश्य मान्यताओं के खिलाफ आवाज उठाई। 1932 में दक्षिण भारत के कोलार क्षेत्र में येलम्मा नामक महिला ने हजारों ग्रामीण महिलाओं को एकत्रित करके धार्मिक निषेध हो तथा सामाजिक शोषण के विरुद्ध आवाज उठाई। नागरिक अधिकारों के प्रति भी महिलाओं ने सर्जक होकर आंदोलन किए हैं। फ्रांस में महिलाओं ने बच्चे के आगे मां का नाम लिखे जाने का एक लंबा अभियान चलाया। भारत पाकिस्तान तथा बांग्लादेश में महंगाई के खिलाफ प्रदर्शन स्थान दोलन करने वालों मैं महिलाएं ही आगे आई हैं।1975 का प्रसिद्ध महंगाई विरोधी आंदोलन जो मुंबई की सड़कों पर कई दिनों तक चला था उसमें महिलाएं बेलन थाने चिंता लेकर लंबे समय तक आंदोलन करती रही।गांधीजी के निर्देशों तथा संरक्षण में भारतीय महिलाओं ने मद्यपान निषेध के आंदोलन चलाएं आशिक सफलता भी मिली। असम में भी प्रांतीय स्तर पर शराबबंदी आंदोलन को केवल महिलाओं के बल पर आंशिक सफलता मिली। अभी वर्तमान नागरिकता संशोधन अधिनियम 2019 के विरोध में महिलाएं शाहीन बाग में लगातार दो महीनों से आंदोलन अनशन पर बैठे हुई है।महिलाओं के ही प्रयासों से बिहार में वर्तमान में शराबबंदी है।
1857 में रानी लक्ष्मीबाई ने अपनी सहेलियों के साथ मिलकर पहली बार जो नारी सेना गठित की थी स्वतंत्रता आंदोलन में उसे महिला आंदोलन का पहला प्रमाणिक स्वरुप माना जा सकता है।1884 में रमाबाई रानाडे ने भी पहली बार हिंदुस्तानी महिलाओं की आर्थिक स्वतंत्रता के लिए उन्हें नर्स की ट्रेनिंग देने के लिए अशिक्षित तथा विधवा महिलाओं का एक संगठन खड़ा किया।तमाम विरोध के बावजूद उन्होंने अपने प्रति महादेव गोविंद रानाडे के साथ मिलकर या लंबी लड़ाई लड़ी और महाराष्ट्र में पूना सेवा सदन की स्थापना करके महिला आंदोलन की नींव मजबूत की। 1917 में श्रीमती एनी बेसेंट के नेतृत्व में महिलाओं ने होमरूल के विरुद्ध आंदोलन चलाया और संस्थाओं में प्रतिनिधित्व तथा चुनाव के लिए समान अधिकारों की मांग की।
वर्ष 1990 में सरला देवी चौधुरानी ने राष्ट्रीय स्तर पर भारतीय स्त्री महामंडल नामक महिलाओं का प्रथम संगठन खड़ा किय। 1917 में मद्रास की महिलाओं ने महिलाओं का भारतीय संघ बनाया। 1925 में भारतीय महिलाओं के हितों की रक्षा के लिए अखिल भारतीय स्तर पर भारतीय महिलाओं की राष्ट्रीय समिति तथा 1926 में अखिल भारतीय महिला सम्मेलन का गठन किया गया।
भारत में महिला आंदोलन का नेतृत्व करने में सरोज नलिनी दत्त तथा सरोजनी नायडू दोनों प्रमुख नारियां हैं।सरोज नलिनी दत्त ने अनेक महिला समितियां गठित की जिनमें दस्तकारी प्रसूति विद्या शिशु पालन एवं गृह विज्ञान की शिक्षा की व्यवस्था की गई। सरोजिनी नायडू जिसे भारत की बुलबुल कहा जाता था उन्होंने सार्वजनिक मंचों से भाषणों द्वारा महिलाओं को आगे बढ़ने की प्रेरणा दी। वे 1925 में राष्ट्रीय कांग्रेस की प्रथम महिला अध्यक्ष चुनी गई। 1930 में वे अखिल भारतीय महिला सम्मेलन की अध्यक्ष भी चुने गई।उनके निर्देशन में महिला आंदोलन राजनीतिक व सामाजिक क्षेत्र में सक्रिय बना।
आधुनिक युग में नारी ने पुरुषों के समकक्ष स्थान एवं अधिकार पाने के लिए कई स्त्री आंदोलनों एवं संगठनों को जन्म दिया है।दुनिया के दूसरे देशों में स्त्री स्वतंत्र आंदोलन चले और स्त्रियों को अपने अधिकार पाने के लिए लंबा संघर्ष करना पड़ा।भारतीय समाज भी एक पुरुष प्रधान एवं पितृसत्तात्मक परिवार व्यवस्था को मानने वाला समाज है जिसमें स्त्रियों का कार्यक्षेत्र घर की चारदीवारी तक ही सीमित रहा है।आर्थिक रूप से वे सदैव पुरुषों पर निर्भर रहेगी तथा उन्हें शिक्षा एवं वाहे जगत से भी दूर रखा गया है किंतु पिछले कुछ वर्षों से भारत में कई महिला संगठन बने हैं प्रमुख रूप से नगरों में। इन संगठनों ने कई मुद्दे उठाए हैं तथा उन को लेकर आंदोलन एवं प्रदर्शन भी किए हैं इन मुद्दों में से प्रमुख हैं बढ़ती हुई महंगाई पुरुषों के समान स्त्रियों को अधिकार देने तथा दहेज के कारण महिलाओं को जला देना यह प्रताड़ित करना बलात्कार शोषण हत्या स्त्रियों के साथ मानवीय व्यवहार एवं उन्हें बेइज्जत करना आदि।इन मांगों के समर्थन में प्रदर्शनों संगठनों एवं कार्यक्रमों में भाग लेने वाली अधिकांश महिलाएं मध्यवर्गीय ही है। इनमें से कई कामकाजी महिलाएं भी हैं।महिलाओं ने बाहर ही नहीं परिवार में भी समानता एवं अपने अधिकारों की मांग की है।शिक्षित एवं स्वयं अर्जुन करने वाली महिलाएं अब पहले की अपेक्षा अधिक स्वतंत्र हैं वह क्लबों में जाने लगी है तथा विवाह शादी के चयन में अपना पसंद है या नापसंद को अधिक महत्व देती है पहले की तरह इन पर कोई भी व्यक्ति जीवन साथी के रूप में थोपा नहीं जाता। परिवारिक निर्णयों में उनकी सलाह दी जाती है।इस प्रकार अब महिलाएं धीरे-धीरे सास-ससुर एवं परिवार की दासता से मुक्त हो रही है।यद्यपि अब भी कई बार स्त्री अपने कमाई सास ससुर के हाथों में ही देती है।
राजनेताओं सामाजिक कार्यकर्ताओं एवं महिला संगठनों ने नारी चेतना पैदा करने एवं उन्हें अपने अधिकारों से अवगत कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इसी के परिणाम स्वरूप सन 1975 को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस घोषित किया गया।सन 1971 में भारत सरकार ने स्त्रियों की स्थिति के बारे में एक समिति गठित की जिसमें ने 1974 में स्त्रियों की उन्नति के बारे में कई महत्वपूर्ण सुझाव दिए जिनका सर्वत्र स्वागत किया गया। स्त्रियों की समस्याओं एवं उनके समाधान हेतु एक अखिल भारतीय संगठन भी है।अनेक राज्यों में महिला विकास निगम कब स्थापित किए गए हैं जो महिलाओं को तकनीकी परामर्श देने तथा बैंक तथा अन्य संस्थाओं से ऋण दिलाने एवं बाजार की सुविधा दिलाने का प्रयत्न करते हैं।भारत में महिला उद्यमिता में भी प्रगति हुई है और आज अनेक महिलाएं अपने स्वयं के कारखाने एवं उद्योग चला रही है।आज अनेक महिलाएं सरकारी एवं गैर सरकारी नौकरियों में कार्यरत हैं व प्रशासक राजनेता एवं उच्च राज्य की सेवाओं में पुरुषों के समकक्ष ही कार्य कर रही हैं।बड़े बड़े नगरों जैसे मुंबई पुणे दिल्ली आदमी चार उद्देश्यों को लेकर महिला आंदोलन चलाए गए। पहला स्त्रियों में जागरूकता पैदा करना उन्हें अपने राजनीतिक अधिकारों के प्रति संवेदनशील बनाना तथा परिवार में दमन और अश्लील साहित्य एवं पोस्टरों का विरोध करना दूसरा महिलाओं के जीवन स्तर और कारी दशाओं में परिवर्तन लाना वेतन वृद्धि प्रसूता ओं को अवकाश एवं चिकित्सा की सुविधा देना आज तीसरा अपने काम के लिए ग्रहणी ओं को सामाजिक स्टार्ट के साथ-साथ प्रतिफल प्रदान करना चौथा राजनीतिक दमन मकानों की समस्या तथा कीमतों की वृद्धि के विरुद्ध महिलाओं को संगठित करना किंतु यह सभी प्रश्न लग रही महिलाओं से ही संबंधित है ग्रामीण महिलाओं के संदर्भ में बहुत कम ही प्रयास हुए हैं।
महिला आंदोलनों का संगठन एवं संचालन प्रमुखता नारी सफेदपोश मध्यवर्गीय महिलाओं एवं कामकाजी महिलाओं द्वारा किया गया है। इनके द्वारा महिला पत्र पत्रिकाएं प्रकाशित की जाती है तथा महिला सभा एवं गोष्ठियों का आयोजन भी किया जाता है स्त्रियों से संबंधित अनेक अध्ययन भी हुए हैं जिनमें स्त्रियों की स्थिति, परिवार में उनकी भूमिका, शिक्षा, आर्थिक व कानूनी स्थिति एवं राजनीतिक भागीदारी, स्त्रियों की अधीनता के कारण, कार्य सहभागिता, आंदोलनों में भूमिका, पितृसत्तात्मक व्यवस्था में स्त्रियां आदि विषयों के बारे में जानकारी प्राप्त की गई है।













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