कोरोना संकट में कृषि



कोरोना आपदा के प्रभावो का आकलन यदि सामाजिक आर्थिक संदर्भों में करें तो यही प्रतीत हो रहा है कि चुनौतियां विभिन्न स्तरों पर हमारे धैर्य की जांच करेंगी। प्रधानमंत्री जी ने यूँ ही नहीं इसे सामाजिक आपात काल कहा है। अगर गौर से देखें तो समाज में संरचनात्मक स्तर पर बड़ी उथल पुथल होने जा रही है। अब लाकडाउन के 16 दिन बीत चुके हैं और स्थिति की गंभीरता को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि इसको आगे भी बढ़ाया जाना चाहिए। लेकिन यह तो सिर्फ बचाव का एक तात्कालिक पक्ष है। कहीं ऐसा तो नहीं कि इन प्रयासों के दौरान हम कुछ ऐसे अपने ही बनाये अनसुलझे ट्रैप में फस जाएं जिससे निकलने की लागत बहुत अधिक हो। आइये विचार करते हैं...।

वर्तमान में कोरोना आपदा के समय कृषि क्षेत्र के समक्ष उत्पन्न होने वाली चुनौतियां अत्यंत जटिल होने जा रहीं हैं। अर्थव्यवस्था में मांग पूर्ति संतुलन, खाद्य सुरक्षा और गरीबों की भूख मिटाने की इस लड़ाई में हमेशा ही कृषि की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण रही है। नेहरू जी ने आजादी के बाद अपने एक भाषण में कहा था, " बाकी सबकुछ इंतजार कर सकता है, कृषि नही।" किन्तु अभी लाकडाउन रबी सत्र के फसल कटाई में किसानों द्वारा किये जाने वाले इंतजार को बढ़ा रहा है। पहले ही कटाई लगभग 15 दिन पिछड़ चुकी है। जैसे जैसे तापमान बढेगा फसल पक कर खेतों में झड़ना शुरू हो जाएगी। ईश्वर न करे अगर कहीं बारिश या आंधी का प्रभाव उत्पन्न हुआ तो सब बर्बाद हो जाएगा। बड़ी मुश्किल से ये फसल तैयार हुई है, पहले होने वाली बारिश और ओला ने तो वैसे ही धैर्य की पर्याप्त परीक्षा ले ली है।
 इस कोरोना संकट के समय कृषि अनुसंधान निकाय ICAR द्वारा यह सुझाव दिया गया कि फसल कटाई के समय सोशल डिस्टेसिंग का ध्यान रखा जाए। इसी प्रकार सरकार द्वारा कृषि मशीनरी के प्रयोग, उर्वरकों, कीटनाशकों और बीजों के विनिर्माण और पैकेजिंग करने वाली इकाइयों को भी छूट दी गई है। इस प्रकार जहां कृषि यंत्रों और मशीनरियों के कस्टम हायरिंग केंद्रों को संचालित किया जा रहा है। वहीं  MSP, परिचालन, एपीएमसी द्वारा संचालित मंडियों, राज्य सरकार द्वारा अधिसूचित मंडियों सहित कृषि उत्पादों में लगी एजेंसियों को छूट दी गई है। लेकिन प्रश्न यह उठता है कि सरकार द्वारा लिए गए ये निर्णय संभावित चुनौतियों के लिए क्या पर्याप्त हैं। यदि हां तो किस स्तर तक और यदि नहीं तो और क्या किया जाना चाहिए। 
 जैसे भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ने 31 मार्च को जारी एक विज्ञप्ति में किसानों को राय दी है कि वे कटाई-मड़ाई का काम मशीनों के सहारे ही करें। अब आप कल्पना करें कि यदि आप देवरिया के किसी गांव में रहते है और आपने गेहूं की फसल लगा रखी है तो आपको पता है कि १५ अप्रैल के बाद जैसे २ गर्मी बढ़ेगी गेहूं के दाने पक्कर जमीन पर गिर जाएंगे और ना केवल उसकी मेहनत बर्बाद हो जाएगी बल्कि उसके पास कोई आय भी नहीं होगी जिससे वो बैंक का लोन चुका सके ; कुछ परिवार कि आवश्यकता पूरी कर सके और कुछ भविष्य के लिए बचत कर सके। चूँकि उसे पता है की गेहूं काटने वाली कंबाइन मशीन हरियाणा या पंजाब से आती है तो वो उनसे संपर्क करता है क्योंकि उसे पता है की मशीन से ना केवल जल्दी कटाई हो जाएगी बल्कि कम पैसे भी लगेंगे और खेत भी आगे धान की बुवाई के लिए जल्द तैयार हो जाएगा। वो सरकार को धन्यवाद करता है कि उसने किसानों की मदद के लिए कृषि यंत्रों की आवाजाही पर छूट दे रखी है।लेकिन जब वो हरियाणा बात करता है तो मशीन मालिक कहता है कि मशीन जा पानी मुश्किल है क्योंकि ड्राइवर और मशीन आपरेटर पीलीभीत या शाहजहांपुर के है जो लाकडाउन में हरियाणा मशीन लेने कैसे आ पाएंगे। दूसरा यदि वे आ भी गए तो हरियाणा से देवरिया १००० किलोमीटर से ज्यादा है और रास्ते में ढाबे बंद होंगे तो उनकी रोटी/भोजन की व्यवस्था कैसे होगी? मान लें यदि वे किसी तरह पहुंच भी गए तो दूसरे राज्य के होने के कारण कहीं सरकार 14 दिन के लिए कोरंटाइन में ना भेज दे।

इसके अलावा मशीन के जाने की छूट तो है लेकिन मशीन यदि खराब हुई तो बनेगी कहाँ, क्योंकि सारे वर्कशॉप तो बंद है। आपके बहुत गिड़गिड़ाने पर वो तीन गुना किराया मांगता है क्योंकि उसे पता है की आपके लिए मशीन का प्रबन्ध कर पाना असम्भव नहीं तो मुश्किल जरूर है। गुस्से में आप कहते है कि मै मजदूरों से कटवा लूंगा क्योंकि आपको पता है कि दिल्ली, मुम्बई से हजारों लोग आस पास के गांव में वापस आकर रुके है। किन्तु जब आप उनसे संपर्क करते है तो पता चलता है कि वो भी काम करने के लिए तैयार नहीं हैं क्योंकि  पहला वो भी अब कोरोना से डरे हुए है, दूसरा सरकार उन्हें नकद के अलावा कोटेदार से गेहूं और चावल के साथ गैस भी मुफ्त में दिलवा रही है और मनरेगा का काम भी है जो प्रधान जी के साथ सेटिंग में कुछ कमीशन पर तय हो गया है। आप थक हार कर दुगनी मजदूरी पर उन्हें खेत पर लाते है तो आपके पड़ोसी पुलिस को 112 नंबर पर फोन कर देते है जो उन्हें सोशल डिस्टेंसिंग के नियम सिखाते हैं और न मानने पर दंड मिलने का भय भी है। अब आप हताश हो चुके है क्योंकि समय तेजी से गुजर रहा है। आपका पड़ोसी आपसे बेहतर निकाला जिसने कटाई तो करवा ली लेकिन अब वो को फसल के अच्छे दाम के लिए परेशान है।  सामान्य सीजन में जब किसान मंडी पहुंचते हैं तो कई दिनों तक लाइन लगी रहती है, और जब इस सीजन में मजदूर ही नहीं होंगे तो काम तो पूरा रुक जायेगा। आने वाला समय किसानों के लिए ठीक नहीं है। लाकडाउन के कारण स्थानीय आढ़तियों/महाजनों को भी फसल बेच पाना संभव नही होगा।
इसी प्रकार छह-सात सौ रुपए कुंतल बिकने वाला भूसे का दाम कुछ स्थानों पर तो दो हजार रुपए तक पहुंच गया है। आजकल कुछ पशुपालक अपने पशुओं को सरसों और पुआल का भूसा खिला रहे हैं क्योंकि अभी उनके पास भूसा खत्म हो गया है और लॉकडाउन की वजह से भूसा भी नहीं मिल रहा है।अभी तक कुंतल के हिसाब से बिकने वाला भूसा मन (25 किलो) के हिसाब से बिकने लगा है।
लॉक डाउन के तुरंत बाद सबसे ज्यादा अगर किसी को नुकसान हुआ है तो वे हैं, सब्जी और फल उगाने वाले किसान। किसानों की सब्जियां और फल काफी समय तक मंडी नहीं पहुंच पायी और शहरों में लोगों को दोगुनी-तीन गुनी कीमतें पर इन्हें खरीदना पड़ा। । लाकडाउन का प्रभाव देश में फूल के किसानों पर भी पड़ा। इस समय मंदिर-मस्जिद, गुरुद्वारे और अन्य सभी प्रकार के आयोजन जैसे शादियां इत्यादि भी बंद हैं। जिसके चलते फूल उत्पादक किसानों को नुकसान हुआ। इसी प्रकार गेहूं और धान के बीच जो फसल सीजन होता है उसे जायद कहते हैं, जिसमें मूंग, उड़द (गर्मियों वाला) और कुछ सब्जियों की फसलें उगाई जाती हैं। मुख्यतः जायद और खरीफ की बुवाई भी संकट में है।
 आपने दिल्ली से निकली मजदूरों की वो भीड़ देखी थी, वो भीड़ अब खाली हाथ गांव पहुंच चुकी है। विश्व में मजदूरों के लिए काम करने वाली सबसे बड़ी संस्था इंटरनेशनल लेबर ऑर्गेनाइजेशन (आईएलओ) के मुताबिक नोवल कोरोना महामारी के चलते भारत में अंसगंठित क्षेत्र में काम करने वाले लगभग 40 करोड़ लोगों पर गरीबी में गिरने का खतरा मंडरा रहा है, जबकि 19 करोड़ से ज्यादा लोगों के नौकरी जाने की आशंका है। संयुक्त राष्ट्र के श्रम निकाय की इस चेतावनी से इतर सेंटर फॉर मॉनिटरिंग ऑफ इकोनॉमी की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक पिछले दो हफ्ते में 12 करोड़ लोग अपनी जॉब गंवा चुके हैं। 
 ऐसे मोटे-मोटे आंकड़ों वाली इन रिपोर्ट को सरल शब्दों में ऐसे समझिए कि मजदूर और कामगार कोरोना संकट से पहले जब गांव लौटते थे तो उनके पास पैसे होते थे, इस बार वो खाली हाथ हैं क्योंकि जिन कंपनियों, ठेकेदारों के यहां काम करते थे ज्यादातर ने पैसे नहीं दिए। वो अब बेरोजगार हैं और सरकारी सहायता तथा गांव में मजदूरी ही अब उनका सहारा है। दूसरी वजह गांवों में चिंता इस बात की भी है कि  शहरों में संगठित क्षेत्रों में काम करने वाले लोगों की नौकरियां गई हैं। उनमे से करोड़ों ऐसे हैं जो शहर में कमाते थे, पैसे भेजते थे, जिसके बाद उनके गांव में रहने वाले परिवार पलते थे, वो भी अब संशय में है।
कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि अब ये हम भारतीयों के साहस, धैर्य और एक होकर चलने की हमारी क्षमता की बड़ी परीक्षा है। जिसमे फेल होने का विकल्प नहीं है। इसीलिए कह रहा हूँ कि आंखे खुली रखिये और तैयार रहिये क्योंकि अब आगे जो भी होगा वह किसी भी तरह से भारत के इतिहास में अभी तक के सबसे बड़े युद्ध से कम नही होगा। इसमें सिर्फ श्रम या सिर्फ रणनीति काम नही करेगी बल्कि आपके पास जो भी कुछ है.....सब झोंकना होगा....तभी इस दुष्चक्र से हम निकल पाएंगे

विनोद राजवंशी

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