डॉ शिवम मिश्रा ने लगाई फांसी स्टाफ नर्स ने दर्ज करवाया था एससी एसटी एक्ट के तहत मुकदमा

भारत जागरण: मध्य प्रदेश के सीधी जिले के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में डॉक्टर शिवम मिश्रा एससी एसटी एक्ट के तहत स्टाफ नर्स ने कुछ दिन पहले मुकदमा दर्ज कराया था।


अक्सर बहुत से सवर्ण मित्र और सहकर्मी इस बात पर व्यथित रहते हैं कि उनके मुद्दे यथा- SC ST एक्ट, आरक्षण, राजनीतिक दुराग्रह आदि संसद और विधानसभा पटल में, मेनस्ट्रीम मीडिया में जगह नहीं पाते हैं। सवर्णों के बीच के राजनीतिक प्रतिनिधि, बड़े पदों पर स्थापित अधिकारी, मीडिया हाउस में काम कर रहे पत्रकार भी इन मुद्दों को उठाते में कतराते हैं। टि्वटर में भी इन सब के खिलाफ “ब्लूटिकधारी” सवर्ण हितों के ट्रेंड में भाग नहीं लेते। पिछले कई महीनों में सवर्णों ने ट्विटरट्रेंड के माध्यम से अपने मुद्दे उठाए हैं, अपने विरोधियों को धूलधूसरित किया है और उनके षड्यंत्र को उजागर किया है। मैंने इन प्रयासों को बहुत करीब से देखा है। ये सभी प्रयास किसी नेतृत्व के अधीन न होकर, अपने अपने व्यक्तिगत प्रयास या सही शब्दों में कहें तो अपनी मज़बूरियां और दास्तान-ए-दर्द की आवाज थे। यदि कोई संस्थागत प्लेटफॉर्म या नेतृत्व इनको मिलता तो उसका एक अलग ही महत्व होता, बेहतर इंपैक्ट होता।
आज मैं अपनी ओर से एक छोटी सी रणनीति सुझाना चाहूंगा, एक नया दृष्टिकोण देता हूँ और उसके पीछे निहित तर्क भी दूंगा।
लाखों लोग सवर्णों के विरुद्ध हो रहे अन्यायों के ख़िलाफ़ काफी समय से लड़ रहे होंगे, तमाम सफलता की खुशियों और असफलता की मायूसियों से गुज़र रहे होंगे। मुझे लगता है कि आरक्षण, SC ST एक्ट और जातिगत भेदभाव के खिलाफ तो सभी प्रगतिशील लोगों को आवाज उठाते ही रहना है, लेकिन जिस चीज की मांग सबसे प्रबल की जाए वह है “सवर्ण आयोग की स्थापना” ऐसा मेरा मत क्यों है इसके पीछे मैं तर्क देना चाहूंगा-
  • 1. यदि आप एससी एसटी एक्ट और आरक्षण को हटाने की मांग करेंगे तो संख्या बल और वोट बैंक दूसरी तरफ का भारी है, सरकार आपकी नहीं सुनेगी। उसे हटाना तो दूर उसमें जरूरी संशोधन भी कोई करने को तैयार नहीं होगा।
  • 2. मीडिया हाउस भी SC ST के खिलाफ सच लिखने की हिम्मत नहीं कर पाते। जबतक समाचार पत्र और मेनस्ट्रीम मीडिया दोनों में विस्तृत माहौल नहीं बनेगा ये दोनों न हट पाएंगे न संशोधित होंगे।
  • 3. सरकार भी एनकेन-प्रकारेण सुप्रीम कोर्ट जैसी बड़ी संस्था से निर्णय बदलवा देती है, एससी एसटी एक्ट और रोस्टर मामले में आपने देखा है और अगर सुप्रीम कोर्ट के न्यायपूर्ण निर्णय सवर्णों के पक्ष में भी हों, तो भी सरकार अध्यादेश से उन्हें पलट देती है।
  • 4. संवैधानिक सवर्ण आयोग की मांग का विरोध करना किसी भी पार्टी, किसी भी दल और किसी भी जाति के लिए बहुत आसान नहीं होगा, क्योंकि इससे उनका कोई नुकसान नहीं होने वाला। यद्यपि वो विरोध करेंगे पर विरोध का कोई ठोस आधार नहीं होगा।
  • अब समझिए कि सवर्ण आयोग के बनने से क्या फायदे होंगे-
  • 1. पहला सवर्णों की बात को रखने के लिए एक संवैधानिक प्लेटफार्म और आधार बन जाए। ये जो आप सवर्णों की हत्याओं; दबंगों, पुलिस द्वारा उनको प्रताड़ित करने; भूख, फ़र्ज़ी एक्ट से आत्महत्या करने के मुद्दे यहां-वहां उठाते हैं, तब आपके पास एक आयोग होगा- इन सब बातों को सुनने के लिए।
  • 2. सवर्ण आयोग, सवर्णों के खिलाफ हो रही हिंसा, घृणा और ज्यादतियों पर स्वतः संज्ञान भी ले सकेगा। जिलाधिकारी और SP/SSP को इस बात का डर रहेगा कि संवैधानिक आयोग उनको नोटिस जारी कर सकता है।
  • 3.बहुत से सवर्ण सांसद, विधायक सवर्ण मुद्दों को संसद, विधानसभा में ‘पार्टी-लाइन’ से हटकर नहीं उठा पाते। सवर्ण आयोग की रिपोर्ट संसद पटल में रखे जाने पर निश्चित तौर पर उसमें पक्ष-विपक्ष दोनों की तरफ से वाद-विवाद होगा, डिस्कशन होगा और मुद्दे उठाए जाएंगे। आप जानते हैं कि विपक्ष का काम सरकार की निंदा करना और बखिया उधेड़ना होता है, विपक्ष में कोई भी पार्टी हो और उसे बस कोई भी मौका मिले।
    सवर्ण आयोग की रिपोर्ट विपक्ष को एक हथियार देगी सरकार के खिलाफ मुद्दे उठाने का, सरकार को घेरने का और उनकी इस राजनीतिक खींचतान का सही फायदा सवर्णों को मिलेगा। जैसे आजकल छोटी सी छोटी ‘दलित घटना’ को विपक्ष और मीडिया सरकार को घेरने के हथियार की तरह प्रयोग करते हैं। कल आप के खिलाफ हो रही छोटी सी हिंसा भी राष्ट्रीय पटल पर एक बड़ा मुद्दा बनेगी।
  • 4. धीरे-धीरे सवर्णों के हितों से जुड़े मामले मीडिया में आएंगे, दंगल होगा, डिबेट्स होंगी, तब फिर अपने जनप्रतिनिधियों से आप यह आशा कर सकते हैं कि वह संसद के बाहर भी इन मुद्दों पर थोड़ी ही सही, पर बात करना शुरू करेंगे।
  • 5. आज सवर्ण मुद्दों पर बात करना दलित विरोध समझा जाता है। कल यदि सवर्ण आयोग होगा, तो सवर्ण मुद्दों को उठाना एक संवैधानिक कृत्य होगा।
  • 6. सवर्ण आयोग निश्चित तौर पर सवर्णों के हितों को संरक्षित करने वाला और उनकी बेहतरी के लिए काम करने वाला एक संस्थागत तरीका होगा।
    इन सभी तथ्यों और कारणों से यह स्पष्ट है कि सवर्णों द्वारा अपनी स्थिति, संख्याबल अपना राजनीतिक वजूद-वजन देखते हुए सवर्ण आयोग की मांग किया जाना सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है। सवर्ण आयोग की स्थापना उस नींव की तरह होगी जिस पर हम सवर्णों के लिए समान अवसरों, समान व्यवहार के भविष्य की इमारत खड़ी कर सकेंगे।
    इसलिए उठिए, लड़िये और सवर्ण आयोग की मांग करिये…
    ….
    सौभाग्य न सब दिन सोता है
    देखो आगे क्या होता है।

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