भारतीय राष्ट्रवाद और देशभक्ति के पर्याय कहे जाने वाले महान क्रांतिकारी और प्रखर राष्ट्रवादी विचारक एवं लेखक वीर सावरकर की जयंती पर शत शत नमन
जागरण: भारतीय राष्ट्रवाद और देशभक्ति का पर्याय कहे जाने वाले वीर सावरकर जिनके नाम के स्मरण मात्र से अनुपम त्याग अदम्य साहस महान वीरता और उत्कृष्ट देशभक्ति से ओतप्रोत इतिहास के स्वर्णिम पृष्ठ हमारे सामने साकार होकर खुल जाते हैं । ऐसे महान क्रांतिकारी और प्रखर राष्ट्रवादी विचारक को उनकी जयंती पर शत शत नमन करते हुए उनके विचारों की गंगा अंता शुद्धिकरण के उद्देश्य से मानसिक स्नान करते हुए उन्हें और उनके विचारों को जानने और समझने का प्रयास करते हैं भारत के प्रति उनका कैसा लगा था उनकी क्या भूमिका रही है स्वतंत्रता संग्राम में तथा विचारों की क्रांति में। हमारे वर्तमान भारत में कुछ लोग ऐसे भी हैं जिनका वास्तव में राजनीति से कोई लेना-देना नहीं लेकिन विरासत में राजनीतिक मिली है जो ना तो राजनीति का अर्थ समझते हैं ना विचारों के महत्त्व बारे में जानते है बल्कि आए दिन राजनीति का भी बेड़ा गर्क करते रहते हैं और वीर सावरकर जैसे महान क्रांतिकारी और विचार को का यह कहकर अपमान करते रहते हैं कि हम सावरकर नहीं हम खानदानी गांधी है।
वीर सावरकर बचपन से ही राष्ट्रभक्त राष्ट्रभक्ति की अभिव्यक्ति अपनी कविताओं और लेखों के माध्यम से करते रहे उनकी प्रमुख रचनाओं में 1857 का स्वतंत्र समर हिंदुत्व हिंदू पद शाही प्रतिशोध मोपला शस्त्र और शास्त्र काला पानी हिंदुत्व के पंच प्राण क्रांतिकारी चिट्ठियां आदि प्रमुख है।
जो भी लंदन विश्वविद्यालय में कानून के विद्यार्थी की तो अपना अधिकतर समय ब्रिटिश लाइब्रेरी में बैठकर विभिन्न देशों की राजनीतिक स्थिति के अध्ययन करने में लगाने लगे। इटली के क्रांतिवीर मैजिनी के जीवन से वह बहुत प्रभावित हुए और उन्होंने भेजनी का जीवन चरित्र दिखाओ सन 1996 उन्होंने विभिन्न ग्रंथों का भारी अध्ययन करने के पश्चात सिखों का सपोर्ट विधायक इतिहास नामक ऐतिहासिक ग्रंथ लिखा।
सावरकर को आमतौर पर कट्टर हिंदू विचारक लेखक और समर्थक के तौर पर उन लोगों द्वारा जाना जाता है वास्तव में जो उनके संदर्भ में केवल उनके नाम के अतिरिक्त शायद कुछ और जानते हो और इसका केवल और केवल एक मात्र कारण यह है कि उन्होंने हिंदुत्व के सिद्धांत को प्रतिपादित किया था लेकिन इस सिद्धांत को लेकर उनके प्रति जिन व्यक्तियों में सावरकर जी की कट्टर हिंदू विचारक लेखक और समर्थक की छवि बनती है वास्तव में वे सावरकर के नाम के अतिरिक्त सावरकर के संदर्भ में कुछ भी नहीं जानते क्योंकि यदि वे लोग उनके संदर्भ में पूर्णरूपेण जानकारी को धारण करने वाले होते तो उनके मन मस्तिष्क में सावरकर के प्रति इस तरह के वैचारिक कट्टरवादी छवि ना आती।
हम आपको बता देना चाहते हैं की वीर सावरकर ने अपने राजनीतिक दर्शन में हिंदुत्व के सिद्धांत का प्रतिपादन अवश्य किया है लेकिन ऐसा नहीं है कि वह मुसलमानों से खड़ा ईर्ष्या और द्वेष रखते थे बल्कि उन्होंने अपने इस सिद्धांत ने हिंदू मुस्लिम एकता के संदर्भ में भी अपने प्रेम को व्यक्त किया है। उन्होंने सदा ही हिंदू मुस्लिम एकता का समर्थन किया था और उन्होंने इस्लाम या मुसलमानों के प्रति कभी भी भेद भाव नहीं रखा लेकिन एकता के नाम पर वे तुष्टीकरण की नीति के विरोधी थे वे सदा ही इस बात पर डटे रहे कि यदि स्वतंत्रता संग्राम मुसलमान साथ देते हैं तो उनके साथ मिलकर और यदि नहीं देते हैं तो उनका मुकाबला करके भी हिंदू लोग अपनी राशि स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करके स्वतंत्रता को प्राप्त करेंगे।
सावरकर ने अपने हिंदुत्व के सिद्धांत में इस बात पर भी विचार किया है यह हिंदू कौन है इस संदर्भ में उन्होंने कहा कि हिंदू शब्द सिंधु नदी से निकला है अर्थात सावरकर के अनुसार विश्व हिंदू जो सिंधु नदी से लेकर सिंधु तक फैली हुई भूमि के निवासी है। सावरकर आजीवन अखंड भारत के समर्थन में और पाकिस्तान की निर्माण योजना का उन्होंने खुलकर विरोध किया और विभाजन हो जाने के बाद भी अखंड भारत के लिए अपनी लड़ाई को जारी रखा।
वीर सावरकर क्रांतिकारी थे और उनका गांधीवादी अहिंसा में विश्वास नहीं था। जहां यह राजनीति का हिंदू करण करना चाहते थे वहां हिंदू का सैनिकीकरण करने पर भी जोर दीजिए गोवा के मुक्ति संग्राम के समय उन्होंने कहा गोवा की मुक्ति का काम सरकार को सेना को सौंप देनी चाहिए, सत्याग्रह के स्थान पर शस्त्र आग्रह से ही सफलता मिलेगी।
अक्टूबर 1962 में चीनी आक्रमण के समय उन्होंने भारत की पराजय को देखकर ह्रदय से कहा था काश,अहिंसा, पंचशील, विश्व शांति एवमें फंसे इन शासन अधिकारियों ने मेरे सुझावों को मान कर सबसे पहले राष्ट्र का समीकरण समीकरण कर देते तो आज हमारी वीर व पराक्रमी सेना चीनियों को पीकिंग तक खदेड़ कर उनका मद चूर चूर कर डालती हिंदू अहिंसा और शांति की काल्पनिक उड़ान भरने वाले महापुरुष ने ना जाने कब तक देश के सम्मान को अहिंसा की कसौटी पर कसकर परीक्षण करते रहेंगे?
उन्होंने कांग्रेसी नेताओं के अणु बम कदापि ना बनाएंगे की घोषणा को मूर्खतापूर्ण और आत्मघाती बताते हुए कहा भारत के शासन अधिकारियों को यह अच्छी प्रकार से समझ लेना चाहिए कि आज के युग में जिसकी सेना उसका राज सुरक्षित है का सिद्धांत ही व्यवहारिक है यदि हमारे शत्रु चीन के पास अनुभव है हाइड्रोजन बम है तो हमें उसके मुकाबले के लिए उससे भी अधिक शक्तिशाली बमों के निर्माण के लिए प्रयत्नशील रहना चाहिए।
सावरकर के सपनों का भारत आदर्श राज्य-। सावरकर ने भारतीय राज्य के आदर्श रूप का चित्रण करते हुए इन विशेष बातों पर जोर दिया
वीर सावरकर बचपन से ही राष्ट्रभक्त राष्ट्रभक्ति की अभिव्यक्ति अपनी कविताओं और लेखों के माध्यम से करते रहे उनकी प्रमुख रचनाओं में 1857 का स्वतंत्र समर हिंदुत्व हिंदू पद शाही प्रतिशोध मोपला शस्त्र और शास्त्र काला पानी हिंदुत्व के पंच प्राण क्रांतिकारी चिट्ठियां आदि प्रमुख है।
जो भी लंदन विश्वविद्यालय में कानून के विद्यार्थी की तो अपना अधिकतर समय ब्रिटिश लाइब्रेरी में बैठकर विभिन्न देशों की राजनीतिक स्थिति के अध्ययन करने में लगाने लगे। इटली के क्रांतिवीर मैजिनी के जीवन से वह बहुत प्रभावित हुए और उन्होंने भेजनी का जीवन चरित्र दिखाओ सन 1996 उन्होंने विभिन्न ग्रंथों का भारी अध्ययन करने के पश्चात सिखों का सपोर्ट विधायक इतिहास नामक ऐतिहासिक ग्रंथ लिखा।
सावरकर को आमतौर पर कट्टर हिंदू विचारक लेखक और समर्थक के तौर पर उन लोगों द्वारा जाना जाता है वास्तव में जो उनके संदर्भ में केवल उनके नाम के अतिरिक्त शायद कुछ और जानते हो और इसका केवल और केवल एक मात्र कारण यह है कि उन्होंने हिंदुत्व के सिद्धांत को प्रतिपादित किया था लेकिन इस सिद्धांत को लेकर उनके प्रति जिन व्यक्तियों में सावरकर जी की कट्टर हिंदू विचारक लेखक और समर्थक की छवि बनती है वास्तव में वे सावरकर के नाम के अतिरिक्त सावरकर के संदर्भ में कुछ भी नहीं जानते क्योंकि यदि वे लोग उनके संदर्भ में पूर्णरूपेण जानकारी को धारण करने वाले होते तो उनके मन मस्तिष्क में सावरकर के प्रति इस तरह के वैचारिक कट्टरवादी छवि ना आती।
हम आपको बता देना चाहते हैं की वीर सावरकर ने अपने राजनीतिक दर्शन में हिंदुत्व के सिद्धांत का प्रतिपादन अवश्य किया है लेकिन ऐसा नहीं है कि वह मुसलमानों से खड़ा ईर्ष्या और द्वेष रखते थे बल्कि उन्होंने अपने इस सिद्धांत ने हिंदू मुस्लिम एकता के संदर्भ में भी अपने प्रेम को व्यक्त किया है। उन्होंने सदा ही हिंदू मुस्लिम एकता का समर्थन किया था और उन्होंने इस्लाम या मुसलमानों के प्रति कभी भी भेद भाव नहीं रखा लेकिन एकता के नाम पर वे तुष्टीकरण की नीति के विरोधी थे वे सदा ही इस बात पर डटे रहे कि यदि स्वतंत्रता संग्राम मुसलमान साथ देते हैं तो उनके साथ मिलकर और यदि नहीं देते हैं तो उनका मुकाबला करके भी हिंदू लोग अपनी राशि स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करके स्वतंत्रता को प्राप्त करेंगे।
सावरकर ने अपने हिंदुत्व के सिद्धांत में इस बात पर भी विचार किया है यह हिंदू कौन है इस संदर्भ में उन्होंने कहा कि हिंदू शब्द सिंधु नदी से निकला है अर्थात सावरकर के अनुसार विश्व हिंदू जो सिंधु नदी से लेकर सिंधु तक फैली हुई भूमि के निवासी है। सावरकर आजीवन अखंड भारत के समर्थन में और पाकिस्तान की निर्माण योजना का उन्होंने खुलकर विरोध किया और विभाजन हो जाने के बाद भी अखंड भारत के लिए अपनी लड़ाई को जारी रखा।
वीर सावरकर क्रांतिकारी थे और उनका गांधीवादी अहिंसा में विश्वास नहीं था। जहां यह राजनीति का हिंदू करण करना चाहते थे वहां हिंदू का सैनिकीकरण करने पर भी जोर दीजिए गोवा के मुक्ति संग्राम के समय उन्होंने कहा गोवा की मुक्ति का काम सरकार को सेना को सौंप देनी चाहिए, सत्याग्रह के स्थान पर शस्त्र आग्रह से ही सफलता मिलेगी।
अक्टूबर 1962 में चीनी आक्रमण के समय उन्होंने भारत की पराजय को देखकर ह्रदय से कहा था काश,अहिंसा, पंचशील, विश्व शांति एवमें फंसे इन शासन अधिकारियों ने मेरे सुझावों को मान कर सबसे पहले राष्ट्र का समीकरण समीकरण कर देते तो आज हमारी वीर व पराक्रमी सेना चीनियों को पीकिंग तक खदेड़ कर उनका मद चूर चूर कर डालती हिंदू अहिंसा और शांति की काल्पनिक उड़ान भरने वाले महापुरुष ने ना जाने कब तक देश के सम्मान को अहिंसा की कसौटी पर कसकर परीक्षण करते रहेंगे?
उन्होंने कांग्रेसी नेताओं के अणु बम कदापि ना बनाएंगे की घोषणा को मूर्खतापूर्ण और आत्मघाती बताते हुए कहा भारत के शासन अधिकारियों को यह अच्छी प्रकार से समझ लेना चाहिए कि आज के युग में जिसकी सेना उसका राज सुरक्षित है का सिद्धांत ही व्यवहारिक है यदि हमारे शत्रु चीन के पास अनुभव है हाइड्रोजन बम है तो हमें उसके मुकाबले के लिए उससे भी अधिक शक्तिशाली बमों के निर्माण के लिए प्रयत्नशील रहना चाहिए।
सावरकर के सपनों का भारत आदर्श राज्य-। सावरकर ने भारतीय राज्य के आदर्श रूप का चित्रण करते हुए इन विशेष बातों पर जोर दिया
- सावरकर के भारत में जाति धर्म नस्ल अथवा विश्वास के भेदभाव के बिना उन सभी नागरिकों को समान अधिकार एवं कर्तव्य होंगे जो भारत के प्रति पूर्णता राज भक्त होंगे।
- सभी अल्पसंख्यकों को उनकी भाषा धर्म संस्कृति आज की सुरक्षा का अधिकार दिया जाएगा किंतु किसी को भी एक राज्य के अंतर्गत नवीन राज्य का निर्माण करने अथवा बहुजन के वैधानिक अधिकारों का हनन करने का अधिकार नहीं दिया जाएगा।
- भाषण विश्वास अर्चना संगठन आज की स्वतंत्रता से संबंधित मौलिक अधिकार सभी नागरिकों को समान रूप से प्राप्त होंगे।
- जाति विश्वास प्रजाति अथवा धर्म के भेदभाव के बिना प्रति व्यक्ति एकमत सामान्य नियम होगा।
- संयुक्त संयुक्त प्रतिनिधित्व की व्यवस्था की जाएगी।
- प्रारंभिक शिक्षा निशुल्क एवं अनिवार्य होगी।
- सेवा में केवल योग्यता के आधार पर नियुक्तियां की जाएंगी।
- भाषाई अल्पसंख्यकों को अपने बालकों को अपनी भाषा के माध्यम से शिक्षा देने के लिए पृथक विद्यालय की स्थापना का अधिकार होगा उनकी धार्मिक तथा सांस्कृतिक संस्थाएं इस कार्य के लिए सरकार द्वारा सहायता प्राप्त करेंगे किंतु यह सहायता उनके द्वारा शासन को दिए गए कर के अनुपात में प्राप्त होंगे।
- अवशिष्ट शक्तियां केंद्रीय सरकार में निहित होगीं।
- नागरी लिपि राष्ट्रीय लिपि होगी
- राष्ट्रभाषा हिंदी होगी तथा संस्कृत भाषा भारत की देववाणी भाषा होगी।
हम तो नीचे गिरे दूध
को भी पैर नहीं लगाते,
निर्जीव किताब भी पैर
से लग जाये तो प्रणाम
कर लेते हैं !
हम पेड़ पौधे,पशु पक्षियों से
लेकर जानवरों को भी पूजते हैं!
आप मुसलमान हो,
इसलिए हम हिन्दू हैं!
वर्ना हम तो विश्वमानव थे और हैं !
को भी पैर नहीं लगाते,
निर्जीव किताब भी पैर
से लग जाये तो प्रणाम
कर लेते हैं !
हम पेड़ पौधे,पशु पक्षियों से
लेकर जानवरों को भी पूजते हैं!
आप मुसलमान हो,
इसलिए हम हिन्दू हैं!
वर्ना हम तो विश्वमानव थे और हैं !













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