संविदा ! सामन्तवाद से भी बदतर दौर का प्रणेता प्रमाणित होगा
जागरण: 'संविदा' शब्द में 'विदा' शामिल है। सरकार ने अपनी सेवाओं को संविदा सेवा में तब्दील कर महज पांच साल में विदा का कानून बना दिया। यह भूमंडलीकरण के दौर वाली पूंजीवादी संरचना की सौगात है, जो उससे पूर्व के पूंजीवाद क्या, सामन्तवाद से भी बदतर है। भक्त तर्क दे रहे हैं कि कामचोरी रोकने के लिये निजीकरण और आज के निजी क्षेत्र के ऐसे जालिम रसूख बनाना जरूरी है। वह निजी क्षेत्र कितना कारकून है और कितना ह्यूमन- फ्रेंडली इसकी सच्चाई कोरोना त्रासदी काल में पूरी दुनिया में नंगी हो गई है। क्रूर शोषण परक मुनाफाखोरी की बुनियाद पर खड़ा इस दौर का निजी क्षेत्र जिस तरह लाकडाउन के साथ शटर गिरते ही हांथ खड़े कर अपने कर्मियों और सामाज के प्रति जिम्मेदारी के सरोकारों को ठेंगा दिखाते हुये दुबक गया था, उसके शर्मनाक अनुभवों की टीस तो ताजी ताजी ही नहीं है, जारी भी है। उदारीकरण के दौर में कुन्द बना दिया गया सरकारी चिकित्सा तंत्र ही कुछ हद तक जूझता रहा और आयुष्मान की भी लूट के अधिकारी रहे निजी चिकित्सा प्रतिष्ठान के डाक्टर शटर के पीछे से ठाढ़े जबाब देते दिखे। जब खुले भी, तो इस संकट भरे दौर में उनकी लूट खसोट के चर्चे आम हैं। बिना पढ़ाई जिस तरह निजी स्कूल एक ओर फीस वसूल रहे और संविदा शिक्षकों की देनदारी से मुंह मोड़े पड़े हैं, वह एक कटु स्थिति है। सरकारी विश्वविद्यालय और कालेज और यहां तक कि केन्द्रीय विश्वविद्यालयों तक में, जहां संविदा शिक्षक के भरोसे ही पढ़ाई होती रही है, किसी संविदा वाले को कोरोना काल में और कहीं कहीं और पहले से कुछ नहीं मिला है। ऐसे उन तमाम पी-एच.डी., नेट वाले संविदा शिक्षकों के लिये रोटी समस्या बनी हुई है, जो स्थायी शिक्षकों के मुकाबले नाममात्रीय भुगतान लेकर शिक्षा व्यवस्था उदारीकरण दौर में चलाते रहे हैं। शिक्षा और चिकित्सा के सेवा क्षेत्र इस दौर में उद्योग बने और उद्योग भी ऐसे बेमिसाल जिसमें पेमेंट पहले और उत्पादन बाद में और वह उत्पादन कैसा है, इस पर सवाल बेमानी।
उदारीकरण के दौर में उगी व बढ़ी संविदा सेवा प्रणाली से पहले भी निजी क्षेत्र थे। उनके कारखानों में लोग न केवल जीवन भर, बल्कि पीढ़ी दर पीढ़ी काम की सुरक्षा जीते थे। पीएफ, बोनस, वेतन वृद्धि आदि की सुविधाओं से लैस सेवायें देते थे। यहां तक गांवों के जमींदार के साथ सामंती संरचना में काम करने वाला मजदूर भी हर वर्ष नियत समय पर "समहुत" यानी सेवा संविदा नवीनीकरण के बावजूद जीवन भर ही नहीं, पीढ़ी दर पीढ़ी सेवा सुरक्षा जीता था। सरकार में भी उसका कर्मी वेतन, वेतन वृद्धि सहित सभी अन्य सेवा सुविधाओं के साथ पेंशन का भी हकदार रहता था। इस दौरान में 2003 में राजग सरकार ने पहले पेंशन मारी गई और अब की सरकार ने तो सेवा ही क्र्रूर शोषण की संविदा सेवा बनाने का फैसला कर लिया। जो स्थायी कैडर होंगे भी, उसमें पचास की उम्र में और सरकारी सेवा की ज्यादा संख्या वाली शेष संविदा सेवाओं में तो महज पांच साल बाद ही "विदा" बोल दिया जायेगा। ये हैं अच्छे दिन के निहितार्थ।
🌷आभार !
प्रो. सतीश कुमार










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