ग्रामराज्य
गांधी जी ने भी अपने ग्रामराज्य के सिद्धांत में इस कृषि प्रधान देश के बहुसंख्यक ग्रामीण जनता को दृष्टि में रखते हुए भारत के गांवों को भारतीय अर्थव्यवस्था का मूल व रीढ़ बताया है। उन्होंने कहा था कि भारत के उत्थान के लिए गांव का उत्थान परम आवश्यक है। अपने इसी मंतव्य को संदर्भित करते हुए उन्होंने ग्राम राज्य की संकल्पना प्रस्तुत की और इस संकल्पना को यथार्थ में परिणित करने के लिए ग्रामोदय से भारत उदय अभियान भी चलाया।
जब देश आजाद हुआ था तो गांधीजी ने गांव को आत्मनिर्भर व सशक्त बनाने के लिए ग्राम पंचायतों को पूर्ण स्वायत्तता प्रदान करने की मांग की। उनका मानना था कि ग्राम पंचायतें को कार्यकारिणी विधायी और न्यायिक तीनों प्रकार की शक्तियों से युक्त होना चाहिए। वास्तव में उनके अनुसार ग्राम, ग्राम नहीं बल्कि अपने आप एक गणराज्य के स्वरूप में होना चाहिए। ग्राम गणराज्य का सीधा सा तात्पर्य यह है कि ग्राम लगभग उन सभी संस्थाओं से युक्त होने चाहिए जो एक राज्य में होते हैं। तभी एक-एक ग्राम आत्मनिर्भर होंगे और इन आत्मनिर्भर ग्रामों से ही आत्मनिर्भर भारत का मार्ग प्रशस्त होगा। जब भारत के सभी ग्राम वास्तव में आत्मनिर्भर हो जाएंगे तो निश्चित रूप से भारत भी पूर्णरूपेण आत्मनिर्भर हो जाएगा। यही पूर्णरूपेण आत्मनिर्भर भारत वास्तव में पूर्ण ग्राम राज्य को भी प्रतिबिंबित करेगा।
भारत रत्न का मार्ग गांव से ही होकर जाता है क्योंकि ग्राम राज्य की संकल्पना को यथार्थ में साकार कर पाना इतना सहज भी नहीं है। ग्राम राज्य की संकल्पना यूनानी दार्शनिक प्लेटो द्वारा प्रतिपादित उसके उस आदर्श राज्य के सिद्धांत की भांति है जिसे वह स्वयं चाह कर भी यथार्थ में स्थापित नहीं कर पाया था। भारत में तक्षशिला विश्वविद्यालय के आचार्य चाणक्य अपनी कुशल निर्देशन में ना केवल एक दास बालक को हजार कार्षापण में खरीदकर उसे गुलामी की जंजीरों से मुक्त कराया अपितु से प्रशिक्षण प्रदान करके भारत के सबसे बड़े राज्य मगध का आदर्श राजा भी बनाया और इस राज्य को आदर्श राज्य की स्थिति में लाकर खड़ा कर दिया। मौर्यकालीन प्रशासन के संदर्भ में विद्वानों का मानना है कि इस आदर्श राज्य की आदर्श स्थिति यह थी कि इस राज्य के नागरिक अपने घरों में ताला लगाना तक भी छोड़ दिए थे। तो इसी से प्रेरणा लेकर ग्राम राज्य की संकल्पना को भी यथार्थ में परिणित करने का सार्थक प्रयास किया जा सकता है। इस ग्राम राज्य की संकल्पना की यथार्थ में परिणति दुष्कर अवश्य है लेकिन असंभव नहीं है।










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