विकास और इसका आधार क्या है, वृद्धि और विकास में क्या अंतर है?

जागरण:

समय के साथ होने वाले शारीरिक परिवर्तनों को वृद्धि कहते हैं। वृद्धि एक प्रकार का भौतिक परिवर्तन है जो जीवन के भौतिक स्वरूप को परिवर्तित करता रहता है, जबकि समय के साथ किसी प्रजाति में होने वाले अनुवांशिक परिवर्तनों को ही विकास कहते हैं।

यह एक प्रकार का गुणात्मक परिवर्तन है और एक ऐसी स्थिति है जिसमें प्रजाति की कार्य क्षमता में वृद्धि होती है।

प्राकृतिक वरण का सिद्धांत कहता है कि वातावरण में केवल वही प्रजातियां विकसित होती हैं जो समय अनुसार वातावरण में होने वाले परिवर्तनों के अनुसार अनुकूलन करने में सक्षम होती हैं।

किसी विशेष परिस्थिति अथवा वातावरण के अनुसार स्वयं को ढाल लेना ही अनुकूलन है।

और जो प्रजातियां अनुकूलन करने में सक्षम नहीं होती धीरे धीरे उनका पतन हो जाता है और इस धरा पर से विलुप्त हो जाती है।

महोदय चार्ल्स डार्विन के सिद्धांत योग्यतम की उत्तरजीविता के अनुसार पृथ्वी पर निवास करने वाली विभिन्न प्रजातियों में पोषण की प्रतिस्पर्धा होती है जिस कारण प्रजातियों में विभिन्न प्रकार के अंतः प्रजातिय एवम अंतर प्रजातिय संघर्ष होते हैं।

प्रजातियों का यह संघर्ष केवल प्रजातियों में ही नहीं अपितु पर्यावरण के प्रति भी होता है जिसमें योग्य प्रजातियां अनुकूलन के माध्यम से अपना अस्तित्व बनाए रखती हैं और विकसित होने लगती है।

और जो इस संघर्ष में स्वयं का अस्तित्व बनाए रखते हैं वे विकसित होते हैं।
जैव विकास को समझने के लिए लैमार्क और डार्विन के विकास में बहुत ही महत्वपूर्ण है।
योग्यतम की उत्तरजीविता का अर्थ होता है जो योग्य है जाति उसी को जीवन का उत्तराधिकार प्राप्त होता है।

मनुष्य और अन्य जीवो में आनुवंशिक परिवर्तन भी होते रहते हैं, यह आनुवंशिक परिवर्तन आनुवांशिक लक्षणों के वंशागति की इकाई जीन में होता है।
जीन में होने वाले यह परिवर्तन विभिन्न कारणों से हो सकते  हैं।

वंशागति में एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी के अंतर में जीन में होने वाले परिवर्तनों को उत्परिवर्तन कहते हैं। 

जीवो के वंशागति के माध्यम से पैतृक गुणों का एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में स्थानांतरण होता है जिससे संतान को पैतृक गुण प्राप्त होते हैं किंतु इसी बीच जीन में होने वाले उत्परिवर्तन संतति में नए गुणों को विकसित कर देते हैं।

हालैंड के महान वैज्ञानिक ह्यूगो डी ब्रिज ने उत्परिवर्तन का सिद्धांत प्रस्तुत किया।

जीवो में होने वाले संघर्ष विकास को चुनौती देते हैं किंतु प्रत्येक जीव विकसित होने के लिए पर्यावरण और अन्य प्रजातियों के साथ संघर्ष करता रहता है जिनमें क्षमता नहीं होती उनका इस संघर्ष में पतन हो जाता है और जिनमें क्षमता होती है वे इस संघर्ष पर विजय प्राप्त कर लेते हैं और अंततः विकसित हो जाते हैं।

इसी प्रकार मानव जीवन में आने वाली चुनौतियां विकास के नए द्वार खोल देती है हमें इन चुनौतियों से भागना नहीं चाहिए अपितु अपनी संपूर्ण शक्ति से इन चुनौतियों से संघर्ष करना चाहिए!

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