कांग्रेस की दुर्दशा :- एक समीक्षा

                                                कांग्रेस की दुर्दशा :- एक समीक्षा 


राहुल गांधी चाहते तो 10 साल की UPA सरकार में स्वयं प्रधानमंत्री बन सकते थे ,कैबिनेट मंत्री बन सकते थे किंतु उन्होंने राज्यमंत्री तक का पद नहीं लिया,मगर जितिन प्रसाद, मिलिंद देवड़ा, ज्योतिरादित्य सिंधिया, आरपीएन सिंह, सचिन पायलट ये सब वो थे जिनको पहली बार सांसद बनने पर ही मंत्री पद मिला.

किन्तु इन सभी नेताओं में एक बात कॉमन थी वो ये की इनका बैकग्राउंड बाप दादाओ की जमीन से था न की स्वंय के संघर्ष का इन्होंने पार्टी के लिए कोई संघर्ष नही किया बल्कि पैराशूट से लांच किए गए और वो सभी पद और प्रतिष्ठा जिसकी कामना हर एक नेता को जीवन भर रहती है वो एक झटके में मिल गयी। एक जमीनी  कट्टर और मिट्टी से निकले कार्यकर्ताओं को तरजीह ना देकर कांग्रेस ने 10 साल जो शासन किया उसका परिणाम आज भुगत रही है.बाप दादाओं के कारण सीधे टिकट मिलती है उन्हें विधायक की सांसद की और जब वो बुरी तरह हार जाते हैं तब वे सच्चे और ईमानदार कार्यकर्ता का सी आर वही लिखते हैं जिनका खुद का कोई वजूद नही है ।

 अभी भी कांग्रेस में ऐसे हजारों कार्यकता है जिन्होंने अपनी जवानी गला दी है पार्टी के लिए ,एक उम्र बिता दी है उनके खून में कांग्रेस बसती है  किंतु उन्हें एक अदद जिम्मेदारी देने के लिए भी पार्टी के लोग तैयार नही है, यह मेरा मूल्यांकन है कि जिसने अपनी राजनीति जमीन से शुरु की, आज  पार्टी का जो अस्तित्व बचा है वह उनके पसीने के ही कारण है. इन पैराशूट धारियों की बजाय यदि कांग्रेस अपने इन जमीनी कार्यकताओ पर विश्वास कर ले तो आज कम से कम मुख्य लड़ाई में तो दिखाई ही देने लगेगी,पार्टी की दुर्दशा से कष्ट उन्हें ही होता हूं जिन्होंने अपना जीवन हवन कर दिया है पार्टी के लिये न कि जितिन प्रसाद या ज्योतिरादित्य टाइप के लोगो को कोई कष्ट ही होता है।
 एक बात और कहना चाहता हूं जब यही लोग कांग्रेस में आते हैं तो भाजपा वाले वंशवाद का नारा देते हैं और जब इनको भाजपा ले लेती है उसी दिन से वंशवाद खत्म हो जाता है भाजपा की ना कोई विचारधारा है और भाजपा का न कोई सिद्धांत भाजपा का केवल एक लक्ष्य है लूट के खसोट के जाति पे धर्म पर कैसे भी करके सत्ता पर बने रहो। 
राम राम जपना पराया माल अपना

                                                  (ये लेखक के निजी विचार है )


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