राष्ट्रप्रेम
जागरण:
हो समृद्घता या दरिद्रता हम जन जन का कल्याण करें
आओ हम सब मिलकर के नव भारत का निर्माण करें
अतुल्य भारत अखंड भारत सोचो कितना सुंदर है
यह स्वप्न मात्र एक मेरा है सब कार्य जनों पर निर्भर है
यह कार्य तब ही संभव होगा जन-जन में मैत्री भाव रहे
और क्षुद्र नसों की रग रग में राष्ट्र प्रेम का स्राव रहे।
है मातृभूमि का ऋण अमुल्य कैसे चुकता हो पाएगा,
बलिदान राष्ट्र के प्रति होना , ऐसा भी अवसर आएगा।
सम्बन्धों के कुसुमों में तो मकरंद बनेंगे, बिगड़ेंगे,
हो सकता है कि देशों से सम्बन्ध बनेंगे बिगड़ेंगे ।
पर प्रथम भाव कुछ ऐसा हो भाई-भाई का नाता हो
जब पीठों में खंजर घोपें तो सिर उधेड़ना आता हो।
विकट परिस्थिति आए तो तन, मन, धन अर्पित कर देना,
जब मातृभूमि माँगेगी तो, सर्वस्व समर्पित कर देना।
और कह देना ऐ मातृभूमि ! मुझपर अब भी ऋण तेरा है,
इस ऋण के बदले में केवल एक सुक्षम समर्पण मेरा है
ऐ विधना इतनी विनती है मैं पुनर्जन्म जब भी पाऊँ,
मुझे धरा मिले भारतभूमि और हिन्दुस्तानी कहलाऊँ।
- सौरभ शुक्ला










Very nice Sukla ji 🙏😊
ReplyDeleteसादर आभार
Deleteअद्भुत है यह राष्ट्र प्रेम
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