हिंदू धर्म में लोग जो कंठी - माला पहनते हैं या जपते हैं (रुद्राक्ष, तुलसी) उसमे 108 दाना ही क्यों होते है ?
जागरण: हिन्दू धर्म में माला पर जप करने का विशेष महत्व है । जप माला में 108 दाने होते हैं और माला के ऊपरी भाग में एक बड़ा दाना होता है जिसे ‘सुमेरु’ कहते हैं । सुमेरु का माला में विशेष महत्व होता है । जप संख्या की गिनती सुमेरु से शुरु होती है और माला पूरी होने पर सुमेरु पर ही समाप्ति होती है । एक बार माला जब पूर्ण होती है, तो अपने इष्टदेव का स्मरण कर सुमेरु को मस्तक से स्पर्श कर जप इष्ट को समर्पित किया जाता है । फिर माला उलटकर पुन: शुरु से 108 माला का चक्र शुरु किया जाता है । सुमेरु को लांघा नहीं जाता है । ऐसा माना जाता है कि ब्रह्माण्ड में सुमेरु की स्थिति सर्वोच्च होती है ।
माला में 108 दाने ही क्यों ?
Ans.1
▪️ऐसा माना जाता है कि जप माला में 108 दाने हमारी सांसों की संख्या के आधार पर होते हैं । चौबीस घण्टों में मनुष्य 21,600 बार सांस लेता है । 24 घण्टों में से 12 घण्टे सोने और दैनिकचर्या में निकल जाते हैं । शेष बचे 12 घण्टों में मनुष्य 10,800 बार सांस लेता है । इन सांसों को भगवान के नाम-जप में लगाना चाहिए लेकिन ऐसा करना हर मनुष्य के लिए संभव नहीं । इसलिए इस संख्या में से अंतिम दो शून्य हटाकर केवल 108 सांस में ही भगवान के नाम-जप को महत्व दिया गया है ।
▪️दूसरी मान्यता के अनुसार कुल 27 नक्षत्र होते हैं । प्रत्येक नक्षत्र के चार चरण होते हैं । इनके गुणनफल की संख्या 108 आती है जो अत्यन्त पवित्र मानी गयी है ।
Archana agrwal
Ans. 2. हिन्दू धर्म में हम मंत्र जप के लिए जिस माला का उपयोग करते है, उस माला में दानों की संख्या 108 होती है। शास्त्रों में इस संख्या 108 का अत्यधिक महत्व होता है । माला में 108 ही दाने क्यों होते हैं, इसके पीछे कई धार्मिक, ज्योतषिक और वैज्ञानिक मान्यताएं हैं। आइए हम यहां जानते है ऐसी ही चार मान्यताओ के बारे में तथा साथ ही जानेंगे आखिर क्यों करना चाहिए मन्त्र जाप के लिए माला का प्रयोग।
सूर्य की एक-एक कला का प्रतीक होता है माला का एक-एक दाना
एक मान्यता के अनुसार माला के 108 दाने और सूर्य की कलाओं का गहरा संबंध है। एक वर्ष में सूर्य 216000 कलाएं बदलता है और वर्ष में दो बार अपनी स्थिति भी बदलता है। छह माह उत्तरायण रहता है और छह माह दक्षिणायन। अत: सूर्य छह माह की एक स्थिति में 108000 बार कलाएं बदलता है।
इसी संख्या 108000 से अंतिम तीन शून्य हटाकर माला के 108 मोती निर्धारित किए गए हैं। माला का एक-एक दाना सूर्य की एक-एक कला का प्रतीक है। सूर्य ही व्यक्ति को तेजस्वी बनाता है, समाज में मान-सम्मान दिलवाता है। सूर्य ही एकमात्र साक्षात दिखने वाले देवता हैं, इसी वजह से सूर्य की कलाओं के आधार पर दानों की संख्या 108 निर्धारित की गई है।
माला में 108 दाने रहते हैं। इस संबंध में शास्त्रों में दिया गया है कि…why there are 108 beads in a rosary (mala)
षट्शतानि दिवारात्रौ सहस्राण्येकं विशांति।
एतत् संख्यान्तितं मंत्रं जीवो जपति सर्वदा।।
इस श्लोक के अनुसार एक पूर्ण रूप से स्वस्थ व्यक्ति दिनभर में जितनी बार सांस लेता है, उसी से माला के दानों की संख्या 108 का संबंध है। सामान्यत: 24 घंटे में एक व्यक्ति करीब 21600 बार सांस लेता है। दिन के 24 घंटों में से 12 घंटे दैनिक कार्यों में व्यतीत हो जाते हैं और शेष 12 घंटों में व्यक्ति सांस लेता है 10800 बार।
इसी समय में देवी-देवताओं का ध्यान करना चाहिए। शास्त्रों के अनुसार व्यक्ति को हर सांस पर यानी पूजन के लिए निर्धारित समय 12 घंटे में 10800 बार ईश्वर का ध्यान करना चाहिए,
लेकिन यह संभव नहीं हो पाता है।
इसीलिए 10800 बार सांस लेने की संख्या से अंतिम दो शून्य हटाकर जप के लिए 108 संख्या निर्धारित की गई है। इसी संख्या के आधार पर जप की माला में 108 दाने होते हैं।
108 के लिए ज्योतिष की मान्यता
ज्योतिष के अनुसार ब्रह्मांड को 12 भागों में विभाजित किया गया है। इन 12 भागों के नाम मेष, वृष, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुंभ और मीन हैं। इन 12 राशियों में नौ ग्रह सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु और केतु विचरण करते हैं। अत: ग्रहों की संख्या 9 का गुणा किया जाए राशियों की संख्या 12 में तो संख्या 108 प्राप्त हो जाती है।
माला के दानों की संख्या 108 संपूर्ण ब्रह्मांड का प्रतिनिधित्व करती है।
एक अन्य मान्यता के अनुसार ऋषियों ने में माला में 108 दाने रखने के पीछे ज्योतिषी कारण बताया है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार कुल 27 नक्षत्र बताए गए हैं। हर नक्षत्र के 4 चरण होते हैं और 27 नक्षत्रों के कुल चरण 108 ही होते हैं। माला का एक-एक दाना नक्षत्र के एक-एक चरण का प्रतिनिधित्व करता है।
इसलिए किया जाता है माला का उपयोग
जो भी व्यक्ति माला की मदद से मंत्र जप करता है, उसकी मनोकामनएं बहुत जल्द पूर्ण होती हैं। माला के साथ किए गए जप अक्षय पुण्य प्रदान करते हैं। मंत्र जप निर्धारित संख्या के आधार पर किए जाए तो श्रेष्ठ रहता है। इसीलिए माला का उपयोग किया जाता है।
किसे कहते हैं सुमेरू
माला के दानों से मालूम हो जाता है कि मंत्र जप की कितनी संख्या हो गई है। जप की माला में सबसे ऊपर एक बड़ा दाना होता है जो कि सुमेरू कहलाता है। सुमेरू से ही जप की संख्या प्रारंभ होती है और यहीं पर खत्म भी। जब जप का एक चक्र पूर्ण होकर सुमेरू दाने तक पहुंच जाता है तब माला को पलटा लिया जाता है। सुमेरू को लांघना नहीं चाहिए।
जब भी मंत्र जप पूर्ण करें तो सुमेरू को माथे पर लगाकर नमन करना चाहिए। इससे जप का पूर्ण फल प्राप्त होता है।
संख्याहीन मंत्रों के जप से नहीं मिलता है पूर्ण पुण्य
शास्त्रों में लिखा है कि-
बिना दमैश्चयकृत्यं सच्चदानं विनोदकम्।
असंख्यता तु यजप्तं तत्सर्व निष्फलं भवेत्।।
इस श्लोक का अर्थ है कि भगवान की पूजा के लिए कुश का आसन बहुत जरूरी है, इसके बाद दान-पुण्य जरूरी है। साथ ही, माला के बिना संख्याहीन किए गए मंत्र जप का भी पूर्ण फल प्राप्त नहीं हो पाता है। अत: जब भी मंत्र जप करें, माला का उपयोग अवश्य करना चाहिए।
मंत्र जप के लिए उपयोग की जाने वाली माला रुद्राक्ष, तुलसी, स्फटिक, मोती या नगों से बनी होती है। यह माला बहुत चमत्कारी प्रभाव रखती है। ऐसी मान्यता है कि किसी मंत्र का जप इस माला के साथ करने पर दुर्लभ कार्य भी सिद्ध हो जाते हैं।
भगवान की पूजा के लिए मंत्र जप सर्वश्रेष्ठ उपाय है और पुराने समय से ही बड़े-बड़े तपस्वी, साधु-संत इस उपाय को अपनाते रहे हैं। जप के लिए माला की आवश्यकता होती है और इसके बिना मंत्र जप का फल प्राप्त नहीं हो पाता है।
रुद्राक्ष से बनी माला मंत्र जप के लिए सर्वश्रेष्ठ होती है। रुद्राक्ष को महादेव का प्रतीक माना गया है। रुद्राक्ष में सूक्ष्म कीटाणुओं का नाश करने की शक्ति भी होती है। साथ ही, रुद्राक्ष वातावरण में मौजूद सकारात्मक ऊर्जा को ग्रहण करके साधक के शरीर में पहुंचा देता है।
Bhrigu pandit
Ans.3.
108 बहुत ही विशेष संख्या है। सिर्फ क्षीर सागर(the milky way)के दो बिन्दुओं — सूर्य और चंद्रमा, पे ध्यान केंद्रित करते है।
ऊर्जा का मुख्य स्रोत सूर्य है। पृथ्वी पर जिस किसी ऊर्जा का उपयोग किया जाता है उसका मूल सौर ऊर्जा है।
चंद्रमा और स्त्री का गहरा सम्बन्ध है। मनुष्य जीवन रूक जाएगा अगर स्त्री और चंद्रमा धुन में नहीं है ; क्योंकि स्त्री का मासिक धर्म और चंद्रमा की गति जुड़े हुए हैं।
चलिए अब कुछ माप देखते हैं ।
सूर्य का व्यास (d_sun) = 1.391016 लक्ष किलोमीटर
पृथ्वी का व्यास (d_earth) = 12742 किलोमीटर
d_sun / d_earth = 109.1677916 ~ 108
सूर्य-पृथ्वी अंतर (S-E) = 149.6 लक्ष किलोमीटर
S-E / d_sun = 107.5472892 ~ 108
चंद्रमा का व्यास (d_moon) = 3474 किलोमीटर
चंद्रमा-पृथ्वी अंतर (M-E) = 384400 किलोमीटर
M-E / d_moon = 110.6505469 ~ 108
अब मनुष्य शरीर और 108 का संबंध देखते हैं।
सभी को पंडित गंगाधर विद्याधर मायाधर ओंकारनाथ शास्त्री यानि हमारे शक्तिमान याद होंगे। वे जब ब्रह्मनाद (ॐ उच्चारण) करते दिखाये गये हैं तब उनके मेरुदंड(spinal cord) पर मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपूर, अनाहट, विशुद्धी, आज्ञा और मस्तिष्क पर सहस्रार ये सात चक्र देखने को मिलते है। मनुष्य शरीर में कुल 108 चक्र या ऊर्जा केन्द्र होते हैं जो कार्यान्वित किए जा सकते हैं।
(अंतरिक्ष में अनंत वस्तुए है और हमने मात्र दो का मनुष्य शरीर से संबंध देखा है। ऐसे अनेक रोचक तथ्य है। )
इसलिए,
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे । हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे । × 108
ॐ नम: शिवाय। × 108
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय। × 108
ॐ दुर्गायै नम: । × 108
या जो भी मंत्र गुरू शिष्य को प्रदान करते हैं, वो मंत्र 108 की शृंखला में जपा जाता है।
अनुलेख -
1. दिन का प्रारंभ सूर्य नमस्कार से करना कितना तर्क संगत है ना!
आदित्यस्य(the ultimate source of energy) नमस्कारान् ये कुर्वन्ति दिने दिने। आयु:, प्रज्ञा, बलं, वीर्यं तेजस्तेषां च जायते।।
2. हर व्यक्ती को शक्तिमान बनने के बारे में अवश्य विचार करना चाहिए।
3. होता है जब आदमी को अपना ज्ञान कहलाया वो शक्तिमान !
सर्वेभ्यः शुभं भवतु ।
Rituraj richa rajendra
Ans.4
हमारे ऋषि मुनियों ने जप के लिए 108 संख्या निर्धारित की।क्योंकि यह सर्वोत्कृष्ट संख्या है। 108 मे शब्द ,काल और संख्या का सामंजस्य स्थापित कर दिया गया है।लेकिन मैं सिर्फ इसके मूल रहस्य को आज बता रहा हूँ।यह संख्या हमें आदि शक्ति और ब्रह्मा का बोध कराती हैं।अंक 1 व्यापक और एक ब्रह्म का बोधक हैं।जैसे बह कण कण मे विधमान है।शून्य पूर्णता का प्रतीक हैं।इसी से अंक और शब्द की उत्पत्ति हुई।यह आकाश को दर्शाता है।8 माया का सूचक हैं।यदि आप आठ के पहाडे का गुणा करे तो गुणनफल घटता बढता रहता हैं।यही हाल माया का है।वह निरन्तर घटती बढती रहती हैं।लेकिन जब ब्रह्म रुप अंक एक और पूर्णता रुपी शून्य आया तो माया तिरोहित हो जाती है ।
Sanjay mayank
Ans.5
यह हमारे भारत के महान महर्षियों का रहस्यमयी विज्ञान था। इन सबकी जानकारी सनातन धर्म के वेद-पुराण, उपनिषद में संस्कृत भाषा में उपलब्ध है।
आइए जाने-
क्यों होते हैं जपमाला में 108 मनके -?
जब भी हिन्दुधर्म में मन्त्र जाप की बात आती है, तो किसी मंत्र को जपने के लिए 108 बार जप करने का निर्देश, आदेश मिलता है। मन्त्र 108 बार ही क्यों किया जाता है।
बहुत सुख-सुविधा दे रखी है-महादेव ने..
१०८०० में भी महाकाल ने 2 शून्य हटा दिए, तो शेष 108 बचता है। इसलिए स्वस्थ्य-प्रसन्न रहने के लिए हर हाल में, कैसे भी समय निकालकर एक माला यानि 108 बार पंचाक्षरी मन्त्र !!ॐ नमःशिवाय!! का जाप जरूर करना चाहिए, ताकि जीवन में शरीर को स्वस्थ्य रखने के लिए पंचमहाभूतों (आकाश, अग्नि, वायु, जल और प्रथ्वी) की पूर्ति शरीर में होती है, जिससे ऊर्जा का संचार होता है।
क्या आप जानते हैं कि माला में 108 मनके होने के पीछे ज्योतिष, धर्म और विज्ञान के अपने वेज्ञानिक सिद्धांत हैं।
योगचूड़ामणि उपनिषद में कहा गया है-
पद्शतानि दिवारात्रि
सहस्त्राण्येकं विंशति।
एतत् संख्यान्तिंत मंत्र
जीवो जपति सर्वदा।।
आयुर्वेद शरीर विज्ञान के मुताबिक भी एक स्वस्थ व्यक्ति दिन में करीब 21,600 बार सांस लेता है। इसमें 12 घण्टे दिन के काम करने में यानि 10800 श्वांस कर्म करने में व्यतीत हो जाते हैं। शेष 12 घण्टे की 10800 सांस ईश्वर के स्मरण मतलब
!!ॐ नमः शिवाय!! का मन्त्र जाप
करते हुए हरेक इंसान को गुजारना चाहिए।
एक माला के जाप से कभी कोई रोग बीमारी नहीं होती यह आजमाया हुआ प्रयोग है।
शास्त्र-ग्रन्थ लिखते हैं- कि परमात्मा ने हर प्राणी को 21600 के हिसाब से सबको निश्चित सांस दी हैं। लेकिन मनुष्य अपनी श्वांस को इस तरह उपयोग कर बर्बाद कर देता है----
जाने क्या है-
इंसान के सांसों का गणित..
बैठत बारह, चलत अठ्ठारह, सोबत में छत्तीस।
भोग करें, तो चौसठ टूटे, क्या करें जगदीश।।
अर्थात- बैठते समय एक मिनिट में 12 सांसे, चलते समय 18 और सोते वक्त 36 श्वांस टूट जाती हैं तथा भोग-सम्भोग करने से एक मिनिट में 64 साँसों का क्षय हो जाता है। इसलिए हमारे महर्षियों ने ब्रह्मचर्य होने का निर्देश दिया है।
इसलिए सभी धर्मों में मानसिक शान्ति और दुःख-दारिद्र से मुक्ति के लिए माला के मनकों की संख्या को 108 निर्धारित किया गया है, ताकि व्यक्ति रोज दो माला में हर सांस के प्रतीक के तौर पर ईश्वर का ध्यान-स्मरण कर सके।
शिवपुराण के श्लोक 28 में माला जप करने के संबंध में बताया गया है कि अंगूठे से जप करें तो मोक्ष, तर्जनी से शत्रुनाश, मध्यमा से धन प्राप्ति और अनामिका से शांति मिलती है।
ज्योतिष के जरिये 108 का रहस्य...
ज्योतिष के अनुसार ब्रह्मांड को 12 भागों में विभाजित किया गया है। इन 12 भागों के नाम मेष, वृष, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुंभ और मीन हैं। इन 12 राशियों में नौ ग्रह सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु और केतु विचरण करते हैं। अतः 12 राशियों में 9 ग्रहों की संख्या का गुणा किया जाए, तो कुल जोड़ 108 हो जाता है।
नक्षत्र का एक छत्र राज...
ज्योतिष ग्रंथो के अनुसार एक राशि में सवा दो नक्षत्र होते हैं। 12 राशियों से २-१/४ सवा दो राशियों से गुणा करने पर कुल 27 नक्षत्र हो जाते हैं। हर नक्षत्र के 4 चरण होते हैं और 27 नक्षत्रों के कुल चरण 108 ही होते हैं। माला का एक-एक दाना नक्षत्र के एक-एक चरण का प्रतिनिधित्व करता है।
इन्हीं कारणों से एक माला में 108 मनके होते हैं।
108 का शारीरिक विज्ञान...
माला के 108 मनके हमारे हृदय में स्थित 108 नाड़ियों के प्रतीक स्वरूप हैं। माला का 109 वां मनका सुमेरु कहलाता है। जप करने वाले व्यक्ति को एक बार में 108 जाप पूरे करने चाहिए। इसके बाद सुमेरु से माला पलटकर पुनः जाप आरंभ करना चाहिए।
एक बार माला जब पूर्ण हो जाती है, तो अपने ईष्टदेव का स्मरण करते हुए सुमेरु को मस्तक से स्पर्श किया जाता है। ऐसा माना जाता है कि ब्रह्मांड में सुमेरु की स्थिति सर्वोच्च होती है।
हिंदू धर्म में 108 संख्या को बहुत पवित्र माना गया है। शुभ व धार्मिक संस्कारों की दृष्टि से 108 बहुत मंगलकारी है।
सूर्य से 108 का सम्बन्ध....
कहा जाता है कि माला के 108 मनकों और सूर्य की कलाओं का गहरा रिश्ता है। एक साल में सूर्य 2 लाख, 16 हजार बार कलाएं बदलता है। दो बार अपनी स्थिति में परिवर्तन कर छह माह उत्तरायण और छह माह ही दक्षिणायन रहता है।
इस प्रकार हर छह माह में सूर्य 1 लाख 8 हजार बार कलाओं में परिवर्तन करता है। संख्या 108,000 में अंतिम तीन शून्यों को हटाकर 108 मनके निर्धारित किए गए हैं।
हर मनका सूर्य की कलाओं का प्रतीक है। इसके पीछे मान्यता है कि सूर्य का तेज माला के हर मनके के जरिए व्यक्ति की आत्मा में प्रवेश कर सौभग्य में वृद्धि करता है।
माला जपते समय रखें ध्यान..
माला जपते वक्त हमेशा एक दीपक देशी घी या राहुकी तेल का जरूर जलन चाहिए। अग्नि को साक्षी अर्थात गवाह माना गया है। यदि आप जाप करते समय दीपक जलाते हैं, तो यह क्रम आपके पुण्य में सम्मिलित हो जाता है।
क्या जाप के समय माला जरूरी है-
कबीर दास जी ने लिखा है कि-
माला फेरत जुग गया, गया न मन का फेर....
मन का फेर कभी मिटता नहीं है। चाहें कर लो लाख उपाय। इसलिए
भजले मनवा नमः शिवाय।
व्यर्थ सुनहरा जीवन जाए।।
हथियाराम मठ, बनारस के परम शिव उपासक महान संत श्री श्री विश्वनाथ जी यति जी कहा करते थे.....
भोले भजन बिना नहीं मिलता
चाहें कर लो, लाख उपाय।
शम्भू त्याग बिना नहीं मिलता
चाहें कर लो लाख उपाय।।
सबका अपना मत एवं माला का महत्व...
शिवपुराण में लिखा है कि- प्रारम्भ में माला से जाप करने से साधक में स्थिरता आने लगती है। वह विचलित नहीं होता। उसका मन नहीं भटकता। इसलिए भगवान शिव ने यह नियम बनाया कि बिना माला के जाप निष्फल हो जाता है।
शिवपुराण के श्लोकानुसार...
विना दमैश्चयकृत्यं सच्चदानं विनोदकम्।
असंख्यता तु यजप्तं तत्सर्व निष्फल भवेत्।।
अर्थात बिना कुश के अनुष्ठान, बिना माला के संख्याहीन जप निष्फल होता है।
माला से मिले शिवाला—
माला जपने का गणित है- यह उपाधि
सन्त-महात्मा क्यों लिखते हैं-श्री श्री १०८, श्री श्री १००८ या अनंत श्री आदि! जाने धर्म की दुर्लभ बातें आइए जानते हैं इसके बारे में....
श्री श्री 108, 1008, अनंत श्री आदि का
गणित क्या है?
पहले पुनश्चरण की परम्परा को पढ़े....
(एक दम नवीन जानकारी)
पुनश्चरण के लिए माला से जाप जरूरी है..
रहस्योपनिषद के अनुसार पुनश्चरण का मतलब है जिस मन्त्र में जितने अक्षर हैं..
उतने लाख जप से एक पुनश्चरण पूर्ण होता है। जैसे
!!ॐ नमःशिवाय!!
मन्त्र में 5 अक्षर हैं, इसके 5 लाख जाप करने से एक पुनश्चरण हो जाता है।
वैदिक परम्परा है कि-
एक पुनश्चरण होने के बाद ही कोई भी सन्त-महात्मा या कोई भी साधक एक श्री की उपाधि लायक हो जाता है। यदि किसी महात्मा का गुरु मन्त्र गायत्री है, जिसमें 24 अक्षर होते हैं। अतः गायत्री के 24 लाख जाप करने के बाद वह सन्त-महात्मा एक श्री लगाने का अधिकारी हो जाता है। अतः श्री श्री 108 का उपयोग करने वाले महात्मा को 108×5 लाख = 5 करोड़ 40 लाख बार !!ॐ नमःशिवाय!! जप करना आवश्यक है, तभी वह श्री श्री १०८ लगाने का अधिकारी है और अगर किसी सन्त का गायत्री गुरु मन्त्र है, तो 108×24 लाख= 25 करोड़ 92 लाख अर्थात 24 लाख माला का जाप 100 साल में पूरा हो पायेगा, तब वे सन्त श्री श्री 108 की उपाधि से विभूषित हो सकते हैं।
मान लो- एक महात्मा की उम्र 110 वर्ष भी हुई औऱ 10 वर्ष की उम्र से जपना शुरू किया, तो भी एक साल में 24 हजार माला गायत्रीमंत्र का जप करना पड़ेगा। श्री श्री १००८ की उपाधि पाना है, तो इस जन्म में असम्भव है।
करवद्ध विनम्र निवेदन-
तेरा साईं तुझमें है,
ज्यादा धर्म के चक्कर में अपने कर्म खराब न करें। खुद ही सिद्ध पुरुष बने। एक माला लेकर बैठ जाये और पूरी एकाग्रता से जाप करें। आज नहीं, तो कल यह मन अचल हो ही जायेगा। एक दिन मन इतना लग जायेगा कि- माला छूट जाएगी और अजपा जप शुरू हो जाएगा।
बिल्कुल परमहंस मलूकदास जी तरह
आप भी कहने लगोगे-
मेरा भजन, अब शिव करे, मैं पाया विश्राम।।
अर्थात आप ईश्वर को भी अपना भजन करने का आदेश दे पाएंगे।
मत भटको, न अटको और ना हीं
किसी से लटको। बस,अपने आपको
भोलेनाथ के चरणों में पटको।
खुद ही खुदा बनने का अभ्यास आपको एक दिन निश्चित ही ईश्वर का एहसास कराकर बाबा विश्वनाथ से मिलवा देगा।
हिन्दू धर्म का दुर्भाग्य यही है कि- ज्यादातर धर्म धारण करने वाले शातिर संतों ने धर्म को धन्धा बनाकर इंसान को भटका दिया और भगवान या किसी लायक नहीं छोड़ा।
लोगों को भ्रमित कर पथ भ्रष्ट कर दिया। इससे ज्यादा कुछ लिखना अनावश्यक विवाद का कारण बन जायेगा। अभी और भी रहस्य शेष हैं जिसे आगे बताया जाएगा।
:- Ashok amrutam
Ans.6
किसी मंत्र को 108 बार पढ़ने की सलाह दी जाती है या मालाओं में 108 दाने होते है, हिन्दू धर्म में 108 का क्या रहस्य है?
भारत में जीवन के सभी रहस्यों को प्रतीकों में गूँथा गया है। प्रत्येक प्रतीक अपने आप में अनूठा है । इन्हीं प्रतीकों की श्रंखला में 108 सबसे महत्वपूर्ण है। 108 को सर्वाधिक महत्वपूर्ण पवित्र संख्या माना गया है। इसके पीछे एक नहीं बल्कि कई कारण है ।उन कारणों में से एक महत्वपूर्ण कारण गणित को हिन्दू धर्म में दिया गया महत्व हैं .
गणित केवल मापन या संख्या का ही नहीं अभिव्यक्ति का भी एक माध्यम है उदाहरण के लिए बायनरी लैंग्वेज । सृष्टि या सृजन की अपनी भाषा गणित स्वयं है। प्रकृति अपने को अभिव्यक्त करने के लिए गणित का सहारा लेती है। सृष्टि में सब कुछ गणितीय अनुपात में हैं और यहां अव्यवस्थित, असंगत कुछ भी नहीं। विज्ञान भी कहता हैं की मनुष्य ने गणित का आविष्कार नहीं किया हैं बल्कि उसे खोजा हैं . गणित सृष्टि और प्रकृति में पहले से ही अस्तित्व में हैं .
इसी गणित को हमारे ऋषियों ने गहन अध्ययन व साधना से समझा हैं व उन्होंने गणित के क्षेत्र में कई अभूतपूर्व खोजे की . हमारे श्रेष्ठ गणितज्ञ या तो ऋषि थे या ऋषि ही श्रेष्ठ गणितज्ञ थे. आर्यभट्ट, याज्ञवल्क्य, बोधायन , कात्यायन , वराहमिहिर आदि कई नाम गणित के प्रति समर्पित अध्यात्मिक व्यक्तियों के हैं .
आधुनिक भारत के महान गणितज्ञ श्री निवास रामानुजन के नाम के साथ ही उनकी कुलदेवी का भी नाम लिया जाता है। इन्होने शून्य और अनन्त को हमेशा ध्यान में रखा और इसके अंतर्सम्बन्धों को समझाने के लिए गणित के सूत्रों का सहारा लिया। रामानुजन के कार्य करने की एक विशेषता थी। पहले वे गणित का कोई नया सूत्र या प्रमेंय पहले लिख देते थे लेकिन उसकी उपपत्ति पर उतना ध्यान नहीं देते थे। इसके बारे में पूछे जाने पर वे कहते थे कि यह सूत्र उन्हें नामगिरी देवी की कृपा से प्राप्त हुए हैं। रामानुजन का आध्यात्म के प्रति विश्वास इतना गहरा था कि वे अपने गणित के क्षेत्र में किये गए किसी भी कार्य को आध्यात्म का ही एक अंग मानते थे। वे धर्म और आध्यात्म में केवल विश्वास ही नहीं रखते थे बल्कि उसे तार्किक रूप से प्रस्तुत भी करते थे। वे कहते थे कि "मेरे लिए गणित के उस सूत्र का कोई मतलब नहीं है जिससे मुझे आध्यात्मिक विचार न मिलते हों।”
तो गणित अध्यात्मिक रहस्यों की कुंजी की तरह हिन्दू धर्म में कार्य कर रहा हैं और हर अंक महत्वपूर्ण हैं और गणना का विशेष प्रयोग धर्म के हर अंग में होता रहा . जैसे काल गणना, मुहूर्त गणना , सम या विषम संख्या का आग्रह रखना।
हम राशी में १०१ , १२१ जेसे अंको को महत्व देते हैं और विभिन्न रीतियों और नियमों के साथ अंको या गणित को साथ में ले कर चलते हैं . इन्हें कई आध्यात्मिक प्रतीकों में उपयोग किया गया और लगभग हर अंक को अपना महत्व दिया जैसे -
1 - ईश्वर या प्रारम्भ
2 - जीव व ब्रह्म ,
3 - तीन लोक , त्रिदेव, त्रिदेवियाँ, त्रिगुण, त्रिकाल
4- चतुर्युग, चार पुरुषार्थ, चार वेद
5 - पंच परमेश्वर ( देव पंचायतन ) ,पंचतत्व, पांच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पञ्च मकार
6- षडरस
7- सप्त लोक , सप्त सुर , सप्त पुरियां , सप्त ऋषि
8- अष्ट दिशाएँ , अष्टांग योग , अष्ट सिद्धि , अष्ट धातु
9- नव रात्र , नव दुर्गा , नव ग्रह
इसी श्रंखला में शीर्ष पर १०८ का दिव्य, पवित्र या जादुई अंक विराजमान हैं . इस अंक को समझने से पहले हम १, ० और 8 के अंक को समझते हैं .
8 के अंक को माया का प्रतीक माना जाता हैं . माया को सदैव आठ के अंग के साथ दर्शाया जाता हैं , सोचने की बात हैं की आठ ही क्यों ?
8 को 1 , 0 और 9 के अतिरिक्त किसी भी अंक गुणा करो मूल परिणाम हमेशा घट कर आएगा .
उदा. - 8 * 2 = 16 . ( 1 + 6 = 7 )
8 * 3 = 24 . ( 2 + 4 = 6 )
8 * 4 = 32. ( 3 + 2 = 5 )
8 * 5 = 40 . ( 4 + 0 = 4 )
8* 25 = 200 . ( 2 +0+ 0 = 2 )
दिखाई बढ़त देती हैं पर पर मूल अंक घट गया होता हैं . माया का भी यही स्वभाव बताया गया हैं की जो दिख रहा हैं वो हैं नहीं और जो हैं वो दिख नहीं रहा हैं . माया सदैव भ्रम की रचना करती हैं.
108 का योग करने पर हमें 9 की संख्या मिलती हैं .
1 + 0 + 8 = 9
9 को पूर्णांक कहते हैं , सर्वाधिक बड़े मूल्य का एकल अंक . 9 को ईश्वरीय शक्ति का प्रतीक कहते हैं . माता आदि शक्ति को स्रष्टि की रचना शक्ति कहा गया हैं जो पूर्ण और अखंड हैं .
पूर्णांक 9 को जब हम अन्य अंको से गुणा करते हैं तो परिणाम हमेशा 9 ही आता हैं .
9 * 2 = 18 . ( 1 + 8 = 9 )
9 * 3 = 27 . ( 2 + 7 = 9 )
9 * 4 = 36 . ( 3 + 6 = 9 )
9 * 5 = 45 . ( 4 + 5 =9 )
9 * 25 = 225 . ( 2 +2 +5 =9 )
ईश्वर को किसी से भी गुणा करो , परिणाम हमेशा ईश्वर ही होता हैं और ईश्वरीय शक्ति किसी भी परिस्थितियों में अपने मूल स्वभाव में ही स्तिथ रहती हैं .
ॐ पूर्णमद: पूर्णमिदं पूर्णात् , पूर्ण मुदच्यते,
पूर्णस्य पूर्णमादाय, पूर्ण मेवा वशिष्यते। (ईश उपनिषद)
मन्त्र का अर्थ: वह जो (परब्रह्म) दिखाई नहीं देता है, वह अनंत और पूर्ण है। क्योंकि पूर्ण से पूर्ण की ही उत्पत्ति होती है। यह दृश्यमान जगत भी अनंत है। उस अनंत से विश्व बहिर्गत हुआ। यह अनंत विश्व उस अनंत से बहिर्गत होने पर भी अनंत ही रह गया।
यही नियम शून्य पर भी लागु होते हैं , शून्य अपना स्वभाव नहीं बदलता और पूर्ण ही रहता हैं .
इसलिए पूर्ण के दो प्रकार 108 के अंक में हमारे पास हैं ।
पूर्णता 0 और पूर्णांक 9 .
108 का अंक ईश्वरीय पूर्णता, सृष्टि की रचना और जीवन का प्रतीक हैं .
108 का अंक हमारे ब्रह्माण्ड की रचना के सिद्धांत BIG BANG THEORY का भी सूत्र हैं .
उपनिषद कहते हैं की ब्रह्मांड एक प्रोजेक्शन के समान हैं जिसका संकुचन और प्रसार पुनः पुनः होता हैं तो 108 वो प्रतीक हैं जो असंख्य बार ब्रह्माण्ड के विस्तार और पुनः संकुचन अर्थार्थ प्रलय को दर्शाता हैं .
एक बात और यहाँ गोरतलब हैं की ब्रहमांड एक निरंतर प्रसारित होती हुई रचना हैं जैसे कोई गुब्बारा जो फूलता ही जा रहा हैं, एक तारा दुसरे तारे से निरंतर दूर जा रहा हैं और यह कितना अभी और फैलेगा इसका हमारे वेज्ञानिकों के पास कोई स्पष्ट उत्तर नहीं हैं इसलिए इसे EXPANDING UNIVERSE कहते हैं .
हम संस्कृत में इसे वैदिक काल से ही ब्रहमांड कहते आयें हैं ब्रह्म शब्द का अर्थ ही निरंतर होता हुआ असीमित विस्तार हैं, ब्रह्माण्ड से अर्थ एक ऐसे अंड से हैं जो सभी दिशाओं में निरंतर प्रसारित हो रहा हैं .
अब 108 के अंक में इस विस्तार का भी सूत्र छुपा हुआ हैं .
1 = उस विलक्षणता का प्रतिनिधित्व करता हैं , जो इस ब्रह्माण्ड का बीज हैं या जिससे यह ब्रह्माण्ड फेला था .
0 = अनगिनत संख्या में से वर्तमान ब्रह्माण्ड का अंड (प्रतीक )
8 = अनंतता या 8 दिशाओं में विस्तार की सीमा , जहाँ से संकुचन प्रारम्भ होगा .
इसके अतिरिक्त भी हम इस अंक की विलक्षणता और अस्तित्व को कई जगह पर देख सकते हैं .
ज्योतिष के अनुसार के 27 नक्षत्र में से प्रत्यक के 4 चरण होते हैं . 27 * 4 = 108
12 राशियाँ 9 ग्रहों से प्रभावित होती हैं 12 * 9 = 108
पृथ्वी और सूर्य के बीच की दुरी सूर्य के व्यास से 108 गुणा हैं .
पृथ्वी और चन्द्र के बीच की दुरी चन्द्र के व्यास से 108 गुणा हैं.
सूर्य का व्यास पृथ्वी के व्यास से 108 गुणा बड़ा हैं .
वैदिक परम्परा में 108 उपनिषद
तांत्रिक परम्परा में 108 शक्तिपीठ
वैष्णव परम्परा में 108 देवस्थानम
शैव परम्परा में 108 शिवांग
बौद्ध परम्परा में 108 चिन्ह बुद्ध के चरण पर
जैन परम्परा में 108 पवित्रों के समूह
सिक्ख परम्परा में 108 की ऊन की माला
सनातन परम्परा की अनुवर्ती शाखाओं बौद्ध , सिक्ख व ताओं आदि सभी पंथ की माला में 108 मनके
योग परम्परा में 108 नाड़ियाँ ह्रदय चक्र से सहस्त्रार तक जाती हैं
कला में 108 नृत्य मुद्राएँ व विधाएँ
ध्यान पध्तियाँ 108 प्रकार की
शरीर 108 दबाव बिंदु ( मर्म चिकित्सा , मार्शल आर्ट, एक्यूप्रेशर)
संस्कृत वर्ण माला में 108 वर्ण , 54 अक्षर स्त्री लिंग और 54 अक्षर पुरुष लिंग के
श्री यंत्र में 108 बिंदु , 54 बिंदु शिव और 54 बिंदु शक्ति के
5 + 1 = 6 इन्द्रियां ( कान - श्रवण , नेत्र - द्रश्य , नासिका - घ्राण, जिह्वा -रस , त्वचा-स्पर्श , मन - विचार ) 3 काल - भूत , वर्तमान और भविष्य , 2 स्तिथि - जीव और ब्रह्म , 3 प्रकार की भावनाएं - राग, द्वेष और तटस्थ ( वीतराग )
6 *3 *2 *3 = 108
जप माला में 108 अंक आत्मा की 108 स्तिथियों की यात्रा और अनंतता का प्रतीक भी हैं और जप माला में एक मनका अलग से होता हैं जिसे सुमेरु कहते हैं .यह सुमेरु ईश्वर का प्रतीक हैं की उन्ही से जीवन यात्रा प्रारम्भ होती हैं और उन्ही पर पूर्ण इसलिए जप करते समय कभी भी सुमेरु का उल्लघन नहीं किया जाता हैं .
सुमेरु की भिन्नता यह भी दर्शाती हैं की ईश्वर जीवों से भिन्न अपने आप में पूर्ण और एक ही हैं .
108 अनंतता का सबसे बड़ा प्रतीक हैं और ईश्वर की अनंतता को हम 108 के रूप में स्मरण रखते हैं
जब किसी को अत्यधिक सम्मान देना होता हैं तो भी हम 108 श्री का प्रयोग करते है , इसका अर्थ यही है की वे अनंत श्री से युक्त हैं .
Bhuneshwari aadhyatm vetta research scoller













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