न्यायपालिका में परिवारवाद - न्यायाधीशों की नियुक्ति की प्रक्रिया में व्याप्त है अपारदर्शिता
जागरण: आमतौर पर भारतीय राजनीति में परिवारवाद और वंशवाद के आरोप-प्रत्यारोप एक दूसरे पर राजनीतिक दलों द्वारा लगाए जाते रहे है। लेकिन भारतीय न्यायपालिका पर भी यह आरोप लगते रहे हैं कभी उस पर भ्रष्टाचार के आरोप लगते हैं तो कभी न्यायिक नियुक्तियों में परिवारवाद को बढ़ावा देने का आरोप लगता है।
भारतीय न्यायपालिका में न्यायाधीशों की नियुक्तियों से जुड़ी सबसे बड़ी चिंता कोलेजियम प्रक्रिया के अंतर्गत पाई जाने वाली अपारदर्शिता है। उच्चतर न्यायपालिका में नियुक्तियां और स्थानांतरण का वास्तविक रूप इंतकाल धारों पर होते हैं यह अभी भी रहस्य बना हुआ है क्योंकि यहां पर पारदर्शिता का अभाव है। कॉलेजियम के पास अपार दर्शिता के लिए कोई कई रास्ते हैं जो नियुक्तियों की प्रक्रिया में मौजूद हो सकते हैं। ऐसा माना जा सकता है और आरोप भी ऐसे ही लगते रहे कि न्यायिक नियुक्तियों में अक्सर मनमानी की जाती है न्यायाधीशों की नियुक्ति तो अब चारिक होती है वास्तव में उनका तो मनोनयन होता है उनके ही लोगों द्वारा जो न्यायपालिका परिवारवाद और भ्रष्टाचार के आरोप लगाने के लिए पर्याप्त है।
कॉलेजियम ने सार्वजनिक जांच के किसी भी तरीके से खुद को सुरक्षित किया हुआ कॉलेजियम की कार्यवाही की जांच किसी भी अन्य संस्था के माध्यम से नहीं की जा सकती। न्यायाधीशों के नामांकन की प्रक्रिया बेहद गोपनीय है और किसी व्यक्ति का चयन कैसे होता है इस बारे में पर्याप्त जानकारी मिल पाना बहुत मुश्किल होता है या यूं कहें कि मिल ही नहीं पाता। विचार-विमर्श गुप्त रहता है पदोन्नति होने या ना होने का कारण भी गुप्त ही रहता है जिससे कई बार माहौल बेहद असहज बन जाता है। एक के बाद एक अफवाहों का प्रचार होता है और न्यायपालिका में काम करने वाले लोगों के बीच संदेह और शंका का एक व्यापक माहौल बन जाता है। न्यायाधीशों की नियुक्ति में पारदर्शिता नहीं होने और इनमें परिवारवाद को वरीयता देने का मुद्दा समय-समय पर चर्चा में आता ही रहता है। दरअसल होता यह है कि जब न्यायाधीश बनाने के लिए अधिवक्ताओं के नाम प्रस्तावित किए जाते हैं तो किसी गैर न्यायिक व्यक्ति से कोई राय नहीं ली जाती। इनमें जिन लोगों का नाम प्रस्तावित किया जाता है उनमें से कई पूर्व न्यायाधीशों के परिवार से होते हैं तो कुछ उनके संबंध ही होते हैं, जिन्हें उनके विशेष पहुंच के कारण उनके नामों को प्रस्तावित किया जाता है जो निसंदेह रूप से न्यायपालिका की सुचिता और स्वतंत्रता के हित में नहीं होता। पारदर्शिता के अभाव में न्यायपालिका में नियुक्तियां जब निजी संबंधों और प्रभाव के आधार पर की जाती है तो न्यायपालिका में इस परंपरा को अंकल सिंड्रोम कहा जाता है। इसे वर्तमान में सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीश के रूप में कार्यरत जस्टिस संजीव खन्ना के उदाहरण से समझा जा सकता है। 70 के दशक में जस्टिस हंसराज खन्ना सर्वोच्च न्यायालय की एक सुप्रसिद्ध न्यायाधीश हुई थी जो बहुचर्चित है बीएस कार्पस केस में बहुमत के विरुद्ध राय रखने वाले अकेले न्यायाधीश थे। तब की सरकार पर आरोप लगा कि उन्होंने हंसराज खन्ना के सरकार विरोधी रुख के कारण उनकी वरिष्ठता को दरकिनार करते हुए उनके स्थान पर एमएच बैग को सर्वोच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश बना दिया।
इसके लगभग चार दशक बाद हंसराज खन्ना के भतीजे संजीव खन्ना को सर्वोच्च न्यायालय में नियुक्ति दी गई है। हाई इलाहाबाद हाई कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ का सर्वोच्च न्यायालय में नियुक्ति भी इसी परिवारवाद का एक प्रमाण है। सर्वोच्च न्यायालय में ऐसी और भी कई न्यायाधीश हैं जिनके पिता या कोई अन्य परिजन न्यायाधीश रह चुके हैं जो कि न्यायालय में बढ़ती परिवारवाद को प्रतिबिंबित करने के लिए पर्याप्त है। इसके अलावा एक दूसरी समस्या कॉलेजियम द्वारा नियुक्तियां प्रक्रिया को अपारदर्शी रखने के कारण कोलेजियम व्यवस्था का कई बार विवाद में आ जाना इस पर कई बार भ्रष्टाचार के आरोप लगना स्वयं इस तथ्य की पुष्टि करता है।











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