(सोनिया गांधी) : जन विचार संवाद में दर्वान सिंह की पोस्ट को वहां से उठा कर यहां टांक दिया है।

आदरणीय नरेंद्र मोदी जी ...
जितना यह सच है कि सूरज पूरब मे उगता है, उतना ही सच है कि मै भारत की बेटी नही, क्यूंकि मै यहां पैदा नही हुई,  यह भी उतना ही सच है कि कमला हैरिस भारत मे पैदा नही हुई लेकिन दुनियां मे ढिंढोरा पीटते नहीं अघाते कि कमला हैरिस भारत की बेटी है जबकि उसका भारत से कोई रिश्ता नहीं है।  मैं बेटी तो नहीं लेकिन भारत की  बहु तो हूं, जितना आप अपने को भारत का बेटा कहते हैं ,राजीव उससे क्या कम भारत का बेटा थे ? मै राजीव की बहु हूँ, उनकेबेटे की माँ हूं। नेहरू के बेटी इंदिरा की पतोहू हूं  ।आपने बिना तलाक दिये अपने पत्नि को दर दर भटकने के लिये छोड़ दिया , राजीव ने ऐसा नहीं किया, वह कभी ऐसी नीचता भरी बातें सोच भी नही सकते थे। आपने अपनी पत्नि का  २०१४ तक किसी चुनाव में नाम तक नहीं लिखते थे, चुनाव आयोग के डर से पहली बार२०१४ में फार्म में अपनी पत्नि का नाम लिखा। आप अपने को हिंदू धर्म का रखवाला कहते हैं क्या आपका हिंदू धर्म  यही है जो जीते जी अपनी पत्नि को छोड़कर वसुधैव कुटुंबकम का नारा लगाता है , यही हिंदू धर्म का वसुधैव कुटुंबकम है ? मै अपने पूरे परिवार मां बाप सबको छोड़कर चली आयी और यहीं का होकर  अपना सबकुछ लुटाकर रह गयी, आप कहते हो मै विदेशी हूं। मैं चली जाऊँगी आप 
मुझे  मेरा राजीव लौटा दीजिए मैं लौट जाऊंगी,
नहीं लौटा सकते तो उनके पास यहीं मिट्टी में मिल जाने दीजिए । हिंदू धर्म को  सत्ता के लिये बदनाम मत करिये , जहां तक मैने हिंदू धर्म को समझा वह इतना घटिया नहीं है जैसा कि आपकी सोच घटिया है। प्र. मंत्री की कुर्सी पर बैठ जाने से आप नेहरू नही बन जायेंगे।  नेहरू होने के लिये योग्यता  चाहिये वह कहां से लायेंगे । आप यहां गांधी नेहरू को गाली देते है और विदेशों मे जाकर गांधी नेहरू के नामपर सम्मान पाते हैं , आपकी इतनी हिम्मत नही होती कि सावरकर , हेडगवार , गोलवलकर का नाम ले सकें। चरखा काट लेने से इतिहास नही बदल जायेगा कि आप जिस विचार धारा के हैं उसी विचार धारा का गोंड़से ने  अहिंसा  के पुजारी गांधी की हत्या की थी और आपके सरकार के समर्थक गोंड़से का मंदिर बना रहे हैं। बिना आपके सरपरस्ती के क्या संभव है। कदापि नहीं। ऐसा मेरा नहीं पूरी दुनियां के लोगों का सोचना है। 

आपने देखा है न राजीव को। चौड़ा माथा, गहरी आंखे, लम्बा कद और वो मुस्कान। जब मैंने भी उन्हें पहली बार देखा, तो बस देखती रह गयी। साथी से पूछा- कौन है ये खूबसूरत नवजवान। हैंडसम! हैंडसम कहा था मैंने। साथी ने बताया वो इंडियन है। पण्डित नेहरू की फैमिली से है। मैं देखती रही। नेहरू की फैमिली के लड़के को। 
 
कुछ दिन बाद, यूनिवर्सिटी कैंपस के रेस्टोरेन्ट में लंच के लिए गयी। बहुत से लड़के थे वहां। मैंने दूर एक खाली टेबल ले ली। वो भी उन दूसरे लोगो के साथ थे। मुझे लगा, कि वह मुझे देख रहे है। नजरें उठाई, तो वे सचमुच मुझे ही देख रहे थे। क्षण भर को नजरे मिली, और दोनो सकपका गए।
 
अगले दिन जब लंच के लिए वहीं गयी, वो आज भी मौजूद थे। कहीं मेरे लिए इंतजार। मेरी टेबल पर वेटर आया, नैपकिन लेकर, जिस पर एक कविता लिखी थी। 
वो पहली नजर का प्यार था। वो दिन खुशनुमा थे। वो स्वर्ग था। हम साथ घूमते, नदियों के किनारे, कार में दूर ड्राइव, हाथों  में हाथ लिए सड़कों पर घूमना, फिल्में देखना। मुझे याद नही की हमने एक दूसरे को प्रोपोज भी किया हो। जरूरत नही थी, सब नैचुरल था, हम एक दूसरे के लिए बने थे। हमे साथ रहना था, हमेशा के लिये । 
 
उनकी मां प्रधानमंत्री बन गयी थी। जब इंग्लैंड आयी तो राजीव ने मिलाया। हमने शादी की इजाजत मांगी। उन्होंने भारत आने को कहा। भारत? ये दुनिया के जिस किसी कोने में हो। राजीव के साथ कहीं भी रह सकती थी। तो आ गयी। गुलाबी साड़ी, खादी की, जिसे नेहरू ने बुना था, जिसे इंदिरा ने अपनी शादी में पहना था, उसे पहन कर इस परिवार की हो गयी। मेरी मांग में रंग भरा, सिन्दूर कहते हैं उसे। मैं राजीव की हुई, राजीव मेरे, और मैं यहीं की हो गयी। 
 
दिन पंख लगाकर उड़ गए। राजीव के भाई संजय  नही रहे। इंदिरा जी  को सहारा चाहिए था। राजीव राजनीति में जाने लगे। मुझे नही था पसंद, मना किया। हर कोशिश की, मगर आप हिंदुस्तानी लोग, मां के सामने पत्नी की कहां सुनते है। वो गए, और जब गए तो बंट गये। उनमें मेरा हिस्सा घट गया। फिर एक दिन इंदिरा निकलीं। बाहर गोलियों की आवाज आई। दौड़कर देखा तो खून से लथपथ। आप लोगों ने छलनी कर दिया था। उन्हें उठाया, अस्पताल दौड़ी, उनके  खून से मेरे कपड़े भीगते रहे। मेरी बांहों में दम तोड़ा। आपने कभी इतने करीब से मौत देखी है ? 
 
उस दिन मेरे घर के एक नही, दो सदस्य घट गए। राजीव पूरी तरह देश के हो गए। मैंने सहा, हंसा, साथ निभाया। जो मेरा था। सिर्फ मेरा, उसे देश से बांटा। और क्या मिला। एक दिन उनकी भी लाश लौटी। कपड़े से ढंका चेहरा। एक हंसते, गुलाबी चेहरे को लोथड़ा बनाकर लौटा दिया आप सबने। 
 

उनका आखरी चेहरा मैं भूल जाना चाहती हूं। उस रेस्टोरेंट में पहली बार की वो निगाह, वो शामें, वो मुस्कान।बस वही याद रखना चाहती हूं। इस देश में जितना वक्त राजीव के साथ गुजारा है, उससे ज्यादा राजीव के बगैर गुजार चुकी हूं। मशीन की तरह जिम्मेदारी निभाई है। जब तक शक्ति थी, उनकी विरासत को बिखरने से रोका। इस देश को समृद्धि के सबसे गौरवशाली लम्हे दिए। घर औऱ परिवार को संभाला है। एक परिपूर्ण जीवन जिया है। मैंने अपना काम किया है। राजीव को जो वचन नही दिए, उनका भी निबाह मैंने किया है। 
 
सरकारें आती जाती है। आपको लगता है कि अब इन हार जीत का मुझ पर फर्क पड़ता है। आपकी गालियां, विदेशी होने की तोहमत, बार बाला, जर्सी गाय, विधवा, स्मगलर, जासूस ... इनका मुझे दुख होता है? किसी टीवी चैनल पर दी जा रही गालियों का दुख होता है, ट्विटर और फेसबुक पर अनर्गल ट्रेंड का दुख होता है?? नही, तरस जरूर आता है।  फिर सोचती हूं  जिसने अपनी हिंदू धर्म मे सात फेरे लेकर  पति धर्म निबाहने  का कसम खाकर  अपनी पत्नि को छोड़कर भाग गया हो उसके बातका क्या बुरा मानना। आज वह अपने को हिंदू धर्म का रखवाला बनकर देश विदेश में डंका  बजा रहा है। 

याद रखिये, जिससे प्रेम किया हो, उसकी लाश देखकर जो दुख होता है। इसके बाद दुख नही होता। मन पत्थर हो जाता है। मगर आपको मुझसे नफरत है, बेशक कीजिये। आज ही लौट जाऊंगी। बस, राजीव लौटा दीजिए। और अगर नही लौटा सकते , तो शांति से, राजीव के आसपास, यहीं कहीं इसी मिट्टी में मिल जाने दीजिए। इस देश की बहू को इतना तो हक मिलना चाहिए शायद।

(सोनिया गांधी)
जन विचार संवाद में दर्वान सिंह की पोस्ट को वहां से उठा कर यहां टांक दिया है।

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