आरक्षण एक अभिशाप

जागरण: आरक्षण 

आरक्षण की बैसाखी ही
सत्ता का सोपान बन गई , 
मेधा का अपमान सजाती 
राजनीति मेहमान बन गई !


1
हम भारत के लोग राष्ट्र को
संप्रभु लोकतंत्र गणराज्य ,
सोशलिस्ट सेकुलर स्वरूप दे 
सभी नागरिक को समसाज्य , 
संविधान को अगीकृत 
अधिनियमित आत्मार्पित करते
कुर्सी के धृतराष्ट्र मोह में
सारे बेटे बलि चढ़ते ; 

घटी बंधुता पल - पल अवसर-
समता लहूलुहान, ठन गई !
मेधा का अपमान सजाती 
राजनीति मेहमान बन गई 


2
राजनीति सामाजिक आर्थिक
न्याय और अभिव्यक्ति विचार, 
धर्म - कर्म - विश्वास- उपासन 
की स्वतंत्रता मति संचार
अवसर और प्रतिष्ठा की
समता में गरिमा व्यक्ति निहार ,
राष्ट्रएकता सह अखण्ड-
तावर्धक भ्रातृभावविस्तार ; 

दृढसंकल्प विकल्प खोजते
जनभाषा अंजान बन गई ! 
मेधा का अपमान सजाती 
राजनीति मेहमान बन गई !! 

अल्पसंख्य को बंधमुक्त रख 
अनुसूचित को आरक्षण,
बहुमत के विपक्ष पर शासन 
कुटिल नीति मेघा - भक्षण ,
मंडल बढ़ा कमंडल के बल
कमल खिला भूमंडल पर ,
बहुजन नाम अल्पमति गणना 
गठबंधन बल दलदल पर ; 

वैयक्तिक गरिमा विशिष्ट की 
राष्ट्रधर्म पहचान बन गई ! 

मेधा का अपमान सजाती
राजनीति मेहमान बन गई !! 




धर्म और भाषा के झगड़े
लिंग जाति औ पिछड़े अगड़े 
तृण - तृण ऋण के बोझ तले ही
दबा राष्ट्र गुडफील के नखड़े 
भारत उदय शाइनिंग इण्डिया 
शब्दों का क्या मोहजाल है ,
विकसित भारत सदी ब्रहाविष 
भूखा भारत मरु अकाल है ; 

महंगी शिक्षा नंगी बेटी 
भ्रष्टाचार कमान तन गई !
मेधा का अपमान सजाती 
राजनीति मेहमान बन गई !!


5
समता के दो ही विकल्प हैं 
  गिरे पड़ों को खड़ा करें ,
बढे स्वयं जो अपनी गति से
राह रोक मत अड़ा करें ; 
बुद्धिजीवियों की उपेक्षा 
प्रतिबंधों से बौना कर ,
मेधा अल्प - साख बैसाखी
ऊँचा साज घिनौना कर 


प्रतिभाहीन न्याय - अक्षमता 
नीतिज्ञों की शान बन गई ! 
मेधा का अपमान सजाती 
राजनीति मेहमान बन गई!!


कृषकों का यह देश जहाँ अब
लिपिक आयकरदाता है ,
डी एम एसपी सीएम का
बेटा क्यों दलित सुजाता है ?
एक बार ही आरक्षण का 
लाभ नहीं प्रतिबंधित क्यों ? 
दलित रह गया दलित
उच्च दलितों का हित अनुबंधित क्यों ? 

आरक्षण दर आरक्षण 
भारत की नियति महान बन गई !
मेधा का अपमान सजाती 
राजनीति मेहमान बन गई । 

7 खुले आसमां के नीचे छत री में राम निढाल हो गए . न्यायालय ही सर्वोपरि फै सला ढाल खुशहाल हो गए ; आरक्षण सुप्रीमकोर्ट की धज्जी उड़ा दिया पल में , सत्ता बचे तोड़ सब मानक मूलमंत्र सुरताल खो गए , सक्षम के ऊपर अक्षम की राष्ट्रनीति बलिदान बन गई । मेधा का अपमान सजाती राजनीति मेहमान बन गई !!
            किचड़ मे ही खिले कमल
               लक्ष्मी कान्त शुक्ल

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