मीडिया और मानवाधिकार

 

मीडिया और मानवाधिकार पर यदि चर्चा करें तो मीडिया भी मानवाधिकार का ही परिणाम है और उसी के दायरे में आता है। यूं तो मीडिया का कार्य भी मानवाधिकारों में वाक्य एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के तहत आता है। जब हम


मानवाधिकारों के वर्तमान संदर्भ की बात करते हैं तो ऐसा प्रतीत होता है कि मीडिया का मूल स्वरूप मानवाधिकारों के पैरोकार के रूप में सामने आता है तथा उसका मूल उद्देश्य लोगों को उसके मूल अधिकारों के प्रति सचेत करना है। आज मीडिया के कारण ही मानव अधिकारों के बहुत सारे संवेदनशील मामले सामने आए हैं।

वर्तमान में मीडिया मानवाधिकारों से संबंधित तमाम मुद्दों को छोड़कर केवल टीआरपी बढ़ाने पर अपना ध्यान केंद्रित कर रखी है। इस दिशा में ऐसी होड़ मची हुई है कि मानव अधिकार को अपना दायित्व ही नहीं समझती। मीडिया न केवल मानव अधिकारों के प्रति असंवेदनशील रुख अपना रही है बल्कि कहीं ना कहीं पत्रकारिता के धर्म के निर्वहन के लिए मानवाधिकारों के हनन से भी कोई परहेज करती हुई नजर नहीं आती है।

कई बार मीडिया ने निष्पक्ष रिपोर्टिंग की अपनी समस्त सीमाएं पार के हैं और व्यक्तिगत जीवन में हस्तक्षेप किया है तथा निजता हुआ गोपनीयता के अधिकारों का उल्लंघन।

आरुषि तलवार हत्या मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि किसी जांच में पारदर्शिता और गोपनीयता दो अलग-अलग चीजें हैं। जहां सर्वोच्च न्यायालय ने मीडिया के 1 वर्ग की रिपोर्टिंग पर प्रश्न उठाया जिसके परिणाम स्वरूप पीड़ित और उसके परिवार के सदस्यों की प्रतिष्ठा धूमिल हुई। न्यायालय ने यह भी कहा कि मीडिया मुद्दे विशेष को इस तरह से कवर करता है कि एक ट्रायल जैसा लगता है।

पोस्टर ब्रोएक केविन नाम के फोटो जर्नलिस्ट ने अफ्रीकी देश सूडान में 1993 में पड़े अकाल के वक्त भूख से तड़पते एक बच्चे की फोटो खींची थी जिसके लिए उन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में दिए जाने वाले सर्वश्रेष्ठ पुरस्कार पुलित्जर प्राइज से नवाजा गया था। यह फोटो मौत के मुंह पर खड़े एक ऐसे बच्चे की है जो भूख से तड़प तड़प कर कंकाल और भेजो बेजान हो चुका था और इस बच्चे से कुछ ही दूरी पर एक गीत बैठा था जो उसकी मौत का इंतजार कर रहा था ताकि वह बच्चे को अपना निवाला बना कर अपनी भूख शांत कर सके।

केविन को जब एक मानव का धर्म निभाते हुए उस बच्चे के प्राण बचाने के लिए प्रयास करने चाहिए थे तो वह उस समय अपनी पत्रकारिता के धर्म के निर्वहन में तल्लीन थे। फोटो में तो एक ही गीत दिखता है लेकिन वास्तव में बच्चे के पास दो गिद्ध बैठे थे एक तो अपनी भूख शांत करने के लिए बच्चे के मरने का इंतजार कर रहा था दूसरा तृप्त सुधा वाला गिद्ध था जिसका शायद कैमरा भूखा था उसकी निगाहें भूख से तड़पते हुए मौत के मुख पर पहुंचे बच्चे पर उस भूखे गिद्ध की निगाहों से ज्यादा पैनी और स्थाई थी।

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