मानवाधिकार और मीडिया


मानव को स्वयं के सर्वांगीण विकास के लिए जिन मूलभूत अपरिहार्य अधिकारों की आवश्यकता होती है सामान्यता उन अधिकारों को मानवाधिकार कहा जाता है। विभिन्न प्रकार के मानवाधिकारों में से हम वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर चर्चा करेंगे क्योंकि हमारे लेख का शीर्षक ही "मानवाधिकार और मीडिया" है।
मीडिया का मानवाधिकार से सीधा और प्रगाढ़ संबंध है क्योंकि मीडिया मानव और उसके अधिकारों से संबंधित विभिन्न प्रकार की सूचनाओं के बीच मेडिएटर का कार्य करता है। मीडिया का कार्य उसे कहीं न कहीं मानवाधिकार के एक पैरोकार के रूप में तो कभी एक प्रहरी के रूप में प्रतिस्थापित करता है।
मीडिया का अस्तित्व वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मानवाधिकार से है और समस्त मानव अधिकारों की रक्षा के लिए है। मीडिया वाक्य एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मानवाधिकार के ऐसे साधन के रूप में है जिस के संदर्भ में यह भी कहा जा सकता है कि यह मानवाधिकार मानवाधिकार से मानवाधिकार के लिए प्रतिबिंबित होता है। किसी भी देश के निर्माण एवं प्रगति मीडिया का बहुत बड़ा योगदान होता है। मीडिया ने एक नई संस्कृति को विकसित किया है जिसे हम सशक्तिकरण की संस्कृति कह सकते हैं। मीडिया विश्व भर में हो रहे मानवाधिकारों के हनन को उजागर कर तमाम मानवाधिकारों की सुरक्षा के लिए बनी संस्थाओं को सक्रिय करके मानवाधिकारों के हनन पर अंकुश लगाने का प्रयास करते है। मीडिया मानवाधिकार से ही कार्य करने का अधिकार पाता है जिससे कि उसकी नैतिक जिम्मेदारी भी बनती है कि वह मानवाधिकारों के उन्नयन और उसकी रक्षा के लिए यत्नसील रहे। कई बार मीडिया अपने मूल उद्देश्य से भटक कर बाजारोन्मुखी हो जाती है। कई बार तो मीडिया स्वयं में ही इतनी तल्लीन हो जाती है कि वह मानवाधिकारों पर ही हावी हो जाती है और मानवाधिकार का उल्लंघन करते हुए नजर आती है।
ओस्टर ब्रोएक केविन नाम के फोटो जर्नलिस्ट अफ्रीकी देश सूडान में 1993 में पड़े अकाल के वक्त भूख से तड़पते हुए एक बच्चे की फोटो की जेसी जिसके लिए उन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र का सर्वश्रेष्ठ पुरस्कार पुलित्जर प्राइज मिला था। यह फोटो मौत के मुंह पर खड़े एक ऐसे बच्चे की है जो भूख से तड़प तड़प कर कंकाल और बेजान हो चुका था और इस बच्चे से कुछ ही दूरी पर एक गिद्ध बैठा था जो उसकी मौत का इंतजार कर रहा था ताकि वह बच्चे को अपना निवाला बना सके और अपनी भूख शांत कर सके। केविन को जब एक मानव का धर्म निभाते हुए उस बच्चे के प्राण बचाने के लिए प्रयास करने चाहिए थे तो वह उस समय अपनी पत्रकारिता के धर्म के निर्वहन में तल्लीन थे। मिस्टर केविन द्वारा खींची गई फोटो में तो एक ही गिद्ध था लेकिन वास्तव में बच्चे के पास दो गिद्ध थे। एक गिद्ध तो अपनी भूख शांत करने के लिए बच्चे के मरने का इंतजार कर रहा था दूसरा तृप्त क्षुधा वाला गिद्ध जिसका शायद कैमरा भूखा था उसकी निगाहें भूख से तड़पते हुए मौत के मुख पर पहुंचे बच्चे पर उस भूखे गिद्ध की निगाहों से ज्यादा पैनी और स्थाई थी।
मानवाधिकारों के हनन को उजागर करने वाले मिस्टर केविन खुद मानवता का निर्वहन करना जरूरी नहीं समझे। जिसका ज्ञान उन्हें बाद में हुआ तो उन्होंने आत्मग्लानि के कारण आत्महत्या कर लिया।
मीडिया आज बाजारवाद और स्वार्थवस अपनी जिम्मेदारी भूलता जा रहा है। कई मामलों में मीडिया अपनी भूमिका को नजरअंदाज कर केवल अपनी रेटिंग बढ़ाने में लगा रहता है जो कि उचित नहीं है। मीडिया व प्रेस को स्वतंत्रता मिलनी चाहिए जो कि कमोबेश विश्व भर के देशों मे मिल भी रही है लेकिन अनेकों बार मीडिया कर्मी स्वतंत्रता के नाम पर अपनी ही मनमर्जी करते हैं। लाइव कवरेज और टीआरपी बढ़ाने के लिए सारी हदें पार कर जाते हैं ब्रेकिंग और एक्सक्लूसिव न्यूज़ दिखाने के लिए कई बार देश की सुरक्षा को भी दांव पर लगाने से भी कोई गुरेज नहीं करते।
मुंबई के 26/11 के आतंकी हमले का सीधा प्रसारण मीडिया दिखा रही थी कि भारतीय सुरक्षा बल आतंकवादियों के खिलाफ कौन सा कदम उठा रहे हैं मीडिया के इस कृत्य से सुरक्षाबलों की पूरी जानकारी टेलीविजन के माध्यम से होटल के अंदर छिपे आतंकवादियों को मिल रही थी जिसके परिणाम स्वरूप होटल में बंधक बनाए गए लोगों और सुरक्षाबलों का जीवन संकट में आ गया था।

निजता व गोपनीयता के अधिकारों का उल्लंघन करती मीडिया:- 

कई बार मीडिया नहीं निष्पक्ष रिपोर्टिंग की अपनी सीमाएं पार की है और व्यक्तिगत जीवन में हस्तक्षेप किया है। आरुषि तलवार हत्या मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि किसी जांच में पारदर्शिता और गोपनीयता दो अलग-अलग चीजें हैं। जहां सर्वोच्च न्यायालय ने मीडिया के एक वर्ग की रिपोर्टिंग पर प्रश्न उठाए जिसके परिणाम स्वरूप पीड़ित और उसके परिवार के सदस्यों की प्रतिष्ठा धूमिल हुई।
मीडिया कई बार मुद्दों को इस तरह से कवर करती है कि यह एक ट्रायल जैसा लगता है और उन मुद्दों से संबंधित व्यक्ति का मानसिक उत्पीड़न मीडिया द्वारा होता है। जैसे अभी हाल ही में बहुचर्चित सोनू और आरती के प्रेम प्रसंग में हुई सोनू की हत्या और उसके बाद आरती का सोनू के घर यह कहते हुए रहना कि वह उसे अपना पति मानती थी और फिर गांव और समाज के लोगों द्वारा दबाव डाले जाने पर सोनू के भाई के साथ आरती ने विवाह कर लिया। जिसके बाद मीडिया एक बार फिर उसके गांव उसके घर पहुंची और तमाम तरह के सही गलत उल्लू उल्लू लोन प्रश्नों के बौछार करने लगे। आरती तुम सोनू के घर किस हक से रहती हो? क्या तुम्हें इस बात का भय नहीं कि समाज क्या कहेगा क्या सोचेगा? तुम तो ना तो इस घर की बिटिया हो और बहू भी नहीं बन पाई थी फिर किस हक से रहती हो समाज आपको कैसे स्वीकार करेगा? इस तरह के कई प्रश्नों से सोनू का पूरा परिवार जब त्रस्त हो गया तो गांव वालों के परामर्श से आरती का विवाह सोनू के भाई से करा दिया ताकि अब वह कह सकें कि यह हमारे सर्च हमारी बहू की हैसियत से रह रही है। मीडिया को जैसे ही यह बात चली की आरती सोनू के भाई के साथ विवाह कर लिया है। तू मीडिया एक बार फिर गिद्धों की बात जम गया आरती के घर और गांव में। अब मैं आरती से प्रश्न होने लगे की आप जब सोनू से प्यार करती थी तो उसके भाई से शादी क्यों किया? कोई पूछता की वैवाहिक जीवन कैसा है? तो कोई पूछता सुहागरात हुई कि नहीं, हुआ तो कब हुआ?  मीडिया को स्वतंत्रता थी प्रश्न करने की लेकिन वह अपनी स्वतंत्रता के लिए आरती और उसके पति और उसके साथ ससुर और उसके पूरे घर परिवार के निजता और गोपनीयता के अधिकारों का सरेआम हनन करते रहे और उनका मानसिक उत्पीड़न भी। मीडिया द्वारा आरती और उसके ससुराल बालू से मीडिया ने इस प्रकार प्रश्न प्रहार घर प्रताड़ित करने के दृश्य सोशल मीडिया पर वायरल है। वीडियो द्वारा अपने इस स्वतंत्रता के अधिकार का प्रयोग करते हुए भारतीय और उसके ससुराल वालों के गोपनीयता एवं निष्ठा के अधिकारों का इस प्रकार हनन किया गया कि उनका पूरा परिवार ही मानसिक विक्षिप्तता की संभावित स्थिति में पहुंच गया। संभव है कि इस तरह के ट्रायल तो शायद न्यायालय में ही होता होगा।


निष्कर्षत: स्पष्ट होता है कि कई मीडिया की स्वतंत्रता युक्तियुक्त निरबंधन के दायरे में रहनी चाहिए और मानवाधिकार संस्थाओं द्वारा भी समय-समय पर मीडिया को सचेत करते रहना चाहिए की वह निष्ठा और गोपनीयता का उल्लंघन ना करें और मानवाधिकारों के प्रति अपने जिम्मेदारियों को लेकर सतर्क रहें। कई जटिल परिस्थितियों के बावजूद मीडिया ने अपनी भूमिका को बेहतर निभाया है तथा मानव अधिकारों की बहाली में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया है। भूमंडलीकरण के इस दौर में मीडिया की प्रासंगिकता बहुत बढ़ गई है लेकिन इसे कैसे निर्विकार और निष्पक्ष कहा जा सकता है। क्योंकि अब मीडिया भी एक व्यापार का रूप ले चुकी है जिसका राजनीति के साथ घनिष्ठ संबंध भी दिखाई पड़ता रहता है। मीडिया की भूमिका तभी सार्थक हो सकती है जब उसका स्वामित्व और प्रबंधन लोकतंत्रिय, पारदर्शी और मानवाधिकारों का संवहन करने वाला हो। लेकिन समस्या यह है कि मीडिया से जुड़े बहुत सारे लोगों को भी मानवाधिकार की पर्याप्त जानकारी नहीं रहती है।
आज पूरा विश्व न्याय सामाजिक एवं उचित राजनीतिक व्यवस्था की स्थापना हेतु मीडिया की ओर देख रहा है। क्योंकि मीडिया भी पारदर्शिता का एक सोपान है। मीडिया वैश्विक सामाजिक राजनीतिक एवं पर्यावरणीय समस्याओं को अनवरत सामने रख रही है। वर्तमान में मीडिया से ऐसी उम्मीद की जा रही है कि वह समाज में एक ऐसा पारदर्शी आवरण तैयार करें जिसके प्रकाश से समस्त मानवों के मानवाधिकारों के अभिरक्षा सुनिश्चित हो सके।

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