रोजा लेगजम्बर्ग Rosa Luxemburg



जागरण:  रोजा लक्जमबर्ग 20वीं शताब्दी के आरंभ की पॉलिश समाजवादी क्रांतिकारी महिला थीं जिन्हें क्रांतिकारी मार्क्सवाद का मूल प्रवर्तक माना जाता है रोज लक्जमबर को मार्क्सवाद की मूल मान्यताओं में गहरा विश्वास था इसलिए वह किसी भी तरह के राष्ट्रवाद के विरुद्ध थे अपने इस विश्वास के कारण उसने लेनिन की राष्ट्रीय आत्मनिर्णय की नीति का भी विरोध किया साम्यवादी दल की भूमिका के विषय में लेनिन और रोजा लक्जमबर्ग के मध्य लंबा विवाद चला था। 

साम्यवादी दल की भूमिका:- 

रोजा लक्सईएमबर्ग ने सिद्धांतक मार्क्सवाद में आस्था और विश्वास रखते हुऎ जन इच्छा को सम्मान देने का प्रायएटीएन किया। रोजा लक्जमबर्ग को लोकतंत्र और स्वतंत्रता के सिध्दांतों में अधिक विश्वास था। रूस में जब लेनिन ने मार्क्सवाद से प्रेरित क्रांती की नींव रखा तब रोजा लक्जमबर्ग ने उसकी अधिनायक तांत्रिया और नृसंस्तंत्रिय प्रवृत्तियों की कड़ी आलोचना की। किंतु लेनिन ने क्रांति के संचालन का दायित्व व्यवसाय क्रांतिकारियों के छोटे से दल को सौंपना चाहा। रोजा का मनाना था की ऐसे दल में स्वाभावता नौकरशाही की प्रवृत्तियां आ जायेंगी। स्वयं लेनिन ने यह स्वीकार किया की सोवियत समाजवादी लोकतंत्र और एक व्यक्ति के शासन यह अधिनायक तंत्र में कोई अंतर विरोध नहीं है। कभी-कभी अधिनायक, एक वर्ग की इच्छा का सर्वोत्तम प्रतिनिधित्व कर्ता है और कभी-कभी उसकी सबसे ज्यादा जरूरत पाड़ाती है। लेनिन की आईएस स्वीकारोक्ति और उसके कम करने के आईएस ढंग से स्पष्ट हो जता है की रोजा लक्जमबर्ग की आलोचना में बहुत दम था। 

रोजा लक्जमबर्ग के अनुसार समाजवाद का अर्थ सामाजिक आर्थिक और राजनीतिक जीवन में पूरी जनता की खुली और बराबर की साझेदारी है रोज ने तर्क दिया कि यदि यह साझेदारी नहीं रहेगी तो समाजवाद मुट्ठी भर बुद्धिजीवियों के आदेशों का समुच्चय मात्रा बन कर रह जाएगा यदि अनुभव का आदान-प्रदान नए शासन के गिने-चुने अधिकारियों तक ही सीमित रहेगा तो भ्रष्टाचार अवश्यंभावी है। 

रोजा लक्जमबर्ग ने चेतावनी थी कि यदि समाज में लोकतंत्र का दमन कर दिया जाएगा तो समाजवादी दल में भी लोकतंत्र नहीं रहेगा। सर्वहारा के अधिनायक तंत्र का परिणाम होगा समाज का उत्पीड़न, लेकिन लेनिन ने इस चेतावनी को अनसुना कर दिया। लेनिन ने सर्वहारा वर्ग का नेतृत्व साम्यवादी दल को सौंप कर एक ऐसे आंदोलन की शुरुआत की जिसमें क्रांति का सारा दायित्व और सारी शक्ति गिने-चुने लोगों के हाथों में आ गई और श्रमिक इस क्रांति का साध्य न रहकर साधन मात्र बन गया। 
जब समाजवादी नेता और श्रमिक वर्ग का रिश्ता मैनेजर वर्सेस लेबर जैसा यांत्रिक हो गया तो उसमें वह मानवीय तत्व कहां रहा जो मार्क्सवादी चिंतन का प्रेरणा स्रोत था रूस की शासन व्यवस्था में नौकरशाही इतनी ताकतवर हो गई और पद प्रतिष्ठा के इतने सोपान बन गए कि इसने शक्ति के स्तूप का रूप धारण कर लिया। स्टालिन ने भी इस व्यवस्था को कुर्ता के साथ बनाए रखा। उसके बाद दशकों में इसमें कुछ डिल तो आई परंतु वहां विरोधी मत के दमन की परंपरा लगातार बनी रही जिसमें खुफिया पुलिस की विशेष भूमिका रही। ऐसी हालत में व्यक्ति की स्वतंत्रता पूरी तरह से दब गई जिसे वर्ग विहीन समाज के स्वप्न को धूल में मिला दिया रोजा ने इसे पुनर्जीवित करने का प्रयास किया। 

सुधार और क्रांति विषय के विचार:-   

रोजा लक्जमबर्ग ने अपने आरंभिक रचना सोशल रिफॉम्ड रिवैल्युएशन सामाजिक सुधार या क्रांति के अंतर्गत इस दृष्टिकोण का खंडन किया कि समाजवाद को पूंजीवाद के भीतर सामाजिक सुधारो की लंबी श्रृंखला के सहारे धीरे-धीरे स्थापित किया जा सकता है उसने यह तर्क दिया कि कामगार आंदोलन को मजदूर संघ और संसदीय गतिविधि के माध्यम से सुधारों के लिए संघर्ष अवश्य करना चाहिए परंतु यह सारा प्रयत्न पूंजीवादी उत्पादन संबंधों का अंत करने के लिए पर्याप्त नहीं होगा। सर्वहारा का अंतिम लक्ष्य क्रांति है जिसका राजनीतिक शक्ति पर विजय प्राप्त करना सर्वथा आवश्यक है। क्योंकि पूंजीवादी व्यवस्था के संकट और अंतर विरोधों को केवल सुधारो के माध्यम से नहीं सुलझाया जा सकता। 

रोजा लक्जमबर्ग ने अपनी सबसे महत्वपूर्ण सैद्धान्तिक रचना पूंजी संचय के अंतर्गत पूंजीवाद के पतन की भविष्यवाणी की है रोजा लक्जमबर्ग ने तर्क दिया की शुद्ध पूंजीवाद अपने विकास के लिए जरूरी शर्तें पूरी नहीं कर सकता पूंजीवाद जितना अतिरिक्त मूल्य पैदा करता है उसे अपने अंदर खापा नहीं सकता। पूंजीवादी देशों में जिस गति से मांग बढ़ती है पूंजी का संचय उससे भी तेज बढ़ता है इस अतिरिक्त पूंजी संचय को खपाने के लिए पूंजीवाद अल्प विकसित क्षेत्रों और गैर पूंजीवादी उत्पादन के क्षेत्र पर अपना आधिपत्य स्थापित कर लेता है जिससे पूंजीवादी साम्राज्य का युग आरंभ होता है। 

साम्राज्यवाद का शिकंजा कसने के लिए इसमें ज्यादा से ज्यादा हिंसा और शाहनवाज का सहारा लिया जाता है परंतु यह पूंजीवाद की समस्या का कोई अस्थाई समाधान नहीं है जब पूंजीवाद अपने बिस्तर की चरम अवस्था पर पहुंचता है और उसे आगे बढ़ने का रास्ता नहीं मिलता तब वह टूट जाता है क्योंकि पूंजीवाद का पतन आवश्यभावी है इसलिए सर्वहारा के सामने दो ही विकल्प रह जाते हैं या तो वे संकट यकृत क्रिया युद्ध एवं विनाश का सामना करें या फिर इन सबसे बचने के लिए क्रांतिकारी समाजवाद की स्थापना करें। 

समाजवाद की स्थापना के लिए रोजा लक्सईएमबौरग ने जन समूह की आत्मस्फुर्ती पर अगाध विश्वास था लेकिन इसके साथ-साथ उसने उपयुक्त संगठन, सूयोग्य नेतृत्व और मार्क्सवादी सिध्दांतओं में आस्था पर विशेष बल दिया था। इस प्रकार रोजा लक्जमबर्ग मार्क्सवादी सिद्धांतों में विश्वास रखते हुए जनसमूह को साथ लेकर समाजवाद की स्थापना करना चाहती थी मार्क्स ने सर्वहारा वर्ग के भीतर जो सामान्य और लोकतंत्र की गुंजाइश रखी थी लेनिन उसे बहुत पीछे छोड़ दिया था लेकिन रोजा लक्जमबर्ग ने उसे स्थापित करने का पुनः प्रयास किया था। 

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