मथुरा, अयोध्या, प्रयागराज और वाराणसी में ह्वेगंसांग की यात्रा
जागरण:
ह्वेगंसांग की यात्रा मथुरा अयोध्या प्रयागराज और वाराणसी के बारे में क्या लिखा हुआ है क्योंकि भारतीय इतिहास में ह्वेगंसांग की यात्रा विवरणों की को एक प्रमाणित और विश्वसनीय स्रोत माना जाता है ह्वेगंसांग सातवीं शताब्दी में भारत आया था और उन्होंने भारत में कई स्थलों का दौरा किया था जहां जहां गए वहां के बारे में उन्होंने अपनी यात्रा मे मौसम कैसा है लोग कैसे हैं भाषा कैसी है कौन से धर्म के लोग मानते हैं विदेशी यात्रियों के प्रति लोगों का व्यवहार कैसा है इन सब के बारे में उन्होंने अपनी यात्रा बहुत अच्छे से जानकारी दी है तो सबसे पहले बात करते हैं ह्वेगंसांग ने भारत के बारे में जानकारी दी है इतिहासकारों के अनुसार दी है ह्वेगंसांग कि यात्रा में उसने अपनी पुस्तक क्या लिखा है।
ह्वेगंसांग का जन्म 6 अप्रैल 602 या 3 ईसवी में चीन के चिनल्यु लुओयांग के निकट स्थान पर हुआ था ह्वेनसांग की मृत्यु 5 फरवरी 664 ईस्वी को चीन के तोगचुआन में हुई थी ह्वेगंसांग को युवान ध्वांन ,युवानचांगं युवानत्वांग चेनआई और यात्रियों का राजकुमार आदि नामों से जाना जाता था ह्वेनसांग की मां का नाम लेडी सॉग और पिता का नाम चेंजहुई था ह्वेनसांग अपने चारों भाइयों में सबसे छोटे और बचपन में ही वह अपने बड़े भाई चैगंसी के साथ लुओयांग शहर के सिंगतू नामक विहार में धम्म की शिक्षा ग्रहण करने गए थे
सिंगतू बिहार में धर्म की शिक्षा ग्रहण करने के बाद ह्वेनसांग चंगान गये थे जो चीन शेडोंग प्रांत है वे वहां पहुंचे जहां पर उन्होंने फाहियान के बारे में जाना और यहीं से उनके दिमाग मे भारत यात्रा का ख्याल आया ह्वेनंसांग की यात्रा विवरण को सी-यु-की के नाम से जाना जाता है जिसे ह्वेनसांग ने स्वंम चीनी भाषा में लिखा हुआ था ह्वेनसांग का जीवन परिचय उनके मित्र हेईली ने लिखा था ह्वेनंसाग के यात्रा का विवरण सबसे पहले अनुवाद फ्रेंच भाषा मे स्टेनिस्लेस जूलियन ने1850 में किया था 1884 मे सेम्युअल बील ने सी यु की का चीनी भाषा से अंग्रेजी भाषा में अनुवाद किया था ह्वेनसांग के यात्रा विवरण सी यू की का हिंदी में अनुवाद ठाकुर प्रसाद शर्मा ने किया है।
ह्वेनंसांग मैं जिस समय भारत के लिए यात्रा शुरू की थी उस समय चीन में तांग वंश के राजा ताईचुड चका शासन था भारत में वर्धन वंश के राजा सम्राट हर्षवर्धन का शासन था ह्वेनसांग ने 629 ईस्वी में चांगगांन से भारत के लिए अपनी यात्रा शुरू की थी और ओकीनो [आधुनिक. करशर] फीहान(फर गाना उज़्बेकिस्तान) सीमीकिया(ख्वारिज्म मध्य एशिया)होते हुए पोहो( बल्ख अफगानिस्तान मे) पहुंचे थे। यह उपर लिखे सारे स्थान हैं वे बौद्धों थे बाद मे इस्लाम के उदय होने पर बाबर फरगाना का ही था ओर समरक़न्द का तैमूरलंग था।
खैर अब बात करते हैं ह्वेनसांग में अपने लेखों में भारत का नाम इन्तू लिखा हुआ है प्राचीन काल में इसका नाम शिन्टू व हीनताव था परंतु अब शुद्ध उच्चारण इन्तू ही कहेगे* देश के लोग अपने प्रांत अनुसार विविध नामों से पुकारते हैं प्रत्येक प्रांत का अनेक नीतियां हैं मुख्य नाम हम इन्तु ही कहेंगे इसका उच्चारण सुनने में सुंदर है चीनी भाषा में इस नाम का अर्थ चंद्रमा होता है चंद्रमा के बहुत नाम हैं उन्हीं में से यह एक भी है और यह बात प्रसिद्ध है कि संपूर्ण प्राणी अज्ञान की रात्रि में संसार चक्र के आवागमन के द्वारा अभी तक चक्कर लगा रहा है एक नक्षत्र तक का भी उनको सहारा नहीं इनकी महादशा है कि सूर्य अस्ताचल को प्रस्तानिक हो गया मशाल की रोशनी फैल रही है और यदि नक्षत्र भी प्रकाशित है परंतु चंद्रमा के प्रकाश से वे मिलान नहीं खा सकते ठीक ऐसा ही प्रकाश पवित्र और विद्वान महात्माओं का है जो चंद्रमा के प्रकाश के समान सागर को रास्ता दिखाते हैं और इस देश को प्रभावशाली बनाते हुए इसी कारण देश का नाम इन्तू है इन्तु देश के निवासी जातिभेद के अनुसार विभक्त है इस देश का क्षेत्रफल लगभग 90000 ली है(किलोमीटर)और इसके तीन तरफ समुद्र है उत्तर में विशाल हिमालय पर्वत है इस देश का उत्तरी भाग चौड़ा तथा दक्षिणी भाग पतला है।
मथुरा को इन्होंने (मोटउलो )कहा है इस किस राज्य का क्षेत्रफल 5 ली है और राजधानी का 20 ली भूमि उत्तम और उपजाऊ है यहां के लोग आमलक(आंवला) की पैदा बहुत ध्यान से करते हैं जो झुंड का झुंड पैदा होता है यह वृक्ष दो प्रकार का होता है छोटी जाति वाले फल कच्चेपन हरा और पकने पर पीला हो जाता है तथा बड़ी जाति वाले का फल सदा के सदा हरा ही रहता है इस देश में बढ़िया जाति की कपास को भी उत्पन्न किया जाता है प्रकृति कुछ गम और मनुष्य का व्यवहार कोमल तथा आदरणीय है यह लोग धार्मिक ज्ञान को गुप्त रूप से उपार्जन करना अधिक पसंद करते हैं तथा परोपकार और विद्या की प्रतिष्ठा करते हैं लगभग 20 संघाराम और दो हजार संयासी है जो जोक समान रूप से हीनयान और महायान संप्रदाय के आश्रित हैं।
5 देव मंदिर भी हैं जिनमें सब प्रकार की साधना उपासना करते हैं तीन स्तूप अशोक राजा के बनवाए हुए हैं गत चारों बुद्धा के अनेक चिन्ह वतमान है तथागत भगवान के पुनीत साथियों के शरीरावशेष पर भी स्मारक स्वरूप नए स्तूप बने हुए हैं जंम श्रीपुत्र मुदगलपुत्रो पुर्णमैत्रेयाणिपुत्र उपाली आनन्द राहुल मञ्जूश्री तथा अन्य बोधिसत्व इत्यादि। प्रत्येक वर्ष तीनों धार्मिक महीनों में और प्रत्येक मास के व्रतोत्सया के अवसरो में सन्यासी लोग इन स्तूपो पर आते हैं और अभिवादन पूजन करके बहुमूल्य वस्तुओं का भेंट करते हैं यह लोग आप अपने संप्रदाय अनुसार अलग-अलग पुनीत स्थानों का दर्शन पूजन करते हैं जो लोग अभिधम का अभ्यास करते हैं वे श्रीपुत्र को जो समाधि में मगन होने वाले हैं वह मुद्गलपुत्र को जो सुना पाठ करते हैं वे पुर्णमैत्रयाणिपुत्र को जो विनय का अध्ययन करते हैं वह उपाली का भिक्षुक लोग आनंद का श्रमण लोग राहुल को और महायान संप्रदाय बौधिसत्वा को सम्मान देकर अनेक प्रकार की भेंट पूजा चढ़ाते हैं रत्नजडित झंडे और बहुमूल्य क्षेत्र जाल की तरह सब ओर फैल जाते हैं सुगंधित द्रव्य का धूम बादलों के समान छा जाता है और मेह के समान फूलों की वृष्टि सब तरफ से होती है।
कल की पोस्ट मे ह्वेनसाग की अयोध्या यात्रा का वर्णन करने का प्रयास किया जायेगा पोस्ट किसी भी संप्रदाय की भावना को आहत करने के लिए नहीं है केवल उन लोगों के लिए है जो बुद्ध के विषय में अनर्गल अलाप करते रहते हैं और यह सब ठाकुर प्रसाद शर्मा जी ने अनुवाद में जो लिखा है वह ह्वेनसांग की सी यू की पुस्तक का है।











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