दर्शन के धुरंधर प्रोफेसर संगम लाल पाण्डेय जी की 22 वी पुण्य तिथि पर पुत्र डॉ0 आनन्द प्रकाश पाण्डेय ने अर्पित की श्रद्धांजलि
प्रो0 संगम लाल पाण्डेय के बीच पूना में विश्व के सभी धर्मों पर एक विशद चर्चा हुई जो आचार्य रजनीश की पुस्तक "फिलॉस्फिया अल्टिमा " जो अमेरिका से प्रकाशित हुई है । प्रोफेसर पाण्डेय बचपन से ही बड़ी विलक्षण प्रतिभा के थे जिसके कारण उनकी चर्चा पूरे प्रदेश में होने लगी थी | वे अत्यंत कुशाग्र बुद्धि के थे । उन्होंने प्रारम्भिक शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तक प्रथम श्रेणी के साथ टॉप करते रहे । वर्ष 1952 मे वे इलाहाबाद विश्वविद्यालय मे दर्शन शास्त्र के प्रवक्ता नियुक्त हुए | वर्ष 1974 मे रीडर तथा 1980 मे प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष हुए | सेवा निवृति के उपरांत यूoजीo सीo ने उन्हे इमीरिटस प्रोफेसर नियुक्त कर दिया था | प्रो0 पाण्डेय की सबसे बड़ी विशेषता उनकी अद्भुत और विलक्षण स्मरण शक्ति थी । एक बार वो जिस पुस्तक को पढ़ लेते थे वह सारा ज्ञान उनके मस्तिष्क में स्थिर रहता था । उनके समकालीन , दुनिया का कोई ऐसा दार्शनिक न था जो उनकी विद्वता से प्रभावित न हुआ हो । डॉ0 राम मनोहर लोहिया उन्हें क्रियावान दार्शनिक कहते थे ।
प्रोo पाण्डेय ने भारतीय समाज में भारतीय समाजवाद की प्रकृति को समझने की मूल अन्तर्दृष्टि पैदा की थी । उन्होने लोकायनवाद नामक नवीन मत की स्थापना की | उनका कहना है कि वेदान्त और
उपनिषद को मिलाकर एक निर्दोष समाजव्यवस्था की स्थापना करने से न केवल भारत का कल्याण होगा बल्कि पूरे विश्व का कल्याण होगा । सामाजिक समस्याओं को लेकर वह सदैव चिंतित रहा करते थे । अकादमिक क्षेत्र से बिल्कुल अलग उनका राजनीतिक क्षेत्र था ।
भारतीय राजनीति में उनका एक अलग व्यक्तित्व रहा । एक बार जब वो बस से प्रचार करने जा रहे थे पूर्व सांसद मोहन सिंह जो उनके विश्वविद्यालय में शिष्य थे ने कहा कि गुरु जी चुनाव ऐसे कैसे जीतेंगे तो उन्होंने ने कहा चुनाव जीतू या हारू जनता में जागरूकता तो पैदा होगी ।
उन्होंने अपने विचारों से देश की सभ्यता , संस्कृति , परंपराओं , नैतिक मूल्यों के मूल्यांकन और अध्ययन का परिवेश उत्पन्न किया । उनके विचारों और सिद्धान्तों से देश की एक नई तस्वीर प्रकट हुई । लोगों के ज्ञान में वृद्धि हुई । पिता और गुरु के रूप में उनका अनुशासन कठोर था परन्तु हृदय कोमल था । वे मेरे पिता थे । पुत्र के रूप मैंने उनके कंधों पर बैठकर शहर के मेलों को देखा और समझा है , बचपन में उनकी पीठ पर लेट कर गंगा में तैरना सीखा है । भारतीय धर्म दर्शन के वे गहन अध्येता थे । तत समय के सभी उच्च कोटि के साधु संतों के साथ उनकी धर्म दर्शन पर गंभीर चर्चा होती रही जिससे समाज को नया दर्शन और नया विचार मिला । अक्सर वो साधु महात्माओ के निमंत्रण पर उनके पंडाल में प्रवचन देने और विचार विमर्श करने जाया करते थे । श्रोता के रूप में मैं नीचे दरी पर बैठा रहता था यद्यपि उस समय मुझे दार्शनिक गूढ़ बाते समझ मे नही आती थी लेकिन मै उन दिव्य ऋषियों की आभा से ही प्रभावित होता था ।
स्वामी करपात्री जी ,देवरहा बाबा , सच्चा बाबा , सभी शंकराचार्यो , श्रीपाद बाबा आदि संतो का आशीर्वाद मुझे पिता जी के साथ बचपन मे मिला । उनकी धार्मिकता ,वैज्ञानिकता , तार्किक शैली , सहजता और मानवीयता का प्रभाव मुझे आज भी उद्वेलित करता है ।
अत्यंत दुखद रहा इलाहाबाद विश्वविद्यालय का भारत भूमि पर चमकने वाला यह नक्षत्र , 30 जून 2002 को भूलोक छोड़कर दूसरे लोक में प्रयाण कर गया । कुछ वर्ष और ऐसे ऋषि की भू लोक में आवश्यकता थी । सम्पूर्ण विश्व उनके विचारों और कृतियों को सदैव याद करता रहेगा । हम उनकी पुण्य तिथि पर हार्दिक श्रद्धांजलि अर्पित करते है |
डॉ0 आनन्द प्रकाश पाण्डेय 30 - 6 - 2024











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