दर्शन के धुरंधर प्रोफेसर संगम लाल पाण्डेय जी की 22 वी पुण्य तिथि पर पुत्र डॉ0 आनन्द प्रकाश पाण्डेय ने अर्पित की श्रद्धांजलि



जागरण: प्रोफेसर संगम लाल पाण्डेय  का जन्म 12 जुलाई 1929 को उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद जिला के समही गाँव में हुआ था । धर्म,दर्शन और राजनीति के क्षेत्र मे उनके विचारो को युगान्तकारी माना जाता है । भारतीय धर्म दर्शन को विश्व की अमूल धरोहर स्थापित करने के लिए उन्होंने देश  के सभी विश्वविद्यालयों में व्याख्यान दिए थे । प्रोफेसर पाण्डेय जी ने भारतीयदर्शन, समकालीन-दर्शन,पाश्चात्य-दर्शन,अद्वैत-वेदान्त,भाषा-दर्शन, वेदांतिक-समाजवाद आदि  पर कालजयी ग्रंथो की रचना करके विश्व के पटल पर महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है | उनकी प्रमुख रचनाओं  मे भारतीय दर्शन का सर्वेक्षण ,नीतिशास्त्र का सर्वेक्षण ,मूल शांकर वेदान्त, व्हेदर इंडियन फ़िलॉसफी,प्री शंकर अद्वैत फिलॉसफी , ज्ञानमीमांसा के गूढ प्रश्न,शंकरचार्य के दर्शन का उज्जीवन,वेदांतिक समाजवाद आदि है जिनमे दर्शन और ज्ञान की नयी अभिव्यक्ति दृष्टिगोचर होती है | वैदिक दर्शन से लेकर आधुनकि पाश्चात्य दर्शन तक  उनके विचारों की यात्रा दर्शन जगत को एक नया मार्ग प्रशस्त करती है । जिन लोगो ने उनको व्याख्यान देते सुना है वे अपने आप उनकी ओर खिचते चले जाते थे | उनकी सबसे बड़ी परिपक्व कृति भारतीय दर्शन का सर्वेक्षण और प्री शंकर अद्वैत फिलासफी है ।  जो विश्व पटल पर एक मानक है। मूल रूप से शंकराचार्य के अद्वैतवाद से वह बहुत प्रभावित थे । उनका कहना है कि  अद्वैत दर्शन विश्व का श्रेष्ठ दर्शन है । वरिष्ठ आइ0ए0 एस0 अधिकारी श्रीoआरoड़ीoसोनकर जी  जो उनके शिष्य भी थे का कहना है कि"उनमे विलक्षण प्रतिभा थी और वह उत्कृष्ट कोटि के विद्वान थे | वास्तव मे वह विद्वानो के विद्वान थे,गुरुओं के गुरु थे | उनमे वैदिक ऋषियों जैसी स्मरण शक्ति थी | वर्ष 1982 में आचार्य रजनीश और 
प्रो0 संगम लाल पाण्डेय  के बीच पूना में  विश्व के सभी धर्मों पर एक विशद चर्चा हुई जो आचार्य रजनीश की पुस्तक "फिलॉस्फिया अल्टिमा " जो अमेरिका से प्रकाशित हुई  है । प्रोफेसर पाण्डेय  बचपन से ही बड़ी विलक्षण प्रतिभा के थे जिसके कारण  उनकी चर्चा पूरे प्रदेश में होने लगी थी | वे अत्यंत कुशाग्र बुद्धि के थे । उन्होंने  प्रारम्भिक शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तक  प्रथम श्रेणी के साथ  टॉप करते रहे । वर्ष 1952 मे वे इलाहाबाद विश्वविद्यालय मे दर्शन शास्त्र के प्रवक्ता नियुक्त हुए | वर्ष 1974 मे रीडर तथा 1980 मे प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष हुए | सेवा निवृति के उपरांत यूoजीo सीo ने उन्हे इमीरिटस प्रोफेसर नियुक्त कर दिया था | प्रो0 पाण्डेय की सबसे बड़ी विशेषता उनकी अद्भुत और विलक्षण स्मरण शक्ति थी । एक बार वो जिस पुस्तक को पढ़ लेते थे वह सारा ज्ञान उनके मस्तिष्क में स्थिर रहता था । उनके समकालीन , दुनिया का कोई ऐसा दार्शनिक न था जो उनकी विद्वता से प्रभावित न हुआ हो । डॉ0 राम मनोहर लोहिया उन्हें क्रियावान दार्शनिक कहते थे ।
प्रोo पाण्डेय ने भारतीय समाज में भारतीय समाजवाद की प्रकृति को समझने की मूल अन्तर्दृष्टि पैदा की थी । उन्होने लोकायनवाद नामक नवीन मत की स्थापना की | उनका कहना है कि वेदान्त और
उपनिषद को मिलाकर एक निर्दोष समाजव्यवस्था की स्थापना  करने से न केवल भारत का कल्याण होगा बल्कि पूरे विश्व का कल्याण होगा । सामाजिक समस्याओं को लेकर  वह सदैव चिंतित रहा करते थे । अकादमिक क्षेत्र से बिल्कुल अलग उनका राजनीतिक क्षेत्र था ।
भारतीय राजनीति में उनका एक अलग व्यक्तित्व रहा । एक बार जब वो बस से प्रचार करने जा रहे थे पूर्व सांसद मोहन सिंह जो उनके विश्वविद्यालय में शिष्य थे ने कहा कि गुरु जी चुनाव ऐसे कैसे जीतेंगे तो उन्होंने ने कहा चुनाव जीतू  या हारू जनता में जागरूकता  तो पैदा होगी । 
उन्होंने अपने विचारों से देश की सभ्यता , संस्कृति , परंपराओं , नैतिक मूल्यों  के मूल्यांकन और अध्ययन का परिवेश उत्पन्न किया । उनके विचारों और सिद्धान्तों से देश की एक नई तस्वीर प्रकट हुई ।  लोगों के  ज्ञान में वृद्धि हुई । पिता और गुरु के रूप में उनका अनुशासन कठोर था परन्तु हृदय कोमल था । वे मेरे पिता थे ।  पुत्र के रूप मैंने उनके कंधों पर बैठकर शहर के मेलों  को देखा और समझा  है  ,  बचपन में उनकी  पीठ पर लेट कर गंगा में तैरना सीखा है । भारतीय धर्म दर्शन के वे गहन अध्येता थे ।  तत समय के सभी उच्च कोटि के साधु संतों के साथ उनकी धर्म दर्शन पर गंभीर  चर्चा होती रही जिससे समाज को नया दर्शन और नया विचार मिला । अक्सर वो साधु महात्माओ के निमंत्रण  पर उनके पंडाल में प्रवचन देने और विचार विमर्श करने जाया करते थे ।  श्रोता के रूप में मैं नीचे दरी पर बैठा रहता था यद्यपि उस समय मुझे दार्शनिक गूढ़ बाते समझ मे नही आती थी लेकिन मै उन दिव्य ऋषियों की आभा से ही प्रभावित होता था ।
 स्वामी करपात्री जी ,देवरहा बाबा , सच्चा बाबा , सभी शंकराचार्यो , श्रीपाद बाबा  आदि संतो का आशीर्वाद मुझे पिता जी के साथ  बचपन मे मिला । उनकी धार्मिकता ,वैज्ञानिकता , तार्किक शैली , सहजता और मानवीयता का प्रभाव मुझे आज भी उद्वेलित करता है ।
अत्यंत दुखद रहा इलाहाबाद विश्वविद्यालय का भारत भूमि पर चमकने वाला यह नक्षत्र , 30 जून 2002 को भूलोक छोड़कर दूसरे लोक में प्रयाण कर गया । कुछ वर्ष और ऐसे ऋषि की भू लोक में आवश्यकता थी । सम्पूर्ण विश्व उनके विचारों और कृतियों को सदैव याद करता रहेगा । हम उनकी पुण्य तिथि पर हार्दिक श्रद्धांजलि अर्पित करते है |

डॉ0 आनन्द प्रकाश पाण्डेय 30 - 6 - 2024

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