देवदासी प्रथा का सच

जागरण: वामपंथी इतिहासकारों के मुँह पर तमाचा:
देवदासी प्रथा का सच, जिसे आपसे छुपाया गया!
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सदियों से भारतीय संस्कृति और सनातन परंपराओं को बदनाम करना वामपंथी इतिहासकारों का मुख्य एजेंडा रहा है। हमारे गौरवशाली इतिहास को विकृत करने के लिए इन इतिहासकारों ने जिस सबसे घिनौने झूठ का सहारा लिया, वह है 'देवदासी प्रथा'। वामपंथियों ने एक सोची-समझी साजिश के तहत मंदिरों की इन परम आदरणीय और विदुषी महिला कलाकारों को 'वेश्या' साबित करने का कुत्सित प्रयास किया। उन्होंने यह झूठा नैरेटिव गढ़ा कि देवदासियों की नियुक्ति मंदिर के पंडे-पुजारियों की काम-पिपासा को शांत करने के लिए की जाती थी।

​लेकिन आज हम वामपंथियों के इस अभद्र और मनगढ़ंत एजेंडे को इतिहास के अकाट्य प्रमाणों से पूरी तरह ध्वस्त करने जा रही हूं।

​तथ्य 1
​वामपंथी जिन्हें शोषित बताते हैं, प्राचीन भारत में उन्हें 'नित्य सुहागिनी' कहकर पूजा जाता था। देवदासियों का विवाह सीधे मंदिर के आराध्य देवता से होता था। चूंकि ईश्वर अमर हैं, इसलिए वे कभी विधवा नहीं होती थीं।

​सच्चाई: समाज में उन्हें इतना पवित्र माना जाता था कि शादियों में उनके हाथ से तैयार मंगलसूत्र का हिस्सा (तले) बेहद शुभ माना जाता था। किसी भी मांगलिक कार्य में उनकी उपस्थिति सौभाग्य का प्रतीक थी। क्या किसी शोषित या वेश्या को समाज में ऐसा पूजनीय स्थान मिल सकता है? कभी नहीं!

​तथ्य 2
भरतनाट्यम जैसी महान कला की जन्मदात्री थीं। ​वामपंथी इतिहासकारों ने देवदासियों को केवल एक वस्तु की तरह पेश किया, जबकि वे शास्त्रीय कलाओं की प्रकांड विद्वान और शिक्षिकाएं थीं।

​सच्चाई: आज जिस भरतनाट्यम को पूरा विश्व भारत का गौरव मानता है, उसका मूल नाम 'सदिर अट्टम' था। इस दिव्य नृत्य कला को युगों-युगों तक देवदासियों ने ही जीवित रखा और संवारा। वे संस्कृत, तेलुगु और तमिल भाषाओं की ज्ञाता थीं और जटिल काव्यों पर अभिनय करती थीं। वे वासना का साधन नहीं, बल्कि साक्षात मां सरस्वती का स्वरूप थीं।

​तथ्य 3
राजाओं से भी ऊंचा दर्जा और आर्थिक स्वतंत्रता प्राप्त था।मार्क्सवादी चश्मे से इतिहास देखने वालों ने दावा किया कि पुजारियों ने उनका शोषण किया, लेकिन इतिहास के पन्ने कुछ और ही गवाही देते हैं।

​सच्चाई (बृहदेश्वर मंदिर का प्रमाण): तंजावुर के प्रसिद्ध बृहदेश्वर मंदिर के शिलालेख (11वीं शताब्दी) गवाह हैं कि राजा राजराजा चोल प्रथम ने मंदिर के लिए 400 देवदासियों की नियुक्ति की थी। शिलालेखों में हर देवदासी का नाम, उनके घर का नंबर और उन्हें मिलने वाली बड़ी संपत्तियों व जमीनों का पूरा ब्योरा दर्ज है। वे सीधे राजा और मंदिर ट्रस्ट के संरक्षण में थीं, पुजारियों के अधीन नहीं। पुजारियों की इतनी हैसियत ही नहीं थी कि वे उनके जीवन पर नियंत्रण कर सकें।

​तथ्य 4
जब महिलाएं खुद मंदिरों को भूमि दान करती थीं, तो किसी के पराधीन कैसे हो सकती थीं? ​मध्यकाल में जब दुनिया भर में महिलाओं को कोई अधिकार नहीं थे, तब भारत की देवदासियां स्वतंत्र रूप से अगाध संपत्ति की मालिक होती थीं।

​सच्चाई: दक्षिण भारत के दर्जनों मंदिरों के पत्थरों पर खुदा है कि देवदासियों ने स्वयं अपने पैसों से मंदिरों का निर्माण करवाया, कुएं खुदवाए और गरीबों के लिए अन्न क्षेत्र शुरू किए। एक शोषित महिला कभी दानकर्ता नहीं हो सकती।
​फिर इस पवित्र प्रथा का पतन कैसे हुआ? (असली कहानी)

​वामपंथियों ने चालाकी से क्या किया? उन्होंने इस व्यवस्था के 'पतन के दौर' को उठाकर उसे ही 'शुरुआती सच्चाई' बनाकर पेश कर दिया। इस प्रथा के विनाश की पटकथा अंग्रेजों ने लिखी थी।

​जब ब्रिटिश हुकूमत ने भारत के राजा-महाराजाओं को खत्म किया और मंदिरों की जमीनों व संपत्तियों पर कब्जा कर लिया, तो देवदासियों का राजकीय आश्रय पूरी तरह छिन्न-भिन्न हो गया।

​अंग्रेजों और मिशनरियों ने अपनी संकीर्ण 'विक्टोरियन नैतिकता' के चश्मे से इस पवित्र परंपरा को देखा। वे कला और अध्यात्म के इस संगम को समझ ही नहीं पाए। उन्होंने 'सदिर अट्टम' (नृत्य) को अश्लील घोषित कर दिया और देवदासियों को 'वेश्या' कहकर बदनाम किया। कानून बनाकर इस प्रथा को प्रतिबंधित कर दिया गया।

​जब रहने का ठिकाना नहीं रहा, राजाश्रय समाप्त हुआ, तो कला का सम्मान छीन लिया गया। चरम गरीबी और भुखमरी के दौर में समाज के कुछ दुराचारी तत्वों ने उनकी लाचारी का फायदा उठाया। पतन के इसी अंतिम दौर को वामपंथियों ने पूरी प्रथा का सच बताकर सनातन संस्कृति को लांछित करने का कुकर्म किया।

वामपंथी इतिहासकारों का यह नैरेटिव पूरी तरह बेनकाब और ध्वस्त हो चुका है। मंदिरों की देवदासियां वासना की तृप्ति का साधन नहीं, बल्कि भारत की कला, संस्कृति, अध्यात्म और महिला सशक्तिकरण का सबसे जीवंत और गौरवशाली प्रतीक थीं। वामपंथियों का झूठ अब और नहीं चलेगा!

रश्मि रति

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