Has the Non-Alignment Movement (NAM) Lost its Revalance in Multipolar World ? क्या गुटनिरपेक्ष आंदोलन (नाम ) एक बहुध्रवीय विश्व में अपनी प्राथमिकता खो बैठा है ?
निबंध -5
क्या गुटनिरपेक्ष आंदोलन (नाम ) एक बहुध्रवीय विश्व में अपनी प्रासंगिकता खो बैठा है ?
गुट -निरपेक्ष की अवधारणा द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद रखी गई , जब कुछ देश कुछ औपनिवेशिक देशों की गुलामी कर रहे थे। यह वह समय था ,जब फ्रांस ,ब्रिट्रेन ,स्पेन, पुर्तगाल जैसे देशों का क्षेत्राधिकार ,बहु- महाद्धीपीय क्षेत्रों तक फैल चूका था। साम्राज्वाद के विस्तार की लड़ाई में , वे एक दूसरे से कई स्थानों पर भिड़े ,कई संधिया की , इसके बावजूद इन देशों की क्षेत्रीय विस्तार की राजनीतिक-रणनीति जारी रही। इन सब के क्षेत्रीय फैलाव का कारण ही प्रथम विश्व युद्ध हुआ , उसके बाद फिर द्वितीय विश्वयुद्ध।
द्वितीय विश्वयुद्ध के परिणिति के पश्चात दो दि- ध्रुवीय शक्तियों का उदय हुआ , जिसमे एक था अमेरिका दूसरा सोवियत संघ।इसके पश्चात् अब समस्त विश्व - समुदाय संकट -संतुलन की भावना से असहज था कि वे जाये ,तो किधर जाए , इधर कुआँ , उधर खाईं।
ऐसी स्थिति में वे सब इस आत्ममंथन में पङ गए कि अब हम सब गरीब देशों, विकासशील व अल्पविकसित देशों का क्या होगा ? जोकि द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद अभी- अभी हाल- फिलहाल में आजाद हुए हैं , तो इन सभी देशों ने मिलकर इस संकट का समाधान करने के लिए एक युक्ति निकाली, जिसमे युगोस्लोवाकिया , मिस्र ,भारत, घाना जैसे देश शामिल थे। इन देशों के प्रतिनिधित्व करने वाले नेताओं जैसे - सुकर्णो , टीटो , नासिर , नेहरू , करूमशाह ने मिलकर एक सम्मेलन में बात-विमर्श के बाद इस तथ्य पर पहुँचे कि इन्हे ऐसी विश्व-व्यवस्था का निर्माण करना चाहिए जो आपसी सहअस्तित्व , लोककल्याण की मंगलमय की भावना के सपने को समेटे हुए हो ,जिसमें सामाजिक उदारता हो, समरसता हो , जिससे सामाजिक- सहिष्णुता और विश्व-बंधुत्व की संस्कृति विकसित किया जा सके । आखिर में इन देशों ने मिलकर जो युक्ति निकाली ,उन्होंने इसका नाम 'नाम '(NAM ) दिया गया जो कि भारतीय भाषा में गुटनिरपेक्ष आंदोलन (NON ALIGNMENT ) के रुप में जग प्रसिद्ध है।
विश्व-शक्तिसंतुलन में अव्यवस्थित होने वाले ये देश जो अपने आप को किसी ध्रुव में नहीं रखना चाहते थे , उन्होंने इस गुट -निरपेक्ष आंदोलन में सहर्ष स्वतः सदस्य बनना स्वीकार्य किया। शुरू -शुरू में अपने प्रजनन काल की आरम्भिक चरण में इसमें 20 -25 देश ही शामिल हुए। उसके कुछ समय पश्चात अन्य देशों ने भी "नाम" के महत्व को समझकर और देश भी जुड़े, वर्तमान में जाकर इसकी सदस्य संख्या बढ़कर 120 तक हो गई है।
कारण - निवारण की आधार-भूत विसंगतियों ने ऐसे नए सूत्र- धारी आयामों को जन्म दिया है जिसकी जरुरत को कोई अकेला देश पूरा नहीं कर सकता था , अतएव इस गुट का निर्माण येन-केन - प्रकारेण जरूरी हो गया था। शीतयुद्ध के दौरान सोवियत- संघ व अमेरिका ने एक- दूसरे के पूर्णतया शत्रु बन चुके थे, दोनों एक दूसरे के समूल विनाश करने पर तुले थे , ऐसे समय के कोई तीसरा देश इन अवश्यसंभावी शीत -युद्ध रोकने का दुस्साहस कैसे कर सकता था ?
जब इस गुट का निर्माण हुआ तो विरोधी ध्रुवों को यह समझ आया कि आखिर ये देश हम जैसे शक्तिशाली देशों से भिन्न कैसे हैं ? इन्हे अपनी सुरक्षा का खयाल क्यों नहीं है ?, तब जाकर इन्हें अपनी उभरती शक्ति -संकट का भान हुआ कि यह संघटन जो गरीब देशों का समूह है , आखिर ये अपना विकास चाहते है और गरीबी को ख़त्म करना चाहते है तो दूसरी ओर हम (ध्रुवीय -शक्तियाँ ) हैं जो प्रकृति द्वारा प्रदत्त, प्राकृतिक जीवीय रूप मनुष्य , चर -अचर प्राणी के सामूहिक विनाश करने पर तुले है।
क्या यही है ? हमारा पराक्रम दिखाने के चरण-बद्ध प्रक्रिया , तो इन सभी देशों को कहीं न कहीं अपनी गलती का भान हुआ और इन्होने गुट -निरपेक्ष देशों के मंतव्य को समझा जो कि इन शक्तिओं के यथार्थ यानी सत्य, अहिंसा , अपरिग्रह के विचार पर आधारित थी। तब ये इन देशों को मानव-कल्याण, मानवता की बात समझ में आयी जो कि गरीब देशों द्वारा 200 वर्षों की गुलामी करते हुए, कड़े संघर्ष के बाद उपजी थी।
गाँधी जी हमेशा सत्य, अहिंसा, अपरिग्रह ,या फिर हड़ताल को ही जीवन में सफल होने तथा किसी संघर्ष का साकार करने का मूल मंत्र समझते थे। इन सभी देशों ने गाँधीवादी नीतियों को अपनाया , क्योंकि गाँधीवादी नीतियों के कारण ही अंग्रेज देश की सत्ता छोड़ने को विवश हुए। आजादी के आंदोलन के दौरान एक अमेरिकी पत्रकार ने लिखा कि कैसे गाँधी जी "अंग्रेजों को इन्हीं के अस्त्र से इन्हीं को चुनौती देते हैं "
गाँधी जी के मृत्यु के बाद , गाँधी जी का शरीर नष्ट हो गया , लेकिन गाँधीवादी वचन व उनकी प्रासंगिता आज भी कायम है और जो देश, देश की विश्व राजनितिक परिदृश्य पर उभरकर ,दूसरे देश को विध्वंस करने की राह पर चलेंगे , तब-तब गांधीवादी शांति-अहिंसा की नीति ही , ऐसे देशों को शांति के मार्ग पर चलने के लिए रास्ता दिखाएगी , क्योंकि आज के समय में युद्ध के पश्चात् कोई भी विजेता व अविजेता नहीं रहेगा , अंततः समूल मानवता का विनाश होगा , यानी महाविनाश जिसके बाद पश्चताप करने वाला भी कोई भी शुभ चिंतक नहीं होगा ।
ऐसी स्थिति पूर्व संकट से निपटने में भारतीय दर्शन गीता ,गाँधीवादी दर्शन ही , जिनका उद्भव ही समस्त लोक कल्याण के लिए हुआ है , विश्वपरिप्रेक्ष्य जगत में मानव-कल्याण का दर्शन ही ऐसी स्थिति में सही -दिशा दिखा सकती है और इस तरह के महा-विध्वंस को रोक सकती है। अतएव हमें इन संदर्भो , इन मतों का व्यवहारिक अवलोकन करना चाहिए कि क्या गुटनिरपेक्ष आंदोलन अपनी प्रासिंगता खो रहा है , संभव है नहीं, क्योंकि जब तक अमीरी -गरीबी से युक्त देश रहेंगे , उन के अंतरगर्त समानता ,विश्बंधुत्व की भावना नहीं पनपेगी , तब तक यह गुट बना रहेगा , क्योंकि इस गुट निर्माण की आधार-शिला इसी प्रकार रखी गई है कि गुट के सभी सदस्य देश एक -दूसरे की सम्प्रभुता का सम्मान करेंगे , आपातकालीन युद्ध जैसे हालात में वैश्विक मंच पर प्रताङित देशों के मुद्दों को उठाएंगे और ऐसे देशों के कल्याण के लिए दूसरे देश सक्षम सहयोग प्रदान करने से नहीं हिचकेंगे।
1991 के सोवियत संघ के विघटन के पश्चात् विश्वसमुदाय एक ध्रुवीय हो गया। इसका मूल कारण इस संघ में शामिल देशों को अलग होना तथा स्वयं को संप्रभु घोषित करना है। कुछ दशक पहले जब पुरे यूरोप में आर्थिक मंदी आयी थी तो उस समय पुरे सोवियतसंघ की अर्थव्यस्था पर आंच नहीं आयी। इसका मूल कारण समाजवादी नीतियों को अपनाना था , जिसका अर्थ था , सब मिलकर चले , सब साथ चले , सबका समान विकास हो , वे सभी नवराष्ट्र निर्माण में अपने सार्थक ज्ञान-कौशल का उपयोग कर सके।
लेकिन आगे लेनिन की साम्यवादी नीति खोखला साबित हुई क्योंकि सोवियत संघ में महामंदी न आने का कारण वहाँ की उपज का लाभांश न होकर , वहां पाए जाने वाले अमूल्य खनिज -संसाधन के लाभांश थे , जिसके कारण यह संघ महामंदी के चपेट में आने से बच गया न की, इसके आर्थिक सुधार जैसी लेनिनवादी नीतियाँ जिम्मेवार थी। सच्चाई तो यह थी कि यहां सबकी सामान आय थी, किसी के नाम से जमीन नहीं थी ,सभी खेती करते थे ,उन्हें अपने आप को दूसरे से श्रेष्ठ कौशल- कला दिखाने का अनुकूलतम परिपथ नहीं मिल पा रहा था , इसलिए अधिकांश श्रमिक उदासी , आलसपन की ओर उन्मुख हुए और वे किम- कर्तव्य मूढ़ हो गए जिसके फलस्वरूप खेत से उत्पादित अच्छे अनाजो की पैकिंग के साथ ही सङे आनाजो की भी पैकिंग कर देते थे। जिससे कि पूरा- पूरा पैकजिंग उत्पाद ख़राब हो जाता था।
ऐसी स्थिति में उसके उत्पादों की गुणवत्ता घटती गई तथा बाजार की मांग में गिरावट आयी तो कृषि- अर्थव्यवस्था से उपजी सरकार की सकल आय भी प्रभावित हुई , परन्तु सरकार ने श्रमिकों के वेतन में कटौती नहीं की वरन उन्हें राजकोषीय खाते से उनकी तनखाह दिए जाने जारी रखा , ऐसे में श्रमिक- बेगार व कामचोर होते गए।
फलतः वे विलासी व मद्यपान करने की ओर उन्मुख हुए तथा उन्हें शराब- सिगरेट- मदिरा-मांस के लत लग चुकी थी , जिससे छुटकारा पाना, उन गरीब श्रमिक लोगों के लिए आसान नहीं था। उस समय चिकित्सीय -शिक्षा पद्धति में इतना विकास नहीं हुआ था, इन लोगों का सरलतम ढंग से इलाज किया जा सके। इस कारण से उन श्रमिक के शारारिक स्वास्थ्य में गिरावट आयी , वे बीमार रहने लगे तथा अल्प - आयु में मृत्यु के शिकार हो गए। कुशल श्रमिक के आभाव के कारण , उत्पाद के गुणवत्ता घटती गई , फलतः राजकोषीय खाते में गिरावट आयी , जिससे सोवितसंघ पर संकट आ गया।
इस संकट का तात्कालिक निवारण , उन्होंने ने अपने खनिज सम्पदा से किया , जिसका पता लगभग सोवियतसंघ के विघटन के पश्चात् एक दशक में हुआ।
तो इस प्रकार के गुटनिरपेक्ष राष्ट्र , फालतू के संघर्ष से बचने में ये शक्तियां यानी 'नाम' इन सब समस्यांओ से निकलने में सफल रही और खुद का ध्यान सिर्फ गरीबी- उन्मूलन , स्वास्थ्य -चिकित्सा-शिक्षा पर ध्यान केंद्रित किया। आज वर्तमान में चलकर ये देश धीरे- धीरे विश्व- अर्थव्यवस्था से ताल -मेल मिलाने में सक्षम हुए है। आज इन देशों का अपना संविधान है और ये देश मानवता- सहिष्णुता , लोक -कल्याण की भावना को ध्येय में रखकर तथा अपने नागरिक समाज के मूल्यों को ध्यान में रखकर विकास परिणिति अनुसन्धान कर रहें हैं।
UPSC सामान्य अध्ययन मुख्य परीक्षा के कुछ महत्वपूर्ण निबंध
क्या गुटनिरपेक्ष आंदोलन (नाम ) एक बहुध्रवीय विश्व में अपनी प्रासंगिकता खो बैठा है ?
गुट -निरपेक्ष की अवधारणा द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद रखी गई , जब कुछ देश कुछ औपनिवेशिक देशों की गुलामी कर रहे थे। यह वह समय था ,जब फ्रांस ,ब्रिट्रेन ,स्पेन, पुर्तगाल जैसे देशों का क्षेत्राधिकार ,बहु- महाद्धीपीय क्षेत्रों तक फैल चूका था। साम्राज्वाद के विस्तार की लड़ाई में , वे एक दूसरे से कई स्थानों पर भिड़े ,कई संधिया की , इसके बावजूद इन देशों की क्षेत्रीय विस्तार की राजनीतिक-रणनीति जारी रही। इन सब के क्षेत्रीय फैलाव का कारण ही प्रथम विश्व युद्ध हुआ , उसके बाद फिर द्वितीय विश्वयुद्ध।
द्वितीय विश्वयुद्ध के परिणिति के पश्चात दो दि- ध्रुवीय शक्तियों का उदय हुआ , जिसमे एक था अमेरिका दूसरा सोवियत संघ।इसके पश्चात् अब समस्त विश्व - समुदाय संकट -संतुलन की भावना से असहज था कि वे जाये ,तो किधर जाए , इधर कुआँ , उधर खाईं।
ऐसी स्थिति में वे सब इस आत्ममंथन में पङ गए कि अब हम सब गरीब देशों, विकासशील व अल्पविकसित देशों का क्या होगा ? जोकि द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद अभी- अभी हाल- फिलहाल में आजाद हुए हैं , तो इन सभी देशों ने मिलकर इस संकट का समाधान करने के लिए एक युक्ति निकाली, जिसमे युगोस्लोवाकिया , मिस्र ,भारत, घाना जैसे देश शामिल थे। इन देशों के प्रतिनिधित्व करने वाले नेताओं जैसे - सुकर्णो , टीटो , नासिर , नेहरू , करूमशाह ने मिलकर एक सम्मेलन में बात-विमर्श के बाद इस तथ्य पर पहुँचे कि इन्हे ऐसी विश्व-व्यवस्था का निर्माण करना चाहिए जो आपसी सहअस्तित्व , लोककल्याण की मंगलमय की भावना के सपने को समेटे हुए हो ,जिसमें सामाजिक उदारता हो, समरसता हो , जिससे सामाजिक- सहिष्णुता और विश्व-बंधुत्व की संस्कृति विकसित किया जा सके । आखिर में इन देशों ने मिलकर जो युक्ति निकाली ,उन्होंने इसका नाम 'नाम '(NAM ) दिया गया जो कि भारतीय भाषा में गुटनिरपेक्ष आंदोलन (NON ALIGNMENT ) के रुप में जग प्रसिद्ध है।
विश्व-शक्तिसंतुलन में अव्यवस्थित होने वाले ये देश जो अपने आप को किसी ध्रुव में नहीं रखना चाहते थे , उन्होंने इस गुट -निरपेक्ष आंदोलन में सहर्ष स्वतः सदस्य बनना स्वीकार्य किया। शुरू -शुरू में अपने प्रजनन काल की आरम्भिक चरण में इसमें 20 -25 देश ही शामिल हुए। उसके कुछ समय पश्चात अन्य देशों ने भी "नाम" के महत्व को समझकर और देश भी जुड़े, वर्तमान में जाकर इसकी सदस्य संख्या बढ़कर 120 तक हो गई है।
जब इस गुट का निर्माण हुआ तो विरोधी ध्रुवों को यह समझ आया कि आखिर ये देश हम जैसे शक्तिशाली देशों से भिन्न कैसे हैं ? इन्हे अपनी सुरक्षा का खयाल क्यों नहीं है ?, तब जाकर इन्हें अपनी उभरती शक्ति -संकट का भान हुआ कि यह संघटन जो गरीब देशों का समूह है , आखिर ये अपना विकास चाहते है और गरीबी को ख़त्म करना चाहते है तो दूसरी ओर हम (ध्रुवीय -शक्तियाँ ) हैं जो प्रकृति द्वारा प्रदत्त, प्राकृतिक जीवीय रूप मनुष्य , चर -अचर प्राणी के सामूहिक विनाश करने पर तुले है।
क्या यही है ? हमारा पराक्रम दिखाने के चरण-बद्ध प्रक्रिया , तो इन सभी देशों को कहीं न कहीं अपनी गलती का भान हुआ और इन्होने गुट -निरपेक्ष देशों के मंतव्य को समझा जो कि इन शक्तिओं के यथार्थ यानी सत्य, अहिंसा , अपरिग्रह के विचार पर आधारित थी। तब ये इन देशों को मानव-कल्याण, मानवता की बात समझ में आयी जो कि गरीब देशों द्वारा 200 वर्षों की गुलामी करते हुए, कड़े संघर्ष के बाद उपजी थी।
गाँधी जी हमेशा सत्य, अहिंसा, अपरिग्रह ,या फिर हड़ताल को ही जीवन में सफल होने तथा किसी संघर्ष का साकार करने का मूल मंत्र समझते थे। इन सभी देशों ने गाँधीवादी नीतियों को अपनाया , क्योंकि गाँधीवादी नीतियों के कारण ही अंग्रेज देश की सत्ता छोड़ने को विवश हुए। आजादी के आंदोलन के दौरान एक अमेरिकी पत्रकार ने लिखा कि कैसे गाँधी जी "अंग्रेजों को इन्हीं के अस्त्र से इन्हीं को चुनौती देते हैं "
गाँधी जी के मृत्यु के बाद , गाँधी जी का शरीर नष्ट हो गया , लेकिन गाँधीवादी वचन व उनकी प्रासंगिता आज भी कायम है और जो देश, देश की विश्व राजनितिक परिदृश्य पर उभरकर ,दूसरे देश को विध्वंस करने की राह पर चलेंगे , तब-तब गांधीवादी शांति-अहिंसा की नीति ही , ऐसे देशों को शांति के मार्ग पर चलने के लिए रास्ता दिखाएगी , क्योंकि आज के समय में युद्ध के पश्चात् कोई भी विजेता व अविजेता नहीं रहेगा , अंततः समूल मानवता का विनाश होगा , यानी महाविनाश जिसके बाद पश्चताप करने वाला भी कोई भी शुभ चिंतक नहीं होगा ।
ऐसी स्थिति पूर्व संकट से निपटने में भारतीय दर्शन गीता ,गाँधीवादी दर्शन ही , जिनका उद्भव ही समस्त लोक कल्याण के लिए हुआ है , विश्वपरिप्रेक्ष्य जगत में मानव-कल्याण का दर्शन ही ऐसी स्थिति में सही -दिशा दिखा सकती है और इस तरह के महा-विध्वंस को रोक सकती है। अतएव हमें इन संदर्भो , इन मतों का व्यवहारिक अवलोकन करना चाहिए कि क्या गुटनिरपेक्ष आंदोलन अपनी प्रासिंगता खो रहा है , संभव है नहीं, क्योंकि जब तक अमीरी -गरीबी से युक्त देश रहेंगे , उन के अंतरगर्त समानता ,विश्बंधुत्व की भावना नहीं पनपेगी , तब तक यह गुट बना रहेगा , क्योंकि इस गुट निर्माण की आधार-शिला इसी प्रकार रखी गई है कि गुट के सभी सदस्य देश एक -दूसरे की सम्प्रभुता का सम्मान करेंगे , आपातकालीन युद्ध जैसे हालात में वैश्विक मंच पर प्रताङित देशों के मुद्दों को उठाएंगे और ऐसे देशों के कल्याण के लिए दूसरे देश सक्षम सहयोग प्रदान करने से नहीं हिचकेंगे।
1991 के सोवियत संघ के विघटन के पश्चात् विश्वसमुदाय एक ध्रुवीय हो गया। इसका मूल कारण इस संघ में शामिल देशों को अलग होना तथा स्वयं को संप्रभु घोषित करना है। कुछ दशक पहले जब पुरे यूरोप में आर्थिक मंदी आयी थी तो उस समय पुरे सोवियतसंघ की अर्थव्यस्था पर आंच नहीं आयी। इसका मूल कारण समाजवादी नीतियों को अपनाना था , जिसका अर्थ था , सब मिलकर चले , सब साथ चले , सबका समान विकास हो , वे सभी नवराष्ट्र निर्माण में अपने सार्थक ज्ञान-कौशल का उपयोग कर सके।
लेकिन आगे लेनिन की साम्यवादी नीति खोखला साबित हुई क्योंकि सोवियत संघ में महामंदी न आने का कारण वहाँ की उपज का लाभांश न होकर , वहां पाए जाने वाले अमूल्य खनिज -संसाधन के लाभांश थे , जिसके कारण यह संघ महामंदी के चपेट में आने से बच गया न की, इसके आर्थिक सुधार जैसी लेनिनवादी नीतियाँ जिम्मेवार थी। सच्चाई तो यह थी कि यहां सबकी सामान आय थी, किसी के नाम से जमीन नहीं थी ,सभी खेती करते थे ,उन्हें अपने आप को दूसरे से श्रेष्ठ कौशल- कला दिखाने का अनुकूलतम परिपथ नहीं मिल पा रहा था , इसलिए अधिकांश श्रमिक उदासी , आलसपन की ओर उन्मुख हुए और वे किम- कर्तव्य मूढ़ हो गए जिसके फलस्वरूप खेत से उत्पादित अच्छे अनाजो की पैकिंग के साथ ही सङे आनाजो की भी पैकिंग कर देते थे। जिससे कि पूरा- पूरा पैकजिंग उत्पाद ख़राब हो जाता था।
ऐसी स्थिति में उसके उत्पादों की गुणवत्ता घटती गई तथा बाजार की मांग में गिरावट आयी तो कृषि- अर्थव्यवस्था से उपजी सरकार की सकल आय भी प्रभावित हुई , परन्तु सरकार ने श्रमिकों के वेतन में कटौती नहीं की वरन उन्हें राजकोषीय खाते से उनकी तनखाह दिए जाने जारी रखा , ऐसे में श्रमिक- बेगार व कामचोर होते गए।
फलतः वे विलासी व मद्यपान करने की ओर उन्मुख हुए तथा उन्हें शराब- सिगरेट- मदिरा-मांस के लत लग चुकी थी , जिससे छुटकारा पाना, उन गरीब श्रमिक लोगों के लिए आसान नहीं था। उस समय चिकित्सीय -शिक्षा पद्धति में इतना विकास नहीं हुआ था, इन लोगों का सरलतम ढंग से इलाज किया जा सके। इस कारण से उन श्रमिक के शारारिक स्वास्थ्य में गिरावट आयी , वे बीमार रहने लगे तथा अल्प - आयु में मृत्यु के शिकार हो गए। कुशल श्रमिक के आभाव के कारण , उत्पाद के गुणवत्ता घटती गई , फलतः राजकोषीय खाते में गिरावट आयी , जिससे सोवितसंघ पर संकट आ गया।
इस संकट का तात्कालिक निवारण , उन्होंने ने अपने खनिज सम्पदा से किया , जिसका पता लगभग सोवियतसंघ के विघटन के पश्चात् एक दशक में हुआ।
तो इस प्रकार के गुटनिरपेक्ष राष्ट्र , फालतू के संघर्ष से बचने में ये शक्तियां यानी 'नाम' इन सब समस्यांओ से निकलने में सफल रही और खुद का ध्यान सिर्फ गरीबी- उन्मूलन , स्वास्थ्य -चिकित्सा-शिक्षा पर ध्यान केंद्रित किया। आज वर्तमान में चलकर ये देश धीरे- धीरे विश्व- अर्थव्यवस्था से ताल -मेल मिलाने में सक्षम हुए है। आज इन देशों का अपना संविधान है और ये देश मानवता- सहिष्णुता , लोक -कल्याण की भावना को ध्येय में रखकर तथा अपने नागरिक समाज के मूल्यों को ध्यान में रखकर विकास परिणिति अनुसन्धान कर रहें हैं।
UPSC सामान्य अध्ययन मुख्य परीक्षा के कुछ महत्वपूर्ण निबंध
Has the Non-Alignment Movement (NAM) Lost its Revalance in Multipolar World ? क्या गुटनिरपेक्ष आंदोलन (नाम ) एक बहुध्रवीय विश्व में अपनी प्राथमिकता खो बैठा है ?
Joy is the Simplest form of Gratitude. हर्ष कृतज्ञता का सरलतम रूप है।
विज्ञान व रहस्यवाद क्या संगत है।
निबंध बनाम आवश्यकता
Imapact of the new economic measures of fiscal ties between the union and states in india. भारत में संघ और राज्यों के बीच राजकोषीय संबंधो पर नए आर्थिक प्रभाव
Joy is the Simplest form of Gratitude. हर्ष कृतज्ञता का सरलतम रूप है।
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Hay Pundreek,
ReplyDeleteThis is a really knowledgeable .
According to me NAM was good for India . the way it supposed to lead that was not happened , thats reason economy crisis happened in India 1992. The present GOV are doing good in terms of NAM , example , Arab country, Rasia, US, Israel . India looking only Benefits . not worry about other