Paris climate treaty : A toughest route, पेरिस जलवायु संधि : एक कठिन डगर


 पैरिस क्लाइमेट संधि अब लागू होने वाला ही है लेकिन इसका पर्याप्त समर्थन नहीं मिल पा रहा है जो इसके कार्यान्वयन के लिए जरूरी है। यूरोपीय यूनियन द्वारा इसे हरी झंडी दे दी गई है जिससे इसको लागू होने का रास्ता साफ हो गया है ।

भारत ने भी विगत 2 अक्टूबर को पेरिस जलवायु समझौते का अनुमोदन कर दिया है । यह समझौता कानूनी तौर पर तभी लागू हो सकेगा, जब कम से कम 55 ऐसे देश पेरिस जलवायु समझौते का अनुमोदन कर देगें ,  जिनकी वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में 55% भागीदारी हो ।

कई देश के नेताओं द्वारा इस समझौते में मिलने वाले अनुमोदन पर खुशी जाहिर की है । भारत इस समझौते में शामिल होने वाला 62 वां देश बन गया है । वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में भारत की भागीदारी 4.5% है , इस समझौते के तहत भारत 2050 तक 40% बिजली गैर-जीवाश्म-ईंधन स्रोतों से उत्पन्न करने के लिए प्रतिबद्ध होगा ।

इससे पहले विश्व के दो बड़े उत्सर्जक देश अमेरिका और चीन ने पेरिस समझौते का औपचारिक अनुमोदन किया था। वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में इन दोनों देशों की 40% हिस्सेदारी है ।जर्मनी ने विगत 23 दिसंबर को समझौते का अनुमोदन कर दिया था । लेकिन यूरोपीय संघ के अनुसार लगभग 12% कार्बन उत्सर्जन के लिए जिम्मेदार यूरोपीय देशों को एक गुट के रूप में अपना अनुमोदन जमा करने के लिए सभी 28  सदस्य देशों की मंजूरी जरूरी थी।

 पेरिस समझौते के तहत वैश्विक जलवायु परिवर्तन ( तापमान वृद्धि ) को दो डिग्री सेल्सियस से नीचे रखने का लक्ष्य रखा गया है और इसे 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने का प्रयास करना है । इस समझौते के मुताबिक जितनी जल्दी हो सके , हरित गृह उत्सर्जन की उच्चतम सीमा हासिल करना है।हर 5 साल में इस समझौते की समीक्षा की जानी है। इस समझौते के तहत 2020 तक विकासशील देशों को पर्यावरण के लिए $100 अरब की मदद दिया जाना है और भविष्य में भी वित्तीय मदद के लिए प्रतिबद्ध रहना है।

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