महात्मा गांधी के शैक्षिक दर्शन से प्रशस्त होगा स्वावलंबी भारत के निर्माण का मार्ग


फैकल्टी डेवलपमेन्ट सेन्टर, ईश्वर शरण पी0जी0 काॅलेज द्वारा ‘‘एजुकेशनल फिलाॅसफी आफ महात्मा गांधी: ए रोडमैप टू नेशन बिल्डिंग विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का समापन सत्र दिनांक 28 फरवरी 2020 को सम्पन्न हुआ। समापन सत्र के मुख्य वक्ता आर्यभट्ट विश्वविद्यालय, पटना के शिक्षा विद्या शाखा के अधिष्ठाता प्रो0 जी0एम0 त्रिपाठी ने अपने उद्बोधन में स्पष्ट किया कि गांधी ने सर्वप्रथम 1909 में हिन्द स्वराज में अपना शैक्षिक दर्शन प्रस्तुत किया, जिसके तीन आधार हैं- 1. ज्ञान कौशल पर आधारित हो, 2. सीखना परिवेश से सम्पृक्त हो, 3. ज्ञान की विषयवस्तु क्या हो? उनके अनुसार गांधी की शिक्षा व्यवस्था में बच्चे और बचपन की सुरक्षा प्राथमिक है। बच्चे को परिवेश के आधार पर शिक्षा देने के लिए उसकी भाषा का सम्मान आवश्यक है।

 गांधी सभी भाषाओं को समान मानते थे। गांधी के अनुसार भाषायें भूगोल के आधार पर लघु या व्यापक होती हैं। गांधी अपने शैक्षिक दर्शन में काम की दुनिया और ज्ञान की दुनिया के अंतर को समाप्त करती हुई काम की दुनिया से निःसृत ज्ञान को ही वास्तविक ज्ञान मानते हैं। गांधी का विचार था कि शिक्षा की विषयवस्तु रटाने वाली नहीं होना चाहिए, क्योंकि यह बाल मन पर विषयवस्तु को सदैव बाल मन की लयानुकूल होना चाहिए, जिसे बच्चे स्वतः ग्राह्य कर सकें। विषयवस्तु का शिक्षण अनिवार्यतः मातृभाषा में ही होना चाहिए। प्रो0 त्रिपाठी के अनुसार गांधी के शैक्षिक विचार, भारतीय शिक्षा ढांचे को औपनिवेशिकता से मुक्त कर स्वावलंबी भारत के निर्माण की प्रस्तावना है।

सत्र के सम्मानित वक्ता काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी के दर्शनशास्त्र विभाग के प्रो0 डी0बी0 दुबे ने प्रबोधित किया कि गांधी की दृष्टि में शिक्षा, चरित्र और ईमानदारी का पर्याय है, जो हमें भोगलिप्सा से मुक्त कर संयमित बनाये वही शिक्षा है। द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में गांधी ने निर्भयतापूर्वक उद्घोष किया कि अंग्रेजों के आगमन के पूर्व भारत कहीं अधिक साक्षर था। प्राचीन भारतीय शिक्षा पद्धति अधिक उच्च कोटि की थी, जो कि श्रम प्रधान थी। गांधी ने शिक्षा और श्रम को अन्योन्याश्रित माना। गांधी ने शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक और आध्यात्मिक चारों तत्वों के समावेशी विकास पर आधारित शिक्षा व्यवस्था की स्थापना का प्रयास किया। गांधी के अनुसार शिक्षा का उद्देश्य आत्मज्ञान निर्माण होना चाहिए। वस्तुतः गांधी का शैक्षिक दर्शन भोग, त्याग, समन्वय पर अवलम्बित है।

सत्र के अध्यक्ष और महाविद्यालय के पूर्व प्राचार्य प्रो0 जे0एस0एल0 श्रीवास्तव ने अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में उद्भूत किया कि गांधी के विचारों को लेकर हम सबके मन में हमेशा द्वन्द्व ही बना रहा है चाहे वह सकारात्मक हो या नकारात्मक। जहाँ तक उनके शैक्षिक विचारों की बात की जाय तो सिद्धांत रूप से तो उनकी बड़ी छवि के नीचे सारे विचारों को जस का तस स्वीकार तो कर लिया गया, परन्तु उनका व्यवहारिक प्रयोग किया जाना अभी शेष है। गांधी के शैक्षिक दर्शन का मूल मंत्र शोषणविहीन समाज की स्थापना करना था, क्योंकि शिक्षा के अभाव में एक स्वस्थ समाज का निर्माण असम्भव है।

इसके पूर्व समापन सत्र का प्रारम्भ समस्त अतिथियों के क्रोटन पादप, अंगवस्त्र और स्मृति चिह्न द्वारा सम्मान के साथ हुआ। समापन सत्र के समन्वयक डाॅ0 धीरज चैधरी थे। संगोष्ठी रपट वाचन डाॅ0 हर्षमणि सिंह ने किया। इस अवसर पर महाविद्यालय के समस्त शिक्षकों, कर्मचारियों एवं विद्यार्थियों के अतिरिक्त इलाहाबाद विश्वविद्यालय, संघटक महाविद्यालयों के विभिन्न शिक्षक और देश के सुदूर क्षेत्रों से आये विभिन्न प्रतिभागी उपस्थित थे। कार्यक्रम का मंच संचालन डाॅ0 रश्मि जैन और धन्यवाद ज्ञापन डाॅ0 धीरज कुमार चौधरी ने किया।

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