विश्व विरासत दिवस :- साझा संस्कृति, साझा विरासत, साझा जिम्मेदारी









मानव विरासत को संरक्षित करने और संबंधित संगठनों के सभी प्रयासों को मान्यता देने के लिए विश्व विरासत दिवस प्रत्येक वर्ष 18 अप्रैल को मनाया जाता है। 1982 में अंतर्राष्ट्रीय स्मारक और स्थल परिषद (ICOMOS) ने आज के दिन को हेरिटेज डे के रूप में घोषित किया तथा इसे 1983 में यूनेस्को की आम सभा द्वारा अनुमोदित किया गया था, जिसका उद्देश्य सांस्कृतिक विरासत, स्मारकों के महत्व के बारे में जन सामान्य में जागरूकता बढ़ाना और उनका संरक्षण करना था। इस वर्ष वैश्विक कोविद -19 प्रकोप के साथ, संगठन ने ऑनलाइन गतिविधियों के माध्यम से विरासत दिवस को मनाने के लिए उपाय सुझाए हैं। हम अपनी साझा सांस्कृतिक विरासत के बारे में जागरूकता फैलाकर उन लोगों को शिक्षित कर सकते हैं जो हमारे पास मौजूद समृद्ध सांस्कृतिक इतिहास से अनजान हैं। वर्ष 2020 का थीम है "साझा संस्कृति, साझा विरासत, साझा जिम्मेदारी "। मौजूदा वैश्विक संकट के सामने,, साझा संस्कृति, साझा विरासत, साझा जिम्मेदारी ’का विषय और भी प्रासंगिक हो जाता है।
 विश्व विरासत के स्थल किसी भी राष्ट्र की सभ्यता और उसकी प्राचीन संस्कृति के महत्त्वपूर्ण परिचायक माने जाते हैं। भारत में यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थल की कुल संख्या 37 (1 मिश्रित, 7 प्राकृतिक और 29 सांस्कृतिक) हैं। आजादी के पूर्व के कानूनों के अतिरिक्त देश की ऐतिहासिक धरोहरों को संरक्षित रखने के लिए 1958 में प्राचीन स्मारक तथा पुरातत्व स्थल एवं अवशेष अधिनियम पास किया गया। इसके बाद इससे जुड़ा एक और कानून आया, जो 1972 में पुरातत्व और बहुमूल्य कलाकृति अधिनियम के नाम से जाना गया। स्मारकों का प्राकृतिक रूप से क्षरण होना तो आम बात है, लेकिन मानव द्वारा भी उसे विभिन्न तरीकों से निरंतर नुकसान पहुँचाया जा रहा है। स्मारकों का क्षरण बड़े पैमाने पर पर्यटकों के आवाजाही एवं जलवायु परिवर्तन के कारण भी हो रहा है। आजादी के समय हमारे देश में ऐतिहासिक महत्व की जितनी इमारतें थीं, आज उनकी संख्या में अच्छी-खासी कमी आ चुकी है।
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण व  राज्य पुरातत्व विभागों की समस्या यह है कि ऐतिहासिक इमारतों पर होने वाले अतिक्रमण का सामना वह कैसे करे? उसके पास न तो कोई दंडात्मक अधिकार हैं न अतिक्रमण हटाने में सक्षम सरकारी मशीनरी। स्मार्ट सिटी तथा सड़क चौड़ीकरण योजना नाम पर भी सैकड़ो ऐतिहासिक इमारतों को ढहाकर इतिहास मिटाया जा रहा है। अनगिनत असंरक्षित व असूचीबद्ध स्मारकों के विषय में स्पष्ट कानून न होने के कारण ये  महत्वपूर्ण इमारतें निरंतर काल के गाल ने समाती जा रहीं हैं।
 सरकार को संरक्षण से संबंधित विभिन्न कानूनों एवं नीतियों को कठोरता से लागू करना चाहिए तथा भारत के करोड़ो असंरक्षित स्मारकों के विषय में स्पष्ट कानून बनाकर उन्हें संरक्षित व सूचीबद्ध करना चाहिये। जिस तरह ऐतिहासिक इमारतों के निर्माण में आम आदमी की भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता है उसी तरह इस तथ्य को भी अस्वीकार नहीं किया जा सकता कि ऐतिहासिक धरोहर के संरक्षण में आम आदमी की भागीदारी बहुत आवश्यक है। इसलिए ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण का सिद्धांत सहभागिता के आधार पर ही बनना चाहिए।






विचार लेखन - डा. जमील अहमद
असिस्टेंट प्रोफ़ेसर, प्राचीन इतिहास संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग, 
ईश्वर शरण पोस्ट ग्रेजुएट कालेज, इलाहाबाद
(संघटक महाविद्यालय, इलाहाबाद विश्वद्यालय, इलाहाबाद)







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