Imapact of the new economic measures of fiscal ties between the union and states in india. भारत में संघ और राज्यों के बीच राजकोषीय संबंधो पर नए आर्थिक प्रभाव
निबंध-३
भारत में संघ और राज्यों के बीच राजकोषीय संबंधो पर नए आर्थिक प्रभाव
देश में अंग्रेजी हुकूमत ने छोटे - छोटे राजाओं के भूभागों को जीत कर , उन पर अपना अधिकार किया। फिर कुछ बड़े राज्य जीते , इसमें अवध ,पंजाब , त्रावणकोर , मैसूर , हैदराबाद , कर्नाटक , सिंध आदि प्रान्त थे। 1919 में प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान ही ब्रिट्रिश हुकूमत कमजोर पड़ने लगी थी और भारत के राजनेता लोग अपने आंदोलन को को तीव्र कर अपने अधिकार तथा जनता के अधिकार में बढ़ोत्तरी की मांग कर रहे थे। जिससे अंग्रेजी हुकूमत पर राजनीतिक दबाव बढ़ता जा रहा था , अंग्रेजो ने धीरे - धीरे राज्यों का एकीकरण किया और उन अपना अधिकार कर लिया। राज्य के शासक धीरे - धीरे कमजोर होते गए और उनकी स्वायत्तता , सम्प्रभुता ब्रिट्रिश प्रशासन के आगे नतमस्तक हो गई थी।
जनता में धीरे - धीरे अपने राजा के स्वाभिमान गिरा हुआ देखकर , अपने आप को ब्रिट्रिश हुकूमत के प्रति नतमस्तक पाती थी। जनता में अपनी दबी हुई , आत्मसम्मान की पराकाष्ठा धीरे- धीरे उद्द्वेलित होती जा रही थी , उनको विद्रोह की झलक यदा - कदा दिखाई दे रही थी। चाहे काकोरिकांड हो या फिर जलियावालाबाग हत्याकाण्ड , अंग्रेजी सरकार की बगावती नीति , भारतीय नागरिको को क्रन्तिकारी बनने की ओर धकेल रही थी। जैसे - जैसे ब्रिट्रिश हुकूमत प्रथम विश्वयुद्ध के बाद कमजोर होती जा रही थी , ठीक उसी प्रकार द्वितीय विश्वयुद्ध की ओर वह उन्मुख हो रहा था। जिसके कारण भारतीय क्रान्तिकारियो व उदारवादी नेताओ , उग्र नेताओ के दबाव में ब्रिट्रिश सरकार झुकती जा रही थी और धीरे -धीरे अपने मंत्रिमंडल में भारतीय प्रतिनिधियों को प्रतिनिधित्व देने की ओर अग्रसर हो रही थी।
भारत शासन अधिनियम , 1935 इन्ही का परिणाम था जो के राज्यों व केंद्र के बीच सहकारी संघवाद की भावना पर केंद्रित था। इस अधिनियम के तहत राज्यों में द्वैध शासन का अंत किया गया और केंद्र को अधिक मजबूत बनाया गया और राज्यों को स्वायत्तता का भी ध्यान रखा गया। समवर्ती सूची , संघ सूची , राज्य सूची जैसे विषय बनाये गए। राज्य सूची जैसे विषय पर राज्यों को पूर्ण अधिकार दिया गया जैसे - शिक्षा , चिकित्सा , पुलिस , राज्यकर आदि। समवर्ती सूची में वे विषय डाले गए जो कि या जिन पर राज्य सरकार व केन्द्र सरकार दोनों नियम- कानून या फिर कर जैसे प्रावधान कर सकती थी। लेकिन राज्य व केंद्र सरकार के कानून के अतिव्यापन की स्थिति में केंद्र सरकार को राज्य की तुलना में सविधान ने अधिक शक्तिशाली बनाया था । समवर्ती सूची के अंतर्गत - शिक्षा ,मनोरंजन कर , प्रत्यक्ष कर जैसे विषय शामिल थे । संघ - सूची के अंतर्गत जो विषय है उनके बारे में नियमन केंद्र सरकार बना सकती थी और उन्हें लागु कर सकती थी , रेलवे , डाक , संचार , शोध जैसे विषय इसके अंतर्गत चयनित थे।
वित्त का बंटवारा करने के लिए संविधान में वित्त आयोग की स्थापना का प्रावधान है जो कि केंद्र की प्राप्त आय में से राज्यों को धन का संवितरण करता है , वित्त आयोग का गठन संविधान के अनुच्छेद 280 के अन्तरगत हुआ है। अनुच्छेद 280 राज्यों के बीच उनके उपागमों जैसे शिक्षा - चिकित्सा , गरीबी , बेरोजगारी ,विकास के आधार पर धन का वितरण करता है। देश की आजादी के समय जहाँ केंद्र अपने राजकोष से राज्यों को 23 प्रतिशत तक धन का वितरण करता था , आज वह राशि बढ़ाकर 40, 60 के अनुपात में हो गई है। अब केंद्र सरकार राज्यों में धन वितरण हेतु अगले वर्ष को ध्यान में रखकर वित्त आयोग का गठन करती है। 1991 की जनगणना के आधार पर 13वें वित्त आयोग का गठन किया गया था जिसके अध्यक्ष वाईए रेड्डी थे , इन्होने अपनी रिपोर्ट नयी वित्तीय वर्ष के प्रारम्भ होने पर दी थी।
इस आयोग ने राज्यों के प्रति गरीबी , अमीरी , रोजगार , विकास , कुपोषण के पैमाने को ध्यान में रखकर तथा गहन अन्वेषण कर रिपोर्ट तैयार की। इसमें कुछ राज्य जैसे - छत्तीसगढ़ , बिहार , पूर्वीउत्तर प्रदेश, झारखण्ड ओडिशा तथा पूर्वात्तर के राज्यों को कम विकासशील राज्य माना , जहाँ पर प्रचूर संसाधन तो थे , पर उन संसाधन का उचित दोहन का लाभ विकसित राज्यों में रहने वाले लोगों को मिला। वे लोग वैसे ही रह गए जैसे थे , कहते हैं "चिराग तले अँधेरा ही होता है ", यही कहावत चरितार्थ होती है। इन प्रदेशों के आदिवासी लोग आज भी अपने पूर्वजों द्वारा प्रसंस्कृत जीवन व्यतीत कर रहें हैं और उन्हीं ढर्रों पर चल रहें हैं। इनका सामाजिक ताना - बाना आधुनिक जगत की दुनिया से कटा हुआ है , आखिर ये कब तक प्रगति पथ पर दौड़ेंगे।
आज जब आधार कार्ड की अनिवार्यता सरकार द्वारा थोपी जा रही है , तो इसके अनिवार्यता ने आदिवासी समूह में रहने वाले लोगो का जीवन दूभर कर दिया है। ये जाए तो कहाँ जाएँ , जब आधार कार्ड या फिर अन्य गतिविधियाँ सरकार द्वारा की जाती है तो वे इन क्रिया - विधियों को समझ नहीं पाते जिससे उन्हें अनेक समस्याओ से को दो - चार होना पङना परता है। स्थति तब भयावह हो जाती है जब आधार कार्ड न होने पर आदिवासी भाइयों को कोटेदार द्वारा अनाज तक नहीं दिया जाता , इससे कई आदिवासी लोग अन्न के अभाव के कारण मृत्यु का शिकार हो जाते हैं।
इसके अलावां दूसरा कारण वनाधिकार अधिनियम भी है , इसके आ जाने से अब वनवासी वन में नहीं रह सकते , जैसे वन पर उनका अधिकार न होकर सरकार का हो गया है। वे किस पर जिए , वे एक तरफ आधुनिक खेती के ज्ञान से अपरिचित हैं तो दूसरी तरफ पैसे का अभाव व गरीबी के कारण खेत के बुवाई के बीज तथा उवर्रक खरीदने में अक्षम हैं। " किं आधिक्यं (अधिक क्या कहा जाय ?) ? " तो इस प्रकार उनकी यह मज़बूरी या फिर दुश्वार जीवन को कैसे सरल बनाया जा सकता है।
उनके बच्चे स्कूल आज भी इसलिए जातें हैं कि सरकार द्वारा संचालित विद्द्यालयों में परोसी जाने वाली भोजन मिड -डे - मील की एक खुराक मिल सके। "क्या यही संघवाद है " जिसने राज्यों को कमजोर बनाकर , केंद्र सरकार को अधिक शक्तिशाली होने का ताबूत ठोकती है , कैसी यह विडंबना है और कैसा है यह भारत का संघवाद और भारत शासन अधिनियम ,1935.
जैसे - जैसे देश आधुनिकता की दौर में प्रवेश कर रहा है, वैसे -वैसे सामाजिकता से कटे लोगों का जीवन विषय समाज- संगत न होकर , एकाकीपन की ओर जा रहा है। क्या जंगल में लकड़ी काटने वाले या फिर जानवर का शिकार करने वाले आदिवासी पर गोली चलाने का अधिकार वनवासी कानून में बनाया जाना चाहिए। क्या वे आदिवासी अपनी मौत के इन कारणों के लिए जिम्मेवार हैं ? जिन्हें यह तनिक भी भान नहीं कि उनके साथ , इस किये कृत्य के क्या परिणाम हो सकते हैं , जिसके लिए उन्हें मृत्यु की कीमत चुकानी पड़ती है।
इस कृत्य के लिए जिम्मेदार व बेईमान वे लोग हैं , जो इन लोगों को ऐसा कृत्य करने के लिए मजबूर करते हैं , इसमें आदिवासी जैसे समुदाय के लोगो का क्या कसूर।
14वें वित्त आयोग का गठन एन. के. सिंह की अध्यक्षता में किया गया है। इन्होंने राज्यों में घूमकर वहां कि स्थिति जानकर , राज्यों में अधिक से अधिक धनराशि ,के वितरण की केंद्र सरकार के समक्ष संस्तुति की , जिसमें से सरकार ने अधिकांश संस्तुतियों को मान लिया , इस समिति ने 50 प्रतिशत 1971 की जनगणना तथा 50 प्रतिशत 2011 की जनगणना को ध्यान में रखकर प्रतिवेदन तैयार किया , जिसमें अधिक जनसँख्या वाले , अधिक पिछड़े राज्यों पर अधिक ध्यान केंद्रित किया गया है क्योंकि ऐसे राज्यों के अधिकांश लोगों के जीविका के संसाधन कृषि है जिसमें पुरे परिवार के लोग खेतों में काम करते दिखाई देते हैं , जो कि प्रच्छन बेरोजगारी के शिकार लोग हैं।
आजादी के बाद के सरकारों ने नीतियों को बनाने के लिए विदेशी विद्द्यानों का आयात किया जाता था जो कि ऑक्सफ़ोर्ड , कैम्ब्रिज जैसे विश्वविद्द्यालयों से पढ़कर आते थे, लेकिन उनके द्वारा तैयार की गई रिपोर्ट ठाक के तीन पात के बराबर ही रहीहै , जिसमे किसी का भला नहीं हुआ। गरीब- गरीब ही रहता चला गया और अमीर और अमीरी राह पर। समझ में नहीं आता , हमारे नेता जो हमारे देश -प्रांतर से चुनकर जाते हैं , उन्हें अपने देश द्वारा उत्पन्न शिक्षित विद्वानों पर विश्वास क्यों नहीं करते।
आखिर उन्हें अपने से ज्यादा विदेशी विद्वानों पर ज्यादा भरोसा क्यों होता है , जिनको देश की गुणा - गणित का भान नहीं होता , वे लोग भारत की डी. पी. आर (डिटेल प्रोग्रेसिव रिपोर्ट) तैयार करते हैं। यह हमारे लिए शर्म की बात है कि कैसा दुनिया का नेतृत्व देने वाला देश भारत, अपने ही ज्ञान-कौशल के आभाव में अपने को निकृष्टम मानकर विदेशी सेवा लेने में गुरेज नहीं कर रहा है , ब्लकि उसमें अपने- आपको वैश्विक दुनिया में खुद को अन्य के समझ समान समझता है जबकि उसकी अधिकांश आबादी अभी भी शोषित व कुपोषित है।
भारत में संघ और राज्यों के बीच राजकोषीय संबंधो पर नए आर्थिक प्रभाव
देश में अंग्रेजी हुकूमत ने छोटे - छोटे राजाओं के भूभागों को जीत कर , उन पर अपना अधिकार किया। फिर कुछ बड़े राज्य जीते , इसमें अवध ,पंजाब , त्रावणकोर , मैसूर , हैदराबाद , कर्नाटक , सिंध आदि प्रान्त थे। 1919 में प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान ही ब्रिट्रिश हुकूमत कमजोर पड़ने लगी थी और भारत के राजनेता लोग अपने आंदोलन को को तीव्र कर अपने अधिकार तथा जनता के अधिकार में बढ़ोत्तरी की मांग कर रहे थे। जिससे अंग्रेजी हुकूमत पर राजनीतिक दबाव बढ़ता जा रहा था , अंग्रेजो ने धीरे - धीरे राज्यों का एकीकरण किया और उन अपना अधिकार कर लिया। राज्य के शासक धीरे - धीरे कमजोर होते गए और उनकी स्वायत्तता , सम्प्रभुता ब्रिट्रिश प्रशासन के आगे नतमस्तक हो गई थी।
जनता में धीरे - धीरे अपने राजा के स्वाभिमान गिरा हुआ देखकर , अपने आप को ब्रिट्रिश हुकूमत के प्रति नतमस्तक पाती थी। जनता में अपनी दबी हुई , आत्मसम्मान की पराकाष्ठा धीरे- धीरे उद्द्वेलित होती जा रही थी , उनको विद्रोह की झलक यदा - कदा दिखाई दे रही थी। चाहे काकोरिकांड हो या फिर जलियावालाबाग हत्याकाण्ड , अंग्रेजी सरकार की बगावती नीति , भारतीय नागरिको को क्रन्तिकारी बनने की ओर धकेल रही थी। जैसे - जैसे ब्रिट्रिश हुकूमत प्रथम विश्वयुद्ध के बाद कमजोर होती जा रही थी , ठीक उसी प्रकार द्वितीय विश्वयुद्ध की ओर वह उन्मुख हो रहा था। जिसके कारण भारतीय क्रान्तिकारियो व उदारवादी नेताओ , उग्र नेताओ के दबाव में ब्रिट्रिश सरकार झुकती जा रही थी और धीरे -धीरे अपने मंत्रिमंडल में भारतीय प्रतिनिधियों को प्रतिनिधित्व देने की ओर अग्रसर हो रही थी।
भारत शासन अधिनियम , 1935 इन्ही का परिणाम था जो के राज्यों व केंद्र के बीच सहकारी संघवाद की भावना पर केंद्रित था। इस अधिनियम के तहत राज्यों में द्वैध शासन का अंत किया गया और केंद्र को अधिक मजबूत बनाया गया और राज्यों को स्वायत्तता का भी ध्यान रखा गया। समवर्ती सूची , संघ सूची , राज्य सूची जैसे विषय बनाये गए। राज्य सूची जैसे विषय पर राज्यों को पूर्ण अधिकार दिया गया जैसे - शिक्षा , चिकित्सा , पुलिस , राज्यकर आदि। समवर्ती सूची में वे विषय डाले गए जो कि या जिन पर राज्य सरकार व केन्द्र सरकार दोनों नियम- कानून या फिर कर जैसे प्रावधान कर सकती थी। लेकिन राज्य व केंद्र सरकार के कानून के अतिव्यापन की स्थिति में केंद्र सरकार को राज्य की तुलना में सविधान ने अधिक शक्तिशाली बनाया था । समवर्ती सूची के अंतर्गत - शिक्षा ,मनोरंजन कर , प्रत्यक्ष कर जैसे विषय शामिल थे । संघ - सूची के अंतर्गत जो विषय है उनके बारे में नियमन केंद्र सरकार बना सकती थी और उन्हें लागु कर सकती थी , रेलवे , डाक , संचार , शोध जैसे विषय इसके अंतर्गत चयनित थे।
वित्त का बंटवारा करने के लिए संविधान में वित्त आयोग की स्थापना का प्रावधान है जो कि केंद्र की प्राप्त आय में से राज्यों को धन का संवितरण करता है , वित्त आयोग का गठन संविधान के अनुच्छेद 280 के अन्तरगत हुआ है। अनुच्छेद 280 राज्यों के बीच उनके उपागमों जैसे शिक्षा - चिकित्सा , गरीबी , बेरोजगारी ,विकास के आधार पर धन का वितरण करता है। देश की आजादी के समय जहाँ केंद्र अपने राजकोष से राज्यों को 23 प्रतिशत तक धन का वितरण करता था , आज वह राशि बढ़ाकर 40, 60 के अनुपात में हो गई है। अब केंद्र सरकार राज्यों में धन वितरण हेतु अगले वर्ष को ध्यान में रखकर वित्त आयोग का गठन करती है। 1991 की जनगणना के आधार पर 13वें वित्त आयोग का गठन किया गया था जिसके अध्यक्ष वाईए रेड्डी थे , इन्होने अपनी रिपोर्ट नयी वित्तीय वर्ष के प्रारम्भ होने पर दी थी।
इस आयोग ने राज्यों के प्रति गरीबी , अमीरी , रोजगार , विकास , कुपोषण के पैमाने को ध्यान में रखकर तथा गहन अन्वेषण कर रिपोर्ट तैयार की। इसमें कुछ राज्य जैसे - छत्तीसगढ़ , बिहार , पूर्वीउत्तर प्रदेश, झारखण्ड ओडिशा तथा पूर्वात्तर के राज्यों को कम विकासशील राज्य माना , जहाँ पर प्रचूर संसाधन तो थे , पर उन संसाधन का उचित दोहन का लाभ विकसित राज्यों में रहने वाले लोगों को मिला। वे लोग वैसे ही रह गए जैसे थे , कहते हैं "चिराग तले अँधेरा ही होता है ", यही कहावत चरितार्थ होती है। इन प्रदेशों के आदिवासी लोग आज भी अपने पूर्वजों द्वारा प्रसंस्कृत जीवन व्यतीत कर रहें हैं और उन्हीं ढर्रों पर चल रहें हैं। इनका सामाजिक ताना - बाना आधुनिक जगत की दुनिया से कटा हुआ है , आखिर ये कब तक प्रगति पथ पर दौड़ेंगे।
आज जब आधार कार्ड की अनिवार्यता सरकार द्वारा थोपी जा रही है , तो इसके अनिवार्यता ने आदिवासी समूह में रहने वाले लोगो का जीवन दूभर कर दिया है। ये जाए तो कहाँ जाएँ , जब आधार कार्ड या फिर अन्य गतिविधियाँ सरकार द्वारा की जाती है तो वे इन क्रिया - विधियों को समझ नहीं पाते जिससे उन्हें अनेक समस्याओ से को दो - चार होना पङना परता है। स्थति तब भयावह हो जाती है जब आधार कार्ड न होने पर आदिवासी भाइयों को कोटेदार द्वारा अनाज तक नहीं दिया जाता , इससे कई आदिवासी लोग अन्न के अभाव के कारण मृत्यु का शिकार हो जाते हैं।
इसके अलावां दूसरा कारण वनाधिकार अधिनियम भी है , इसके आ जाने से अब वनवासी वन में नहीं रह सकते , जैसे वन पर उनका अधिकार न होकर सरकार का हो गया है। वे किस पर जिए , वे एक तरफ आधुनिक खेती के ज्ञान से अपरिचित हैं तो दूसरी तरफ पैसे का अभाव व गरीबी के कारण खेत के बुवाई के बीज तथा उवर्रक खरीदने में अक्षम हैं। " किं आधिक्यं (अधिक क्या कहा जाय ?) ? " तो इस प्रकार उनकी यह मज़बूरी या फिर दुश्वार जीवन को कैसे सरल बनाया जा सकता है।
उनके बच्चे स्कूल आज भी इसलिए जातें हैं कि सरकार द्वारा संचालित विद्द्यालयों में परोसी जाने वाली भोजन मिड -डे - मील की एक खुराक मिल सके। "क्या यही संघवाद है " जिसने राज्यों को कमजोर बनाकर , केंद्र सरकार को अधिक शक्तिशाली होने का ताबूत ठोकती है , कैसी यह विडंबना है और कैसा है यह भारत का संघवाद और भारत शासन अधिनियम ,1935.
जैसे - जैसे देश आधुनिकता की दौर में प्रवेश कर रहा है, वैसे -वैसे सामाजिकता से कटे लोगों का जीवन विषय समाज- संगत न होकर , एकाकीपन की ओर जा रहा है। क्या जंगल में लकड़ी काटने वाले या फिर जानवर का शिकार करने वाले आदिवासी पर गोली चलाने का अधिकार वनवासी कानून में बनाया जाना चाहिए। क्या वे आदिवासी अपनी मौत के इन कारणों के लिए जिम्मेवार हैं ? जिन्हें यह तनिक भी भान नहीं कि उनके साथ , इस किये कृत्य के क्या परिणाम हो सकते हैं , जिसके लिए उन्हें मृत्यु की कीमत चुकानी पड़ती है।
इस कृत्य के लिए जिम्मेदार व बेईमान वे लोग हैं , जो इन लोगों को ऐसा कृत्य करने के लिए मजबूर करते हैं , इसमें आदिवासी जैसे समुदाय के लोगो का क्या कसूर।
14वें वित्त आयोग का गठन एन. के. सिंह की अध्यक्षता में किया गया है। इन्होंने राज्यों में घूमकर वहां कि स्थिति जानकर , राज्यों में अधिक से अधिक धनराशि ,के वितरण की केंद्र सरकार के समक्ष संस्तुति की , जिसमें से सरकार ने अधिकांश संस्तुतियों को मान लिया , इस समिति ने 50 प्रतिशत 1971 की जनगणना तथा 50 प्रतिशत 2011 की जनगणना को ध्यान में रखकर प्रतिवेदन तैयार किया , जिसमें अधिक जनसँख्या वाले , अधिक पिछड़े राज्यों पर अधिक ध्यान केंद्रित किया गया है क्योंकि ऐसे राज्यों के अधिकांश लोगों के जीविका के संसाधन कृषि है जिसमें पुरे परिवार के लोग खेतों में काम करते दिखाई देते हैं , जो कि प्रच्छन बेरोजगारी के शिकार लोग हैं।
आजादी के बाद के सरकारों ने नीतियों को बनाने के लिए विदेशी विद्द्यानों का आयात किया जाता था जो कि ऑक्सफ़ोर्ड , कैम्ब्रिज जैसे विश्वविद्द्यालयों से पढ़कर आते थे, लेकिन उनके द्वारा तैयार की गई रिपोर्ट ठाक के तीन पात के बराबर ही रहीहै , जिसमे किसी का भला नहीं हुआ। गरीब- गरीब ही रहता चला गया और अमीर और अमीरी राह पर। समझ में नहीं आता , हमारे नेता जो हमारे देश -प्रांतर से चुनकर जाते हैं , उन्हें अपने देश द्वारा उत्पन्न शिक्षित विद्वानों पर विश्वास क्यों नहीं करते।
आखिर उन्हें अपने से ज्यादा विदेशी विद्वानों पर ज्यादा भरोसा क्यों होता है , जिनको देश की गुणा - गणित का भान नहीं होता , वे लोग भारत की डी. पी. आर (डिटेल प्रोग्रेसिव रिपोर्ट) तैयार करते हैं। यह हमारे लिए शर्म की बात है कि कैसा दुनिया का नेतृत्व देने वाला देश भारत, अपने ही ज्ञान-कौशल के आभाव में अपने को निकृष्टम मानकर विदेशी सेवा लेने में गुरेज नहीं कर रहा है , ब्लकि उसमें अपने- आपको वैश्विक दुनिया में खुद को अन्य के समझ समान समझता है जबकि उसकी अधिकांश आबादी अभी भी शोषित व कुपोषित है।
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Joy is the Simplest form of Gratitude. हर्ष कृतज्ञता का सरलतम रूप है।
विज्ञान व रहस्यवाद क्या संगत है।
निबंध बनाम आवश्यकता
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निबंध बनाम आवश्यकता
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