Destiny of a Nation is Shapped in its Classroom. राष्ट्र के भाग्य का स्वरुप निर्माण उसकी कक्षाओं में होता है।
निबंध -4
राष्ट्र के भाग्य का स्वरुप निर्माण उसकी कक्षाओं में होता है।
वर्तमान शिक्षा प्रणाली जो युगांतर युग से चलकर आयी है , आज अपने नवीनतम रूप में विद्यमान है। अभिवावक ,शिशु ,अध्यापक सब कक्षा की शिक्षा पर भरोसा करते है , इस पर लोगो को विश्वास है कि कक्षाओं की जितनी अधिक फीस होगी , अच्छे भौतिक -भवन की अवसंरचना होगी, जितने सुन्दर वस्त्र छात्रों को दिए जायेंगे और उन्हें डिजिटल प्रौद्दोगिकी से युक्त टेबलेट, मोबाइल हैंडसेट , लैपटॉप दिए जायँगे , जितनी ही अच्छी व्यवस्था डिजिटल , तारविहीन व्यवस्था से भवन सुसज्जित होंगे , उतनी ही अधिक कक्षाएँ आधुनिक होगीं। इस प्रकार के आधुनिक कक्षा में नवीन बालकों को शिक्षित - प्रशिक्षित कर विश्वस्तरीय ज्ञान-कौशल से युक्त किया जायेगा ताकि वे विश्व-परिदृश्य के समाज में मानव - पूँजीनिर्माण , स्वास्थ्य -चिकित्सा , नवाचार क्षेत्र में अपने ज्ञान का अधिकतम दोहन कर सके , जो विश्वसमाज हितैषी हो।
आज शिक्षण संस्थाओं की जो रैंकिंग तय की जाती है , वह सब उन्ही पहलुओं पर तय की जाती है कि छात्र विश्वविद्द्यालय में किस प्रकार गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा ग्रहण कर रहें हैं तथा उस शिक्षा के अनुकूल रोजगार उपलब्धता का स्तर क्या है ? यह रोजगार सुगमता का यह पहलू सिर्फ मात्रात्मक होना ही आवश्यक नहीं है , इसके लिए गुणात्मक पहलू का होना भी जरूरी है। किसी विश्वविद्यालय में विश्व- परिप्रेक्ष्य के सन्दर्भ छात्रों की संख्या को भी ध्यान में रखा जाता है। इसमें छात्र के कला - कौशल , शोध , खुद को प्रस्तुति करने के तरीके पर भी आकलन किया जाता है , उसके सबसे अंत में छात्रों के औसत उच्च पैकेज की वरीयता तथा बहुराष्ट्रीय कंपनियों के कॉलेज में कैम्पस प्रवेशन को अहम मूल्य दिया जाता है , तब जाकर किसी संस्था कि विश्वस्तरीय गणना में रेखा खींची जाती है। आज के सन्दर्भ में भारत के दो शीर्ष संस्थान अपनी विश्वस्तरीय रैकिंग बनाने में सक्षम हुए हैं - 1.IISC बंगलूर व् 2. IIT कानपूर।
सोचने - समझने की बात है देश में तकनीकि- शिक्षा, प्रबंधन , शोध - शिक्षा वाले कालेजों की संख्या लाखों में है लेकिन इनमें शिक्षा के स्तर का गिरना , विश्व-परिदृश्य में भारत की साख को गिराता है जो भारत को पिछङेपन को ओर धकेलता है , और अंत तक यही निष्कर्ष निकलता है कि भारत आजादी के 70 वर्ष बाद भी अंग्रेजी - मैकाले शिक्षा पद्धति से बहार निकल नहीं पाया है।
अगर इस पर शोध किया जाय कि मैकाले - शिक्षा - पद्धति सर्वोच्च है ,तो तत्कालीन समय में अंग्रेज विद्वानों जैसे विलियम जोन्स , विवियन डेरोजिओ ने मैकाले के इस शिक्षा-नीति का कङा विरोध इसलिए किया था कि इस शिक्षा नीति से भारतीय लोग विदेशी भाषा के कारण अपने ही देश में अपनी भाषा- साहित्य से अनजान हो जायेंगे और उनका साहित्य और पुरातन ज्ञान धरा-का धरा रह जायेगा अर्थात नष्ट हो जायेगा , परन्तु ब्रिट्रिश संसद द्वारा नामित मैकाले शिक्षा नीति के आगे , ये सारे विद्वान नतमस्तक हो गए। मैकाले लिखता है कि " भारत का ज्ञान यूरोप के किसी छोटे से आलमारी में रखे कुछ किताबों से भी गया- गुजरा है , और आगे कहता है कि अंग्रेजी में लिखी गई पुस्तक ही विश्व की सर्वश्रेश्ठ ग्रन्थ है , जिसे आसानी से समझा-समझाया जा सकता है। "
इस विषय को समझने की जरूरत है कि एक अंग्रेज विद्वान आज के 200 साल पहले यह कह गया था और आज भी हम , जब हम आजाद है , उसी के शिक्षा -नीति पर चल रहें हैं जिसका खामियाजा देश को भुगतना पड़ रहा है , जिसके कारण देश के 60 प्रतिशत से अधिक जनसँख्या के ज्ञान का समुचित विकास नहीं हो पा रहा है।
हमारे सामने आजाद हुए , छोटे-छोटे देश अपनी मातृभूमि - भाषा को जनभाषा बनाकर , आज ब्रिट्रिश ज्ञान-विज्ञान के समकक्ष शोध ,अनुसंधान तथा नवीनतम ज्ञान के आधार पर बराबरी में खड़े हुए हैं और हमारे देश के कुछ महाशय गुलामी- पूर्ण - शिक्षा ग्रहण के नेतृत्व को आज भी अंग्रेजी भाषा को मातृभाषा से बेहतर मान रहें हैं। इन्ही सारे बिंदुओं का अवलोकन कर भारतेन्दु हरिश्चन्द्र जो कि हिंदी साहित्य के प्रसिद्ध नाटकारहै , ने लिखा है कि '' भारतवर्षोन्नति कैसे हो सकती है '' जो देश शिक्षा की भाषा को अपनी मातृ -भाषा को नहीं अपना सका , उस देश का विकास कैसे हो सकता है , आगे दुखी होकर नाटक में भारतीय प्रबुद्ध लोगों के मनोदशा के बारें लिखता है - "हा हा भारत दुर्दशा देखी न जाइ "
देश इतने अंधकार व अज्ञान में आज भी डूबा हुआ है कि नाटकार कैसे अपने दर्द को बयां करे , कि लेखक को कितना असीम कष्ट हो रहा है। इसके कुछ समय पश्चात सोच, समझकर भारतीय -पीढ़ी के नवीन युवाओं को इससे निकलने का रास्ता बतातें हैं और आगे लिखते हैं कि आखिर भाषा का देश में सामाजिक - महत्व क्या है , और इसको आधार बनाकर , नवीनपीढ़ी का अपने वैचारिक भाषा की गुणवत्ता को स्वीकार्य करवाने की लिए तैयार करतें हैं ,आगे वे लिखतें हैं कि -
" निज भाषा उन्नति अहै, है सब उन्नति के मूल
बिन निज भाषा ज्ञान के , मिटै न हिय के सूल "
अपनी भाषा में ही उन्नति संभव है , इसी में हम सब का विकास हो सकता है , जब तक हमें अपनी भाषा का ज्ञान सहजता से नहीं होता है तब तक हम अपने मन में उत्पन्न होने वाले ज्ञान के रसमयी गंगा के कौतुहल को शांत नहीं कर सकते हैं और इस प्रकार , इस तरह न समझ की कसौटी मन में कटोचता रहता है , जिस प्रकार से पैर में कांटा गड़ जाने पर चुभता रहता है, जब तक कांटा पैर से निकल नहीं जाता है , ठीक इसी प्रकार ज्ञान का होने पर मानव - मस्तिष्क में उठने वाली कौतुहल को शांत करने में निज अनुभव ज्ञान अप्रतिम योगदान रहता है।
कक्षा में बालक निर्माण का उत्तम उदाहरण चाणक्य व उनके शिष्य चन्द्रगुप्त के माध्यम से समझा जा सकता है। तक्षशिला विश्वविद्यालय , नालंदा , विक्रमशिला जैसे विश्वविद्यालय , विश्व के महानतम विश्वविद्यालयों में थे , जहाँ से निकले छात्र वाग्वद , चाणक्य , चरक, सुश्रुत जैसे महान विद्वानों का सूत्रपात हुआ। जिस प्रकार फूल के खिलने में उस पर मंडराने वाले भौरें का योगदान होता है। ठीक उसी प्रकार छात्र के संपूर्ण गुण के निखारने में एक अध्यापक का महती रोल होता है। जिसके प्रतिभा से छात्र अपने ज्ञान के पिपासा को शांत करने के लिए व्याकुल हो जाता है तथा स्वतः ही अध्धयन करने लग जाता है।
आज की संचार तकनीकि के विकास ने कक्षा में अध्यन को परिमित किया है , अब यह समझ विकसित हो जा रही है कि छात्र के ज्ञान-कला के विकास में मात्र अध्यापक ही नहीं निखार सकेगा , उसके लिए अन्य उपागम की आवश्यकता होगी जो कि किसी संचार माध्यम , सोशल मिडिया के माध्यम से होगी। आज छात्र एक विषय को एक ही अध्यापक या एक ही प्लेटफॉर्म पर नहीं अध्ययन करना चाहता है , वह उसका स्रोत बहुआयामी दृश्टिकोण से तलाशता है , अब उसकी सोच त्रि-विमीय हो गई है। आज वह किसी भी संदेह को दूर करने के लिए अध्यापक से अधिक संचार माध्यम , गूगल प्लेटफॉर्म पर ज्यादा समय व्यतीत करता है , जिससे छात्र- अध्यापक के मनोभावुक लगाव में गिरावट आयी है। पहले छात्र जो कुछ सीखता था, अध्यापक के माध्यम से, तो उसे अध्यापक के प्रति स्वाभाविक लगाव हो जाता था ,कि आखिर हमने जो कुछ अर्जित किया है इन्हीं की माध्यम से , लेकिन आज यह मिथक टूट रहा है छात्र अध्यापक से ज्यादा भरोसा गूगल पर कर रहा है। इस प्रकार आज के समय अपरिमित ज्ञान का भंडार से ज्यादा वह युक्त है। इस प्रकार छात्रों का मोह खुले कक्षाओं की अपेक्षा बंद कक्षा की ओर हो रहा है , उसकी स्वतः अध्यन में रूचि बढ़ रही है।
अब इस प्रकार यह कहना कि छात्रों के व्यक्तित्व व भविष्य का निर्माण कक्षाओं में ही संभव है तो यह मिथ्या होगी , जो किसी भी संदर्भ में सही नहीं है। डिजिटल प्रौद्दोगिकी के संसार में शिक्षा भी विश्व - शिक्षा बनती जा रही है , लेकिन समस्या अंत में भाषा आती है जो हर समय एक चुनौती के तरह युवाओँ , नागरिक के सामने उसके कुण्ठाग्रस्तता को बढ़ा देती है कि ये विषय संवाद , पटकथा अंग्रेजी में है , हिंदी में उपलब्ध नहीं।
आखिर में एक जागरूक नागरिक यही कहना चाहेगा कि समाज में रहने वाले प्रभुद्ध लोगों को यूटुब , विकिपीडिया पर अपनी भाषा में ज्ञान - विज्ञान का चरित्र- चित्रण करना चाहिए जिससे कि देश की भावी पीढ़ी अधिकतम लाभ उठा सके।
निष्कर्ष स्वरुप ज्ञान के प्रदाता यानि गुरु को ईश्वर से श्रेष्ठ माना गया है जो की कबीर दास की दोहे से स्पष्ट होता है -
"गुरु गोविन्द दोउ खड़े , काके लागौं पाँय
बलिहारी गुरु आपने , गोविन्द दियो बताय "
राष्ट्र के भाग्य का स्वरुप निर्माण उसकी कक्षाओं में होता है।
वर्तमान शिक्षा प्रणाली जो युगांतर युग से चलकर आयी है , आज अपने नवीनतम रूप में विद्यमान है। अभिवावक ,शिशु ,अध्यापक सब कक्षा की शिक्षा पर भरोसा करते है , इस पर लोगो को विश्वास है कि कक्षाओं की जितनी अधिक फीस होगी , अच्छे भौतिक -भवन की अवसंरचना होगी, जितने सुन्दर वस्त्र छात्रों को दिए जायेंगे और उन्हें डिजिटल प्रौद्दोगिकी से युक्त टेबलेट, मोबाइल हैंडसेट , लैपटॉप दिए जायँगे , जितनी ही अच्छी व्यवस्था डिजिटल , तारविहीन व्यवस्था से भवन सुसज्जित होंगे , उतनी ही अधिक कक्षाएँ आधुनिक होगीं। इस प्रकार के आधुनिक कक्षा में नवीन बालकों को शिक्षित - प्रशिक्षित कर विश्वस्तरीय ज्ञान-कौशल से युक्त किया जायेगा ताकि वे विश्व-परिदृश्य के समाज में मानव - पूँजीनिर्माण , स्वास्थ्य -चिकित्सा , नवाचार क्षेत्र में अपने ज्ञान का अधिकतम दोहन कर सके , जो विश्वसमाज हितैषी हो।
आज शिक्षण संस्थाओं की जो रैंकिंग तय की जाती है , वह सब उन्ही पहलुओं पर तय की जाती है कि छात्र विश्वविद्द्यालय में किस प्रकार गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा ग्रहण कर रहें हैं तथा उस शिक्षा के अनुकूल रोजगार उपलब्धता का स्तर क्या है ? यह रोजगार सुगमता का यह पहलू सिर्फ मात्रात्मक होना ही आवश्यक नहीं है , इसके लिए गुणात्मक पहलू का होना भी जरूरी है। किसी विश्वविद्यालय में विश्व- परिप्रेक्ष्य के सन्दर्भ छात्रों की संख्या को भी ध्यान में रखा जाता है। इसमें छात्र के कला - कौशल , शोध , खुद को प्रस्तुति करने के तरीके पर भी आकलन किया जाता है , उसके सबसे अंत में छात्रों के औसत उच्च पैकेज की वरीयता तथा बहुराष्ट्रीय कंपनियों के कॉलेज में कैम्पस प्रवेशन को अहम मूल्य दिया जाता है , तब जाकर किसी संस्था कि विश्वस्तरीय गणना में रेखा खींची जाती है। आज के सन्दर्भ में भारत के दो शीर्ष संस्थान अपनी विश्वस्तरीय रैकिंग बनाने में सक्षम हुए हैं - 1.IISC बंगलूर व् 2. IIT कानपूर।
सोचने - समझने की बात है देश में तकनीकि- शिक्षा, प्रबंधन , शोध - शिक्षा वाले कालेजों की संख्या लाखों में है लेकिन इनमें शिक्षा के स्तर का गिरना , विश्व-परिदृश्य में भारत की साख को गिराता है जो भारत को पिछङेपन को ओर धकेलता है , और अंत तक यही निष्कर्ष निकलता है कि भारत आजादी के 70 वर्ष बाद भी अंग्रेजी - मैकाले शिक्षा पद्धति से बहार निकल नहीं पाया है।
अगर इस पर शोध किया जाय कि मैकाले - शिक्षा - पद्धति सर्वोच्च है ,तो तत्कालीन समय में अंग्रेज विद्वानों जैसे विलियम जोन्स , विवियन डेरोजिओ ने मैकाले के इस शिक्षा-नीति का कङा विरोध इसलिए किया था कि इस शिक्षा नीति से भारतीय लोग विदेशी भाषा के कारण अपने ही देश में अपनी भाषा- साहित्य से अनजान हो जायेंगे और उनका साहित्य और पुरातन ज्ञान धरा-का धरा रह जायेगा अर्थात नष्ट हो जायेगा , परन्तु ब्रिट्रिश संसद द्वारा नामित मैकाले शिक्षा नीति के आगे , ये सारे विद्वान नतमस्तक हो गए। मैकाले लिखता है कि " भारत का ज्ञान यूरोप के किसी छोटे से आलमारी में रखे कुछ किताबों से भी गया- गुजरा है , और आगे कहता है कि अंग्रेजी में लिखी गई पुस्तक ही विश्व की सर्वश्रेश्ठ ग्रन्थ है , जिसे आसानी से समझा-समझाया जा सकता है। "
इस विषय को समझने की जरूरत है कि एक अंग्रेज विद्वान आज के 200 साल पहले यह कह गया था और आज भी हम , जब हम आजाद है , उसी के शिक्षा -नीति पर चल रहें हैं जिसका खामियाजा देश को भुगतना पड़ रहा है , जिसके कारण देश के 60 प्रतिशत से अधिक जनसँख्या के ज्ञान का समुचित विकास नहीं हो पा रहा है।
हमारे सामने आजाद हुए , छोटे-छोटे देश अपनी मातृभूमि - भाषा को जनभाषा बनाकर , आज ब्रिट्रिश ज्ञान-विज्ञान के समकक्ष शोध ,अनुसंधान तथा नवीनतम ज्ञान के आधार पर बराबरी में खड़े हुए हैं और हमारे देश के कुछ महाशय गुलामी- पूर्ण - शिक्षा ग्रहण के नेतृत्व को आज भी अंग्रेजी भाषा को मातृभाषा से बेहतर मान रहें हैं। इन्ही सारे बिंदुओं का अवलोकन कर भारतेन्दु हरिश्चन्द्र जो कि हिंदी साहित्य के प्रसिद्ध नाटकारहै , ने लिखा है कि '' भारतवर्षोन्नति कैसे हो सकती है '' जो देश शिक्षा की भाषा को अपनी मातृ -भाषा को नहीं अपना सका , उस देश का विकास कैसे हो सकता है , आगे दुखी होकर नाटक में भारतीय प्रबुद्ध लोगों के मनोदशा के बारें लिखता है - "हा हा भारत दुर्दशा देखी न जाइ "
देश इतने अंधकार व अज्ञान में आज भी डूबा हुआ है कि नाटकार कैसे अपने दर्द को बयां करे , कि लेखक को कितना असीम कष्ट हो रहा है। इसके कुछ समय पश्चात सोच, समझकर भारतीय -पीढ़ी के नवीन युवाओं को इससे निकलने का रास्ता बतातें हैं और आगे लिखते हैं कि आखिर भाषा का देश में सामाजिक - महत्व क्या है , और इसको आधार बनाकर , नवीनपीढ़ी का अपने वैचारिक भाषा की गुणवत्ता को स्वीकार्य करवाने की लिए तैयार करतें हैं ,आगे वे लिखतें हैं कि -
" निज भाषा उन्नति अहै, है सब उन्नति के मूल
बिन निज भाषा ज्ञान के , मिटै न हिय के सूल "
अपनी भाषा में ही उन्नति संभव है , इसी में हम सब का विकास हो सकता है , जब तक हमें अपनी भाषा का ज्ञान सहजता से नहीं होता है तब तक हम अपने मन में उत्पन्न होने वाले ज्ञान के रसमयी गंगा के कौतुहल को शांत नहीं कर सकते हैं और इस प्रकार , इस तरह न समझ की कसौटी मन में कटोचता रहता है , जिस प्रकार से पैर में कांटा गड़ जाने पर चुभता रहता है, जब तक कांटा पैर से निकल नहीं जाता है , ठीक इसी प्रकार ज्ञान का होने पर मानव - मस्तिष्क में उठने वाली कौतुहल को शांत करने में निज अनुभव ज्ञान अप्रतिम योगदान रहता है।
कक्षा में बालक निर्माण का उत्तम उदाहरण चाणक्य व उनके शिष्य चन्द्रगुप्त के माध्यम से समझा जा सकता है। तक्षशिला विश्वविद्यालय , नालंदा , विक्रमशिला जैसे विश्वविद्यालय , विश्व के महानतम विश्वविद्यालयों में थे , जहाँ से निकले छात्र वाग्वद , चाणक्य , चरक, सुश्रुत जैसे महान विद्वानों का सूत्रपात हुआ। जिस प्रकार फूल के खिलने में उस पर मंडराने वाले भौरें का योगदान होता है। ठीक उसी प्रकार छात्र के संपूर्ण गुण के निखारने में एक अध्यापक का महती रोल होता है। जिसके प्रतिभा से छात्र अपने ज्ञान के पिपासा को शांत करने के लिए व्याकुल हो जाता है तथा स्वतः ही अध्धयन करने लग जाता है।
आज की संचार तकनीकि के विकास ने कक्षा में अध्यन को परिमित किया है , अब यह समझ विकसित हो जा रही है कि छात्र के ज्ञान-कला के विकास में मात्र अध्यापक ही नहीं निखार सकेगा , उसके लिए अन्य उपागम की आवश्यकता होगी जो कि किसी संचार माध्यम , सोशल मिडिया के माध्यम से होगी। आज छात्र एक विषय को एक ही अध्यापक या एक ही प्लेटफॉर्म पर नहीं अध्ययन करना चाहता है , वह उसका स्रोत बहुआयामी दृश्टिकोण से तलाशता है , अब उसकी सोच त्रि-विमीय हो गई है। आज वह किसी भी संदेह को दूर करने के लिए अध्यापक से अधिक संचार माध्यम , गूगल प्लेटफॉर्म पर ज्यादा समय व्यतीत करता है , जिससे छात्र- अध्यापक के मनोभावुक लगाव में गिरावट आयी है। पहले छात्र जो कुछ सीखता था, अध्यापक के माध्यम से, तो उसे अध्यापक के प्रति स्वाभाविक लगाव हो जाता था ,कि आखिर हमने जो कुछ अर्जित किया है इन्हीं की माध्यम से , लेकिन आज यह मिथक टूट रहा है छात्र अध्यापक से ज्यादा भरोसा गूगल पर कर रहा है। इस प्रकार आज के समय अपरिमित ज्ञान का भंडार से ज्यादा वह युक्त है। इस प्रकार छात्रों का मोह खुले कक्षाओं की अपेक्षा बंद कक्षा की ओर हो रहा है , उसकी स्वतः अध्यन में रूचि बढ़ रही है।
अब इस प्रकार यह कहना कि छात्रों के व्यक्तित्व व भविष्य का निर्माण कक्षाओं में ही संभव है तो यह मिथ्या होगी , जो किसी भी संदर्भ में सही नहीं है। डिजिटल प्रौद्दोगिकी के संसार में शिक्षा भी विश्व - शिक्षा बनती जा रही है , लेकिन समस्या अंत में भाषा आती है जो हर समय एक चुनौती के तरह युवाओँ , नागरिक के सामने उसके कुण्ठाग्रस्तता को बढ़ा देती है कि ये विषय संवाद , पटकथा अंग्रेजी में है , हिंदी में उपलब्ध नहीं।
आखिर में एक जागरूक नागरिक यही कहना चाहेगा कि समाज में रहने वाले प्रभुद्ध लोगों को यूटुब , विकिपीडिया पर अपनी भाषा में ज्ञान - विज्ञान का चरित्र- चित्रण करना चाहिए जिससे कि देश की भावी पीढ़ी अधिकतम लाभ उठा सके।
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निबंध बनाम आवश्यकता
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