Joy is the Simplest form of Gratitude. हर्ष कृतज्ञता का सरलतम रूप है।

                                                                   निबंध - 5

                                                 हर्ष कृतज्ञता का सरलतम रूप है।

 हर्ष यानी आनंद या खुशी कह सकते हैं यह कहां से सृजित है, इसका प्रकटन कहाँ से होता है,  इसका अनुभव स्वहृदय की अभिव्यक्ति से ही लगता है। हर्ष, विषाद, लोभ, क्रोध , काम जैसे शब्द अलग-अलग मनोहर व्यवस्थाओं को प्रकट करते हैं लेकिन इन सारे गुणों के प्रकारों का प्रादुर्भाव देखा - समझा जा सकता है या होता है कि हर व्यक्ति में यह समानुपात में नहीं पाया जाता है कुछ व्यक्ति में अधिक होता है तो कुछ में कम, यह समाज द्वारा निर्धारित की जाती है और और कहा जाता  है कि गुणवान पुरुष में हर्ष जैसे गुण अधिक पाए जाते हैं और वह समाज की गुणवत्ता का उचित प्रतिनिधित्व करता है।  समाज में यह धारणा एक व्यक्ति में इस रूप में संदर्भित है :-

                                                "होनहार बिरवान के होत चिकने पात। "

कहने का मतलब है कई व्यक्तिों  में कार्य के स्थित के अनुरूप खुद को ढालने की क्षमता होती है और वे अपने प्रतिनिधित्व  व सामाजिक पारदर्शिता के गुणों के कारण सामान्य श्रेष्ठ का साधारण ढंग से साबित करते हैं ना कि खुद को श्रेष्ठ साबित नहीं करते हैं बल्कि उनके द्वारा दिए जाते हैं समाज उस पर अपना मूल्यांकन करता है समाज में रहने वाले किसी विषय पर मत अलग अलग हो सकता है परंतु जब समाज के अधिकांश लोग किसी भी व्यक्ति के कार्यों की प्रशंसा की जाती है जिसका लाभ समाज के सभी वर्गों तक समान रूप से पहुंचता है और कोई उसे देखता है तो उसकी श्रेष्ठता सत्ता ही स्थापित हो जाती है और अधिकांश व्यक्ति के प्रति कृतज्ञ हो जाते हैं यह कृतज्ञता का सरलतम रूप है जो कि व्यक्ति को भगवान ना होने पर भी भगवान स्वीकार कर लिया जाता है

क्रिकेट के महानतम खिलाड़ी सचिन तेंदुलकर इस वीर पुरुष भगवान की संज्ञा उनके द्वारा किए गए योगदान के कारण दी गई क्रिकेट खेलने के अलावा भी अपने समाज के दायित्व को बखूबी निभाने का प्रयास करते हैं जैसे उड़ीसा के एक गांव के विकास के लिए गांव को गोद लेना या फिर एक नई उभरते हुए खिलाड़ी को व्यक्तित्व की पहचान करना फिर उसके व्यक्तित्व को दिखाना इसके अलावा वे सड़क पर युवाओं को हेलमेट पहने की नसीहत देते हुए भी देखे गए ऐसे व्यक्ति एन केन प्रकारेण ढंग से अपने श्रेष्ठ को समाज को देने का प्रयास करते हैं जो समाज के लोगों को हर्षित करता है

ऑथराइज एफ्रो अमेरिकन खिलाड़ी थे जिन्होंने विंबलडन में श्रेष्ठ खेल खेला इसके कुछ दिन पश्चात पता चला कि उन्हें वर्ष होने के 4 साल बाद जब उन्होंने उनको इसकी जानकारी सार्वजनिक की तो कुछ रोड वादी तत्वों ने उनसे पूछा कि आप हमेशा ईश्वर व मानवता की सेवा में विश्वास करते हैं तो आखिर इस्वर में इस बीमारी के लिए आप को ही क्यों चुना जबकि और भी लोग हैं तो इस पर आता है कृपया के भाव से रहते हैं कि मैं कौन हूं निर्णायक मेरे जीवन की सत्ता या फिर विश्व उस ईश्वर का ही रूप है जब चाहा जिसे चाहा उस में प्रवेश किया रही मेरी बात तो मैं बता दूं कि मैं एक गरीब परिवार में पला बढ़ा हूं वहां की गंदी गलियों से निकलकर विंबलडन तक पहुंचने का मौका मिला तो मैं यह शायद यह भूल गया था कि एक कचरे में रहने वाला कैसे मंडल ताज पर अपना कब्जा जमाया उसी ईश्वर की असीम सत्य के पंजे के कारण था उसका धन्यवाद करना मैं भूल गया था आज जब दुनिया की सेवा के लिए मुझे ईश्वर ने चुना है तो मैं क्यों उसका प्रतिवाद करूं गीता में कहा गया है कि

                                         सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ।

                                         ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि ।।


 अर्थात मैं क्यों डरूं, गीता में उपदेश ही ऐसा है जो कर्म करने की प्रेरणा देता है, सुख हो, दुख हो, जय हो, पराजय हो, सबको समान समझकर, जाकर युद्ध करो, ऐसी स्थित में, तुम पाप की भागीदार नहीं बनोगे, आगे और थर एस कहता है जब विश्व के लोगों का प्रेम सम्मान मिला है तो मैं  खुश था आज अगर जनता थोड़ा मुख्य मूर्ति है तो मैं छोड़ क्यों करूं इस प्रकार आता है लोगों के प्रति वह ईश्वर के प्रति बुरे वक्त के समय भी टूटता को नहीं बोलता वह ऐसी रोड वादी प्रश्नों पर अपने उचित तर्कों द्वारा विराम लगा देता है

हमारे भारतीय दर्शन में जब राजा जनक की सभा में विद्वानों द्वारा जब अपने विक्रेता का परिचय दे रहे थे तो वहां अष्टावक्र पहुंचे जो की एक संत थे उनका शरीर आठ जगह से जुड़ा था तो उनके शरीर को देख कर उनका उचित सम्मान नहीं दिया गया तब उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति मुझे इस बात संवाद ज्ञान कौशल शास्त्रार्थ में पराजित कर देगा तो मैं यहां से चला जाऊंगा और मैं विजई हुआ तो उस व्यक्ति को सिंहासन खाली करना होगा इस प्रकार एक विद्वान बहस करने के लिए अपने पिता से उन्होंने सब को पराजित किया अंत में जाकर समस्त उपस्थित विद्वान नतमस्तक हो गए मानव कि वे उस विद्वान की मित्रता के ऊपर तक हो गए थे और उसके ज्ञान का मधुर रसपान कर रहे थे

 सुभाषतानि में हर्ष व कृतज्ञता के बारे में बताया गया है जो कि ऐसे मूलभूत गुण हैं जिनके उसके ऊपर समाज के सभी जरूरतें अपने आप ऐसे व्यक्ति के पास खुद चलकर आती हैं ।अतः ऐसे गुड़ प्रतिभावान व्यक्ति के लिए आवश्यक होना है।

                                  उत्साह संपन्नम् दीर्घसूत्रम् क्रियाविधिज्ञयम् व्यसनेन सक्तम्  
                                सुरम्  कृतज्ञम्  दृहसौह हृदम् च लक्ष्मी स्वयं जाति निवास हेतु


 इसमें बताया गया है कि उत्साह से संपन्न व्यक्ति लंबे समय तक क्रिया विधि को जानने वाला वह करने वाला ऐसा प्राणी जो आलस से ही इन होसूर बहादुर तथा दूसरे के उपकार को मानने वाला हूं ऐसे व्यक्ति के पास धन की देवी लक्ष्मी स्वता ही पास आकर व्यक्ति को धन धन से परिपूर्ण कर देती हैं

 हज का मतलब यह बिल्कुल नहीं चेहरा खिला हो और जोर-जोर 8:00 बजे नगाड़े बजे यह आवश्यक नहीं अति उत्साह को दुख में बदल देता है इसलिए उत्साह जितना मधुर बात ही ना हो उतना ही आनंद होता है

एक अंग्रेजी उपन्यास में पोर्सिया जो कि एक न्यायाधीश है और साइलाक एक व्यापारी है उसके बारे में उसे समझाते हुए बताती है कि तुम अपने व्यापारिक मित्र पर दया करो, समझौते के तहत हुआ था कि मुझे किसी तराजु की कसौटी पर उसके शरीर के मांस का एक टुकड़ा चाहिए

साइलाक  लाख मना करता है कहता है कि मैं समझौते के तहत मांस के टुकड़े के अलावा कुछ नहीं चाहिए । इस पर पोरसिया कहती है, रहम करो और दया जैसे गुण के बारे में बताती है कि

         " Mercy is truth virtue who person receives and that person provides both got plesent."

 दया एक ऐसा गुणवत्तापूर्ण गुण है जो कि देने वाले व पाने वाले दोनों को महान बना देती है और दोनों व्यक्ति एक दूसरे को आनंद की अद्भुति प्राप्त करते हैं । जिनमें दोनों ही खुश होते हैं तो यह आनंद का हर्ष का सरलतम रूप है जो कि दीर्घकालीन समय तक व्यक्ति के मान को ऊर्जावान बनाए रखती है और समाज में सत्य अहिंसा पर चलने का ही निर्देश देती है । देश में बौद्ध, जैन, सिख, हिंदू आदि धर्म है लेकिन निष्कर्ष पर वे अपने सरलतम रूप में मूल ज्ञान को दो ही शब्द में प्रस्तुत करते हैं, यथा गीता में कहा गया है -

                                                     अष्टादश पुराणेषु व्यासस्य वचनम् द्वयम ।
                                                       परोपकार: पुण्याय पापाय परपीड्नम ।।

देश के 18 पुराणों में व्यास जी बताते हैं कि दो वचन ही निर्मूल हैं जो व्यक्ति के समस्त पापों का क्षरण करने वाले हैं
1. परोपकार
2. पूर्ण,
जो व्यक्ति इन दोनों को ध्यान में रखकर अपने कार्यों को करता है ऐसे व्यक्तियों में हर्ष के सरलतम रूप की झलक स्पष्ट दिखाई देने लगती है।

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